साल 1969 कई लिहाज़ से सनसनीखेज़ था. इस साल इंदिरा गांधी देश की सबसे ताक़तवर नेता बनकर उभरीं. इसी साल तीन अहम घटनाएं हुईं - बैंकों का राष्ट्रीयकरण, राष्ट्रपति का चुनाव और कांग्रेस पार्टी का विभाजन. ये तीनों घटनाएं एक दूसरे में इस तरह उलझी हुई हैं कि इन्हें अलग-अलग करके पूरी तरह नहीं समझा जा सकता. तो इन्हें एक साथ ही समझते हैं.

क्या बैंकों का राष्ट्रीयकरण इसके पहले भी हुआ था?

चर्चित लेखक बख्तियार के दादाभाई अपना किताब ‘बैरंस ऑफ़ बैंकिंग’ में लिखते हैं कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद यूरोप में केंद्रीय बैंक को सरकारों के अधीन करने के विचार ने जन्म लिया. उधर, बैंक ऑफ़ इंग्लैंड का राष्ट्रीयकरण हुआ, इधर, भारतीय रिज़र्व बैंक के राष्ट्रीयकरण की बात उठी जो 1949 में पूरी हो गयी. फिर 1955 में इम्पीरियल बैंक, जो बाद में ‘स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया’ कहलाया, सरकारी बैंक बन गया.

क्या यह आर्थिक ज़रूरत से ज़्यादा से राजनैतिक कदम था?

आर्थिक तौर पर सरकार को लग रहा था कि कमर्शियल बैंक सामाजिक उत्थान की प्रक्रिया में सहायक नहीं हो रहे थे. बताते हैं कि इस समय देश के 14 बड़े बैंकों के पास देश की लगभग 70 फीसदी पूंजी थी. इनमें जमा पैसा उन्हीं सेक्टरों में निवेश किया जा रहा था, जहां लाभ के ज़्यादा अवसर थे. वहीं सरकार की मंशा कृषि, लघु उद्योग और निर्यात में निवेश करने की थी.

दूसरी तरफ एक रिपोर्ट के मुताबिक़ 1947 से लेकर 1955 तक 360 छोटे-मोटे बैंक डूब गए थे जिनमें लोगों का जमा करोड़ों रुपया डूब गया था. उधर, कुछ बैंक काला बाज़ारी और जमाखोरी के धंधों में पैसा लगा रहे थे. इसलिए सरकार ने इनकी कमान अपने हाथ में लेने का फैसला किया ताकि वह इन्हें सामाजिक विकास के काम में भी लगा सके.

वहीं, कुछ जानकार इसे राजनैतिक अवसरवादिता मानते हैं. उनके मुताबिक़ 1967 में जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं तो पार्टी पर उनकी पकड़ मज़बूत नहीं थी. लोग उन्हें कांग्रेस सिंडिकेट की ‘गूंगी गुड़िया’ कहते थे. कहते हैं कि इंदिरा की इस छवि को तोड़ने में ‘पांच पांडव’ बड़े कारगर साबित हुए. ये थे विदेश सेवा के अफ़सर त्रिलोक नाथ कौल, राजनेता और डिप्लोमेट दुर्गा प्रसाद धर, अर्थशास्त्री पृथ्वी नाथ धर, भारतीय पुलिस सेवा के अफसर रामेश्वर नाथ काउ और इनके सर्वे सर्वा और भारतीय विदेश सेवा के अफसर प्रेमेश्वर नारायण हक्सर. ये पांचों ही कश्मीरी पंडित थे!

रामचंद्र गुहा ‘इंडिया आफ्टर गांधी’ में लिखते हैं कि पीएन हक्सर के विचार इंग्लैंड की लेबर पार्टी से मेल खाते थे. वे कुछ हद तक बाज़ार विरोधी विचारधारा, यानी के समाजवाद के प्रति लगाव रखते थे. उनका झुकाव तत्कालीन सोवियत रूस की तरफ़ था. सोवियत रूस और पूर्वी यूरोप के देशों में बैंक सरकार के अधीन रहते थे. गुहा ने कैथरीन फ्रैंक की किताब ‘लाइफ ऑफ़ इंदिरा नेहरु गांधी’ के हवाले से लिखा है कि 1967 से लेकर 1973 तक हक्सर कांग्रेस सरकार में सबसे ताक़तवर व्यक्ति थे, और इंदिरा उनकी समझ की कायल थीं. यही से इंदिरा गांधी का भी झुकाव लेफ्ट की तरफ़ हो गया था.

