कांग्रेस के पुराने दिग्गज और एनसीपी (राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी) के प्रमुख शरद पवार एक बार फिर ग़ैर-भाजपाई दलों की धुरी बनते दिख रहे हैं. खबरे हैं कि भारतीय जनता पार्टी के ख़िलाफ़ मज़बूत संयुक्त विपक्षी मोर्चा बनाने में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी उनसे मदद और मशविरा ले रहे हैं. सूत्रों के मुताबिक इसी बुधवार को उत्तर प्रदेश और बिहार की लोकसभा सीटों पर हुए उपचुनाव के नतीज़े आने के कुछ घंटे बाद ही शरद पवार ने राहुल गांधी से मुलाकात की थी. बताया जाता है कि पवार ने 28 मार्च को दिल्ली में तमाम विपक्षी दलों के शीर्ष नेताओं की बैठक भी बुलाई है. इस बैठक में टीएमसी (तृणमूल) की प्रमुख ममता बनर्जी भी हिस्सा ले सकती हैं. इस बैठक में आगे की रणनीति पर चर्चा होगी.

इससे पहले शरद पवार बीते साल हुए राष्ट्रपति चुनाव के दौरान भी किंगमेकर वाली भूमिका में दिखे थे. 77 साल के इस राजनेता से यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अनुरोध किया था कि वे गैर भाजपा पार्टियों की तरफ से ऐसे उम्मीदवारों पर सहमति बनाएं जिन्हें जीत की उम्मीद के साथ राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनाव में उतारा जा सके. सोनिया गांधी ने इस काम के लिए एक समिति भी बनाई थी. इसमें पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और माकपा के महासचिव सीताराम येचरी जैसे दिग्गज शामिल थे. शरद पवार को इस समिति का संयोजक बनाया गया था.

पवार के बारे में कहा जाता है कि हर दल में उनके मित्र हैं. हर दल के प्रमुख नेताओं के साथ पवार के निजी संबंध हैं. किसी भी सियासी गठबंधन को खड़ा करने के लिए यह खूबी बेहद अहम हो जाती है

इससे पहले बीते साल जनवरी में केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने जब शरद पवार को पद्म विभूषण देने की घोषणा की थी तो कई लोगों को लगा था कि मोदी उन्हें अपने करीब लाने की कोशिश कर रहे हैं. भारतीय जनता पार्टी के करीब उनकी पार्टी 2014 में तब आती दिखी थी जब महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में उसे स्पष्ट बहुमत नहीं मिला. भाजपा की पुरानी सहयोगी शिव सेना अलग से चुनाव लड़ी थी और एकबारगी वहां ऐसा लगने लगा था कि अगर शिव सेना ने भाजपा को सरकार बनाने के लिए समर्थन नहीं दिया तो शरद पवार की पार्टी यह काम कर देगी.

मौजूदा केंद्र सरकार के अब तक के कार्यकाल में कई मौके ऐसे आए जब यह लगा कि शरद पवार और नरेंद्र मोदी करीब आ रहे हैं. 2014 लोकसभा चुनावों के प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी ने खुद पवार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे. ऐसे में मोदी की अगुवाई वाली सरकार ने जब उन्हें पद्म विभूषण से नवाजा तो बहुत लोगों को आश्चर्य हुआ. अब वही पवार भाजपा विरोधी या यों कहें कि नरेंद्र मोदी विरोधी मोर्चा खड़ा करने की मुख्य धुरी बन गए हैं. जानकारों के मुताबिक एक तरह से शरद पवार के कंधों पर मोदी सरकार के सामने हर मोर्चे पर पस्त होते दिखते विपक्ष को खड़ा करने का भी जिम्मा है.

अब सवाल यह उठता है आखिर पवार में ऐसा क्या है कि वे विपक्ष खड़ा करने के लिहाज से इतने अहम हो गए हैं? सबसे पहली बात तो यह है कि उनका बहुत लंबा राजनीतिक अनुभव है. भाजपा के भी वरिष्ठ नेताओं से बात की जाए तो वे पवार की राजनीतिक सूझबूझ की दाद देते हैं. देश का राजनीतिक वर्ग यह मानता है कि पवार ऐसे नेता हैं जो सियासत की बारीकियों को बखूबी समझते हैं.

उनकी दूसरी ताकत ही उनकी सबसे अहम ताकत है. पवार के बारे में कहा जाता है कि हर दल में उनके मित्र हैं. हर दल के प्रमुख नेताओं के साथ पवार के निजी संबंध हैं. किसी भी सियासी गठबंधन को खड़ा करने के लिए यह खूबी बेहद अहम हो जाती है. माना जा रहा है कि छोटे-बड़े क्षेत्रीय दलों को एक साथ लाकर एक मजबूत विपक्ष खड़ा करने में उनसे अधिक सक्षम नेता अभी विपक्ष के पास कोई नहीं है. कहा जाता है कि पर्दे के पीछे की जोड़-तोड़ में पवार का कोई सानी नहीं है.