इस किताब के अध्याय ‘महिषासुर आंदोलन की सैद्धांतिकी : एक संरचनात्मक विश्लेषण’ का एक अंश : इस आंदोलन का सिर्फ इतना ही कहना है कि देश के विभिन्न हिस्सों में विविध समुदायों द्वारा महिषासुर को अपने नायक के रूप में देखा जाता है. कुछ समुदाय ऐसे हैं जो बहुत पहले से दुर्गा-पूजा के दिन को शोक-दिवस के रूप में मनाते हैं. देश के इस छोर से लेकर उस छोर तक बहुत सारे स्थान हैं, जहां महिषासुर के स्थल हैं...कुछ लोग अपने महिषासुर की आराधना भी करते हैं, प्रार्थना भी करते हैं. मैसूर जैसे स्थलों का नाम ही महिषासुर के नाम पर पड़ा है...

कर्नाटक, उत्तर प्रदेश (महोबा), महाराष्ट्र के कई हिस्से और मध्य प्रदेश (खजुराहो- छतरपुर),... के अलावा झारखण्ड, पश्चिम बंगाल आदि जगहों पर अपने को महिषासुर का वंशज मानने वाले लोग भी हैं. इसमें झारखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन भी शामिल हैं. इसके अलावा प्रोफेसर महेश गुरू, वंदना टेटे, सुषमा असुर, चरियन महतो, उदयन राय, दामोदर गोप आदि अनेक लोग अपने को महिषासुर का वंशज बताते हैं...

यहां यह कहना अत्यन्त आवश्यक है कि महिषासुर की इतनी व्यापक उपस्थिति बताती है कि भारत में एक विशाल समुदाय ऐसा रहा है जो महिषासुर को अपना नायक मानता रहा है. यह समुदाय किसी महान सभ्यता, संस्कृति और जीवन-पद्धति का वाहक था जिसका विध्वंस किया गया.’


किताब - महिषासुर : मिथक और परंपराएं

संपादक - प्रमोद रंजन

प्रकाशक - फॉरवर्ड प्रेस

कीमत - 850 रुपये


किसी भी चीज के मूल्यांकन में नजरिया बेहद अहम होता है. यह बात वर्तमान या अतीत की किसी घटना के अलग-अलग नजरिये से किये गए विश्लेषणों को देखकर अच्छे से समझी जा सकती है. यह एक नजरिया ही है जो पीड़ित को अपराधी या फिर अपराधी को पीड़ित बना सकता है! प्रमोद रंजन ने इस किताब में महिषासुर नामक धार्मिक-ऐतिहासिक पात्र को बिल्कुल नए नजरिये से दिखाने का बेहद अच्छा और प्रभावी प्रयास किया है.

अभी तक भारतीय इतिहास का मुख्यतः तीन दृष्टियों से अध्ययन किया गया है. औपनिवेशिक, राष्ट्रवादी और वामपंथी. यह किताब भारतीय इतिहास को चौथी दृष्टि, यानी बहुजन की नज़र से देखने की ईमानदार कोशिश करती है. साथ ही अपने पक्ष में बहुत सारे तर्क-तथ्य देती हुई उनका व्यापक विश्लेषण भी करती है. लगभग सभी नई इतिहास दृष्टियों ने अपने से पहले की इतिहास दृष्टियों को सिरे से नकारते हुए खुद को बेहतर कहा है. बहुजन इतिहास दृष्टि भी अपने से पूर्व के सभी ऐतिहासिक दृष्टिकोणों को लगभग सिरे से खारिज करती है. इस एक आधार पर बहुजन इतिहास दृष्टि को ज्यादा मानवीय कहा जा सकता है कि यह उन असंख्य बेजुबानों की जड़ें खोजने की कोशिश करती है जो आज तक गुमनाम हैं या जिन्हें गलत संदर्भों में याद किया जाता है.

यह किताब पहले की सभी प्रचलित मान्यताओं, मिथकों, विश्वासों और दृष्टियों को एक तरह से उलट कर सिर के बल खड़ा कर देती है. इस लिहाज से यह किताब समाज के एक बड़े तबके के लिए विस्फोटक सामग्री साबित हो सकती है. हमारे समाज में देव और दैत्य, सुर और असुर के बीच बहुत ही स्पष्ट सी विभाजक रेखा खींचकर एक को अच्छा और दूसरे को घृणित कहा गया है. यह किताब इस बहुप्रचलित मान्यता के ठीक उलट, असुरों को एक नये मानवीय अवतार में हमारे सामने लाने का साहस करती है.

महिषासुर नामक असुर के बारे में गौरी लंकेश अपने एक लेख में कहती हैं -

‘एक दैत्य या महान उदार द्रविड़ शासक, जिसने अपने लोगों की लुटेरे-हत्यारे आर्यों से रक्षा की? महिषासुर ऐसे व्यक्तित्व का नाम है जो सहज ही अपनी ओर लोगों को खींच लेता है. उन्हीं के नाम पर मैसूर नाम पड़ा है. यद्यपि हिन्दू मिथक उन्हें दैत्य के रूप में चित्रित करते हैं, चामुंडी द्वारा उनकी हत्या को जायज ठहराते हैं, लेकिन लोकगाथाएं इससे बिल्कुल भिन्न कहानी कहती हैं. यहां तक कि बीआर अम्बेडकर और जोती राव फुले जैसे क्रांतिकारी चिन्तक भी महिषासुर को एक महान उदार द्रविड़ शासक के रूप में देखते हैं, जिसने लुटेरे-हत्यारे आर्यों (सुरों) से अपने लोगों की रक्षा की.’

