उत्तर प्रदेश के साथ बिहार उपचुनाव के नतीजों ने भी राष्ट्रीय प्रजातांत्रिक गठबंधन (एनडीए) खासकर भाजपा को बहुत बड़ा झटका दिया है. दूसरी ओर, चारा घोटाले में लालू प्रसाद यादव के जेल जाने के बाद ये चुनावी नतीजे राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के लिए राहत लेकर आए हैं. तेजस्वी यादव के नेतृत्व में उसने अररिया की लोकसभा सीट के साथ-साथ जहानाबाद विधानसभा सीट पर भी अपना कब्जा बरकरार रखा है. बीते साल नीतीश कुमार के भाजपा के साथ जाने के बाद इस चुनावी नतीजे को राजद के लिए बड़ी जीत बताया जा रहा है. हालांकि, भभुआ विधानसभा सीट बचाकर भाजपा ने कुछ राहत की सांस जरूर ली है.

सीमांचल स्थित अररिया में पूर्व सांसद मोहम्मद तस्लीमुद्दीन के बेटे सरफराज आलम ने भाजपा के प्रदीप सिंह को 61,788 मतों से मात दी है. यहां से 2014 में राजद के तस्लीमुद्दीन ने मोदी लहर के बाद भी भारी जीत हासिल की थी. बीते साल उनकी मौत के बाद यह लोकसभा सीट खाली हुई थी. सरफराज आलम इससे पहले अररिया स्थित जोकीहाट से जदयू विधायक थे. उन्होंने उपचुनाव से पहले पार्टी से इस्तीफा दे दिया था.

दूसरी ओर, जहानाबाद से राजद उम्मीदवार कुमार कृष्ण मोहन उर्फ सुदय यादव ने जदयू के अभिराम शर्मा को करीब 35 हजार मतों से मात दी है. हालांकि, भभुआ सीट से राजद की सहयोगी कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा है. इस सीट से भाजपा उम्मीदवार रिंकी रानी पांडेय ने शंभु सिंह पटेल को करीब 14 हजार मतों से हराया है. विधानसभा की ये दोनों सीटें राजद और भाजपा के विधायकों के निधन के बाद खाली हुई थीं.

उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा के बीच हुए तालमेल को भाजपा की हार की मुख्य वजह बताया जा रहा है. लेकिन बिहार में साथ होने के बावजूद जदयू और भाजपा अररिया और जहानाबाद में अपनी जीत पक्की नहीं कर सकीं. अगर साल 2014 के चुनावी नतीजे देखें तो अररिया से भाजपा को आसानी से जीत जाना चाहिए था. पिछले आम चुनाव में भाजपा को 26.8 फीसदी और जदयू को 22.7 फीसदी वोट शेयर हासिल हुए थे, जो कुल मिलाकर राजद के 41.8 फीसदी से 7.7 फीसदी अधिक थे.

अररिया की राजनीति में मुसलमान और यादव वोटों को निर्णायक माना जाता है. जिले में मुसलमानों की आबादी करीब 43 फीसदी है. साथ ही, यादव के साथ आने पर जिले में माइ (एमवाई-मुसलमान और यादव) समीकरण का आकंड़ा करीब 55 से 60 फीसदी तक पहुंच जाता है. बिहार की राजनीति में माई समीकरण को लालू प्रसाद यादव से जोड़कर देखा जाता रहा है. माना जाता है कि साल 2014 के चुनाव में भाजपा ने यादव मतदाताओं को अपनी ओर खींचने में सफलता हासिल की थी. लेकिन इस उपचुनाव के नतीजे बताते हैं कि यह समीकरण राजद के लिए अभी भी कारगर है.