1967 में इंदिरा ने कांग्रेस पार्टी में ‘दस सूत्रीय कार्यक्रम’ पेश किया. बैंकों पर सरकार का नियंत्रण, पूर्व राजे-महाराजों को मिलने वाले वित्तीय लाभ और न्यूनतम मज़दूरी का निर्धारण इसके मुख्य बिंदु थे. गुहा लिखते हैं कि इंदिरा की पेशकश पर कांग्रेस पार्टी ने कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं दिखायी. इंदिरा को यह बात नागवार गुज़री. इससे सिंडिकेट और इंदिरा गांधी आर-पार की लडाई के मूड में आ गए.

मशहूर पत्रकार इंदर मल्होत्रा की किताब ‘इंदिरा गांधी- अ पर्सनल एंड पोलिटिकल ऑटोबायोग्राफी; के हवाले से रामचंद्र गुहा लिखते हैं कि पीएन हक्सर ने इंदिरा को एक सलाह दी थी. वह यह कि सिंडिकेट को ख़त्म करना है तो ताक़त की इस निजी लड़ाई को विचारधारा की लड़ाई के तौर पर पेश करना होगा. इसके लिए, उस साल एआईसीसी बंगलौर अधिवेशन में इंदिरा ने तुरंत प्रभाव से बैंकों के राष्ट्रीयकरण का प्रस्ताव रख दिया. लोगों में संदेश गया कि इंदिरा गरीबों के हक की लडाई लड़ने वाली योद्धा हैं. पर अभी एक अड़चन और थी.

राष्ट्रीयकरण में कौन अड़ंगा डाल रहा था और कैसे बात बनी?

तेज़ तर्रार राष्ट्रवादी और तत्कालीन वित्त मंत्री मोरारजी देसाई इसमें आड़े आ रहे थे. इंदिरा उनसे खौफ़ खाती थीं. हालांकि, इंदिरा के दस सूत्रीय कार्यक्रम को पार्टी में पेश करने वाले मोरारजी देसाई ही थे जो सामाजिक नजरिये से बैंकों पर सरकारी नियंत्रण के पक्षधर थे. पर वे उनके राष्ट्रीयकरण के पक्ष में नहीं थे.

हक्सर द्वारा संचालित ‘पांच पांडवों’ की टीम ने मोरारजी देसाई को इंदिरा गांधी के रास्ते से हटाने का प्लान बनाया. इसके तहत चंद्रशेखर और कांग्रेस की तब की युवा पीढ़ी के नेताओं ने देसाई और उनके बेटे कांति देसाई पर वित्तीय गड़बड़ियां और कुछ बड़े उद्योग घरानों को फ़ायदा पंहुचाने का इल्ज़ाम लगाया.

लोहा गर्म था. इंदिरा ने हथौड़ा मार दिया. कुलदीप नायर ‘बियॉन्ड द लाइन्स’ में लिखते हैं, ‘इंदिरा ने पत्रकारों और अन्य लोगों को बताया कि मोरारजी देसाई पूंजीवादी सोच रखते हैं और ये सोच सरकार की विचारधारा से मेल नहीं खाती.’ उन्होंने मोरारजी का पोर्टफ़ोलियो बदलने का आदेश दे दिया. वे इसके लिए राज़ी नहीं हुए और उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया.

अब रास्ता साफ़ था. 19 जुलाई, 1969 को एक अध्यादेश जारी करके सरकार ने देश के 14 बड़े निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया. जिस आर्डिनेंस के ज़रिये ऐसा किया गया वह ‘बैंकिंग कम्पनीज आर्डिनेंस’ कहलाया. बाद में इसी नाम से विधेयक भी पारित हुआ और कानून बन गया. यह इंदिरा की पहली जीत थी.

एक मोहरे का सफर जिसे वज़ीर ने बादशाह बना दिया?

कांग्रेस सिंडिकेट के सदस्य मोरारजी देसाई के निकाले जाने पर इंदिरा से नाराज़ हो गए. पर अगर वे कुछ कदम उठाते, तो देश में संदेश जाता कि ये लोग देश हित में नहीं हैं. लिहाज़ा, सिंडिकेट अपमान का घूंट पीकर रह गया.

उधर, राष्ट्रपति डॉ जाकिर हुसैन की अचानक मौत से इंदिरा गांधी को एक और मौका मिला. कांग्रेस के उम्मीदवार नीलम संजीव रेड्डी के बजाय इंदिरा ने निर्दलीय कैंडिडेट वीवी गिरी के पक्ष में अपने खेमे के लोगों से हवा बांधने को कहा. नैयर लिखते हैं कि कांग्रेस के नेता एसके पाटिल ने राष्ट्रपति के चुनाव के बाद एक आम सभा में कहा कि इंदिरा ने हिटलर के प्रोपेगैंडा मॉडल की तरह काम किया था. उन्होंने कांग्रेस में यह प्रचलित करवा दिया था कि गिरी कम्युनिस्ट विचारधारा के व्यक्ति हैं और इसीलिए वे राष्ट्रपति के लिए एक बेहतर विकल्प हैं.