एक बड़ा मौजूं सवाल यहां उठता है कि क्या गौरी लंकेश की हत्या के लिए गुस्साए प्रगतिशीलों में इतना नैतिक साहस है कि वे उनकी मान्यताओं और विश्वासों को भी मान सकें? क्या वे सच में उनकी दृष्टि से इतिहास का पाठ पढ़ने का धैर्य रखते हैं?

2011 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में आयोजित ‘महिषासुर शहादत दिवस’ मनाये जाने के बाद कर्नाटक, छत्तीगढ़, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, ओडिशा, झारखंड, पश्चिम बंगाल और गुजरात के सैकड़ों इलाकों में महिषासुर दिवस मनाए जाने की खबरें प्रमुखता से सामने आईं. अपनी किस्म के बिलकुल नए इस आंदोलन के बारे में प्रमोद रंजन लिखते हैं -

‘महिषासुर आंदोलन का उद्देश्य शव-साधना नहीं है. यह आंदोलन हिंसा और छल के बूते खड़ी की गई असमानता पर आधारित संस्कृति के विरुद्ध है. यह दुर्गा पंडालों से महिषासुर की मूर्तियां हटवाने, रावण का पुतला जलाने से रोकने, महिषासुर या रावण की ‘पूजा’ करने के लिए नहीं है. बल्कि सामाजिक घृणा के स्थान पर स्थाई प्रेम की बुनियाद रखने के लिए है. यह सिर्फ धार्मिक-सांस्कृतिक प्रतीकों को ही जलाए जाने का विरोध नहीं करता, बल्कि विरोध-प्रदर्शनों में पुतला जलाने तक का विरोधी है. यह सुकरात से लेकर गौरी लंकेश तक की परंपरा से अपना रिश्ता जोड़ता है.’

देश के विभिन्न हिस्सों में महिषासुर को भैंसासुर, मैकासुर, कारस देव या करिया देव आदि नामों से भी जाना जाता है. न सिर्फ बहुत सारे समाजों की परंपराओं के मूल में महिषासुर संबंधी परंपराएं मिलती हैं, बल्कि पुरातत्व विभाग की नजर में भी भैंसासुर स्मारकों और मंदिरों आदि की बहुत अहमियत है. यह अलग बात है कि पुरातत्व विभाग ने ऐसे मंदिरों को बुनियाद बनाकर अतीत के अध्यायों में इन पात्रों की भूमिकाओं को सही या नई तरह से पढ़ने में कभी भी कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई. ‘भैंसासुर स्मारक मंदिर’ को ‘खजुराहो के मंदिरों’ से भी ज्यादा महत्वपूर्ण साबित करने वाले एक तथ्य का खुलासा करते हुए प्रमोद यहां बताते हैं -

‘स्मारक मंदिर’ वाले टीले की चारदीवारी के भीतर पुरातत्व विभाग ने एक साइन बोर्ड लगा रखा है, जिसमें उसके बारे में कोई जानकरी नहीं है. सिवाय इसके कि ‘अगर कोई इस स्मारक को क्षति पहुंचाता है तो उसे एक लाख रूपए का जुर्माना अथवा दो वर्ष तक के कारावास का दंड दिया जाएगा’...खजुराहो के प्रसिद्ध मंदिरों में पुरातत्व विभाग ने जो बोर्ड लगा रखा है, उसमें लिखा है कि, ‘अगर कोई इस स्मारक को क्षति पहुंचाता है तो उसे तीन माह का कारावास दिया जाएगा अथवा वह पांच हजार रुपये के अर्थदंड का भागी होगा.’ शायद सिर्फ हमारी ही नहीं, पुरातत्व विभाग की नजर से भी ‘भैंसासुर स्मारक मंदिर’, खजुराहो के मंदिरों से अधिक मूल्यवान है. अन्यथा दंड में इतना फर्क क्यों होता?’

इस किताब में सदियों से पीड़ित होती रही दलितों-आदिवासियों की भावनाओं को बेहद तथ्यात्मक तरीके से अभिव्यक्त किया गया है. इस कारण हो सकता है कि यह किताब मुख्य धारा के सवर्ण तबकों की भावनाओं को आहत करने का भी सबब बन जाए.

यह किताब महिषासुर संबंधी मिथक और परंपराओं के बहाने असल में पूरे भारतीय इतिहास को बिलकुल नई नजर से देखती है. इस कारण प्रचलित मान्यताओं, परंपराओं और विश्वासों को उलट देती है. इस किताब में ऐसा कोई भावात्मक आख्यान नहीं है, जिसमें सदियों से वंचित रहा तबका अवसर पाते ही कुछ भी रोने-गाने लगा हो. कतई नहीं. यह किताब देश की मुख्य धारा में प्रचलित विश्वासों और मान्यताओं को काफी प्रमाणिक तरीके से कटघरे में खड़ा करती है और बेहद गंभीर सवाल उठाती है.

इतिहास, समाज विज्ञान और सांस्कृतिक विमर्श के छात्रों, शोधकर्ताओं और अध्येताओं के लिए यह एक बेहद जरूरी किताब है, क्योंकि यह उन कोनों में प्रकाश डालती है जो इतनी चकाचौंध के समय में भी नितांत घुप्प अंधेरे में पड़े हैं. साथ ही उन संस्कृतिकर्मियों के लिए भी यह बहुत महत्वपूर्ण किताब है जो देश की आत्मा को जिंदा रखने का दायित्व अपने कंधों पर समझते हैं.