एनडीए की हार की एक बड़ी वजह और मानी जा रही है. कहा जा रहा है कि राजद ने मतदाताओं तक इस संदेश को पहुंचाने में सफलता पाई कि नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद यादव के साथ धोखे की राजनीति की है. इसके अलावा भाजपा नेताओं के बयानों ने भी एक खास समुदाय में भाजपा के खिलाफ नाराजगी बढ़ाने का काम किया है. प्रदेश भाजपा अध्यक्ष नित्यानंद राय ने एक चुनावी रैली में कहा था - ‘अगर सरफराज जीत गया तो आईएसआई का अड्डा बन जाएगा अररिया. प्रदीप सिंह जीतेंगे तो देशभक्तों का अड्डा रहेगा अररिया.’ उन्होंने गाय का मुद्दा उठाकर यादव मतदाताओं को अपनी ओर खींचने की कोशिश करते हुए कहा था, ‘मैं उनसे भी पूछना चाहता हूं जो वोट मांग रहे हैं यदुवंशियों का, एक बार भी किसी यदुवंशियों के नेता ने नहीं कहा कि गौमाता के हत्यारों को गिरफ्तार करो, गौ के हत्यारों के साथ देने वालों को एक भी वोट का अधिकार नहीं है.’ पिछले विधानसभा चुनाव में भी मतदान के ठीक एक दिन पहले अखबारों में गाय से जुड़ा एक विवादास्पद विज्ञापन छापा गया था.

चार नवंबर, 2015 को अखबारों में प्रकाशित भाजपा का विज्ञापन | साभार : प्रभात खबर
चार नवंबर, 2015 को अखबारों में प्रकाशित भाजपा का विज्ञापन | साभार : प्रभात खबर

अररिया स्थित राजनीति के जानकारों और स्थानीय पत्रकारों से बात करें तो भाजपा की हार की प्रमुख वजहें गैर-भाजपा समर्थकों का एकजुट होना, नीतीश कुमार के समर्थकों का एनडीए से दूर छिटकना, भाजपा उम्मीदवार के खिलाफ नाराजगी और लालू प्रसाद यादव के प्रति सहानुभूति रहीं. इसके अलावा तेजस्वी यादव की सक्रियता ने राजद समर्थकों को लालू प्रसाद यादव की कमी महसूस नहीं होने दी. माना जा रहा है कि इन वजहों से ही राजद के सामने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सहित कई केंद्रीय मंत्रियों और वरिष्ठ भाजपा नेताओं की रैलियां भाजपा के किसी काम नहीं आईं.

माना जा रहा है कि इस उपचुनाव ने तेजस्वी यादव की नेतृत्व क्षमता को भी स्थापित करने का काम किया है. इस नतीजे के बाद उन्होंने कहा, ‘जो लोग कहते थे कि लालू जी खत्म हो गए हैं, आज हम उनको कह सकते हैं कि लालू जी एक विचारधारा का नाम है.’ इसके साथ ही उन्होंने भाजपा को राष्ट्रीय मुद्दे पर घेरने की भी कोशिश की. उन्होंने कहा, ‘उन्होंने (भाजपा) विकास छोड़कर विनाश का काम शुरू किया है. धर्म और जाति के नाम पर लड़ाने और अफवाह फैलाने का काम किया है.’

जानकारों की मानें तो बिहार उपचुनाव सभी राजनीतिक दलो के लिए नाक की लड़ाई बने हुए थे. बीते साल नीतीश कुमार के महागठबंधन से अलग होने के बाद उनकी भी विश्वसनीयता दांव पर लगी मानी जा रही थी. इसके अलावा सभी की नजर इस पर भी थी कि लालू प्रसाद यादव की गैर-मौजूदगी में तेजस्वी यादव अपनी पार्टी को कैसा नेतृत्व दे पाते हैं. माना जा रहा है कि इन उपचुनावों ने साबित किया है कि केवल गठबंधन जनता का विश्वास हासिल करने की पूरी गारंटी नहीं है. और नीतीश कुमार के अलग होने और लालू प्रसाद यादव की गैर-मौजदूगी के बाद भी राजद राज्य की राजनीति में एक अहम किरदार बनी हुई है.