इससे, इंदिरा गांधी और सिंडिकेट के संबंध और बिगड़ गए. जब इंदिरा से इसका कारण पूछा गया तो उन्होंने बड़े नाटकीय अंदाज़ में रोते हुए इसे अपने पर इल्ज़ाम बताया. सिंडिकेट ने इंदिरा से कहा कि वे पार्टी को संबोधित करते हुए कांग्रेस उम्मीदवार को वोट देने की बात कहें. इंदिरा ने बड़े ही गोलमोल तरीक़े से नेताओं को अपनी ‘अंतरात्मा की आवाज़’ पर वोट देने को कहकर सारा मामला ही बिगाड़ दिया. नतीजन कांग्रेस के नेताओं में फूट पड़ गयी. कुछ ने संजीव रेड्डी के पक्ष में, तो कुछ ने वीवी गिरी के पक्ष में मतदान किया. वीवी गिरी जीत गए! यह इंदिरा की दूसरी जीत थी.

कांग्रेस के दो फाड़

पानी अब सर के ऊपर से गुज़र चुका था. कांग्रेस अध्यक्ष निजलिंगप्पा और इंदिरा के बीच ज़बरदस्त पत्र व्यवहार शुरू हो गया. 12 नवंबर 1969 को इंदिरा गांधी को कांग्रेस पार्टी से निष्कासित कर दिया गया.

अब तक जैसा पीएन हक्सर और टीम ने सोचा था, कमोबेश वैसा ही हो रहा था. कांग्रेस और में देश इंदिरा की छवि एकसमाजवादी नेता के तौर पर उभरी. पार्टी के नौजवान नेताओं का धड़ा खुलकर उनके समर्थन में खड़ा हो गया. उन्होंने कांग्रेस (आर) की स्थापना कर ली और दूसरी तरफ़ मूल पार्टी कांग्रेस (ओ) कहलाई.

दिसंबर में दोनों पार्टियों ने अपने-अपने अधिवेशन किये. आल इंडिया कांग्रेस कमेटी के 705 सदस्यों में से 429 इंदिरा के साथ थे. इनमें से 220 लोकसभा में सदस्य थे. पर सरकार बनाने के लिए इंदिरा गांधी की कांग्रेस (आर) पार्टी को अब 45 सदस्यों की ज़रूरत थी. ऐसे में कांग्रेस की लेफ्टवादी छवि को देखते हुए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने उनको समर्थन देने की घोषणा कर दी. और इस तरह इंदिरा गांधी दोबारा सरकार बनाने में कामयाब हो गयीं. यह इंदिरा गांधी की निर्णायक जीत थी. बाद में कांग्रेस (ओ) का नामोनिशान मिट गया.

बैंकों के राष्ट्रीयकरण के क्या नतीजे रहे?

राष्ट्रीयकरण के बाद बैंकों की शाखाओं में ज़बरदस्त बढ़ोतरी हुई. शहर से उठकर बैंक गांव-देहात की तरफ चल दिए. आंकड़ों के मुताबिक़ जुलाई 1969 को देश में बैंकों की सिर्फ 8322 शाखाएं थीं. 1994 के आते आते यह आंकड़ा साठ हज़ार को पार गया.

इसका फ़ायदा हुआ कि बैंकों के पास काफी मात्रा में पैसा इकट्टा हुआ और आगे बतौर क़र्ज़ बांटा गया. प्राथमिक सेक्टर, जिसमें छोटे उद्योग, कृषि और छोटे ट्रांसपोर्ट ऑपरेटर्स शामिल थे, को फ़ायदा हुआ. सरकार ने राष्ट्रीय बैंकों को दिशा-निर्देश देकर उनके लोन पोर्टफ़ोलियो में 40 फीसदी कृषि लोन की हिस्सेदारी की बात की. बैंकों के ज़रिये रोज़गार भी बढ़ा.

दूसरी तरफ़, अपने टार्गेट और व्यक्तिगत लाभ के चलते, आंख बंद करके पैसा बांटा गया जिससे बैंको का एनपीए बढ़ा. आज यह आंकड़ा आठ लाख करोड़ रु से भी ज्यादा हो चुका है. फ़ायदा लेने वालों में रसूखदार ही थे. छोटे किसान या व्यापारी हाशिये पर खड़े रह गए. 1980 में बैंकों के राष्ट्रीयकरण का दूसरा दौर चला जिसमें और छह निजी बैंकों को सरकारी कब्ज़े में लिया गया.