भारत समेत दुनिया भर में प्लास्टिक की बोतलों में पानी बेचा जाता है. बोतलबंद पानी बेचने वाली सभी कंपनियां शुद्धता की गारंटी देती हैं. लेकिन एक अध्ययन के दौरान लिए गए बोतलबंद पानी के 90 प्रतिशत नमूनों (सैंपल) में प्लास्टिक के हजारों छोटे-छोटे टुकड़े (सूक्ष्म कण) पाए गए. टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ न्यूयॉर्क द्वारा किए गए इस अध्ययन में नौ देशों में प्रचलित 11 अलग-अलग ब्रांडों की 259 बोतलों के पानी की जांच की गई थी. इन देशों में भारत ब्राजील, चीन, इंडोनेशिया और अमेरिका शामिल हैं. भारत में मुंबई, दिल्ली और चेन्नई से बोतलबंद पानी के नमूने लिए गए थे.

अध्ययन के दौरान एक्वाफिना, एवियन और भारतीय ब्रांड बिसलरी के पानी का परीक्षण किया गया. अध्ययन करने वाली टीम द्वारा प्रकाशित किए डेटा के मुताबिक चेन्नई से लिए गए बिसलरी के नमूने में प्रति लीटर पानी में प्लास्टिक के 5,000 छोटे-छोटे कण पाए गए. ऐक्वा (इंडोनेशिया) के सैंपल में यह आंकड़ा 4713 जबकि ऐक्वाफिना (अमेरिका, भारत) में 1295 पाया गया. नेस्ले सहित कई दूसरी नामी कंपनियों के पानी में भी इसी तरह की मिलावट मिली. जानकारों के मुताबिक इस तरह की मिलावट से कैंसर का खतरा हो सकता है.

बोतलबंद पानी बेचने वाली कंपनियां दावा करती हैं कि उनके यहां पानी की गुणवत्ता का पूरा ध्यान रख जाता है, लेकिन अध्ययन में पानी में कैंसरकारी पदार्थ मिलने से लोगों की सेहत को लेकर चिंताएं खड़ी हो गई हैं. बोतलबंद पानी का ढक्कन बनाने में पॉलिप्रोपिलीन (मजबूत किस्म का प्लास्टिक) का इस्तेमाल होता है. अध्ययन के नमूनों में पाए गए प्लास्टिक कणों में 54 प्रतिशत इसी के थे. टीम के डेटा से संकेत मिलता है बोतलबंद पानी में ये कण उनकी पैकेजिंग या बोतल में पानी भरने के समय मिल जाते हैं.

भारत में पीने के पानी की पैकेजिंग कैसे होती है, इसे लेकर नियमन की व्यवस्था ढीली-ढाली है. देश के अलग-अलग हिस्सों में सैकड़ों छोटे-बड़े ब्रांडों में बोतलबंद पानी बेचने की होड़ लगी हुई है. इनके लिए नियम-कायदे तय करने का काम राज्य और केंद्र स्तर की एजेंसियों का है. इनमें भारतीय मानक ब्यूरो और खाद्य व औषधि प्रशासन (एफडीए) जैसी एजेंसियां शामिल हैं. अखबार के मुताबिक अध्ययन को लेकर एफडीए से कई बार संपर्क करने की कोशिश की गई लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली.