कुछ वर्ष पहले तक हमारे देश में आलम यह था कि परिवार के किसी सदस्य की विदेश यात्रा, एक बड़ी घटना की तरह खानदान के इतिहास में दर्ज होती थी. शहर में कई दिनों तक इसकी चर्चा रहती थी. कस्बा इस बात पर, बात-बात में, बेबात ही गर्व का अनुभव कर लिया करता था. उस शख्स का जिक्र कुछ यूं होता था, ‘फलाने साहब फॉरेन रिटर्न हैं.’ कई बार तो विदेश यात्रा से लौटने पर आदमी का अपने ही शहर में बाकायदा यहां-वहां औपचारिक सम्मान तक होता था और उससे आग्रह किया जाता था कि वह अपनी विदेश यात्रा का अनुभव सबको सुनाये. वह रस ले लेकर सुनाता भी था. लोग सुनते भी थे. पर वे दिन हवा हुए.

अब विदेश यात्राओं पर जाना एक आम सी बात हो गई है. कितने ही लोग काम धन्धे के लिए जाते रहते हैं. बहुत से लोगों के बच्चे विदेश में काम कर रहे हैं. अपने बच्चों के पास बीच-बीच में जाकर मिलते रहने के लिये उनकी विदेश यात्राओं के सिलसिले बनते रहते हैं. ऐसे लोग ज्यादातर वरिष्ठ या कुछ ज्यादा ही वरिष्ठ होते हैं. इनकी यात्राओं की अपनी हेल्थ रिस्क रहती हैं.

दिनों-दिन बढ़ती संख्या उन लोगों की भी है जो बस पर्यटन के लिये विदेश यात्रा पर जा रहे हैं. इनमें भी बहुत बड़ी संख्या पचास पार की उम्र वालों की है. ये लोग अपनी बढ़ी हुई उम्र की परवाह किये बिना, एकदम नई-नई जगहों पर, लंबी-लंबी हवाई, समुद्री और सड़क यात्राओं पर जा रहे हैं. ये खतरनाक ऊंचाइयों पर, अतल गहराइयों में और ऐसी ठंडी जगहों पर जाने को तैयार हैं जहां ‘बस मजा आ जाये.’

विदेश जाने वाले ये लोग अपनी इस उम्र तक पहुंचते-पहुंचते हाई बीपी, डाइबिटीज़ या हार्ट अटैक से भी गुजर चुके होते हैं. किसी की एंजियोप्लास्टी या बाईपास सर्जरी भी हो चुकी होती है. ये कई तरह की दवाइयों पर भी हो सकते हैं. पर इनके पास एक जज्बा है जो यूं तो काबिले तारीफ है परन्तु एक अलग ही मेडिकल चुनौती भी पेश करता है. यह चुनौती कई सवालों के रूप में सामने आती है.

विदेश यात्रा से पहले कई तरह के सवाल उठते हैं और ये सवाल केवल वरिष्ठ नागरिक की उम्र में पहुंचे पर्यटकों के ही नहीं हैं. कुछ सवाल लगभग हर उम्र के पर्यटक पर लागू होते हैं. आप पूरी तरह से स्वस्थ नौजवान भी हों तब भी और साठ-सत्तर साल के हो गये हों तब भी, विदेश यात्रा पर आपके बीमार पड़ने का खतरा तो हमेशा रहता ही है. विदेश जाकर अचानक ही बीमार पड़ जाना एक अतिरिक्त भय पैदा करने वाली घटना है क्योंकि तब आप एक नितांत अपरिचित माहौल और समाज में होते हैं.

वहां आपके परिवार के लोग होते नहीं. वहां के सिस्टम से आपका कोई परिचय नहीं. आप केवल अंग्रेजी जानते हैं या अपनी भाषा. वहां की स्थानीय भाषा मात्र समझने वाले नागरिक आपकी सहायता करना भी चाहे तो मजबूर सा है. आप कुछ बताना चाहते हैं, सामने वाला समझता नहीं. आप वहां कोई अपनी जानकारी वाली दवा खरीदने भी जाते हैं तो वहां पर किसी और ही भाषा में लिखी हुई दवाई की बोतलें सामने रहती हैं जो आपके डॉक्टर द्वारा लिखे नाम से अलग होती हैं. दवाई बेचने वाला आपकी बात समझ ही नहीं रहा. आप समझा नहीं पा रहे. वह आपके पेश किये गये भारतीय डॉक्टर द्वारा दिये प्रिस्क्रिप्शन को समझ नहीं पाता. कुल मिलाकर विदेश में बीमार पड़ने की सोचकर भी भय लगता है.

अब इसी से जुड़े कुछ आंकड़े देखिये -

आंकड़े बताते हैं कि विदेश यात्रा पर जाने वाले पर्यटकों में से कम से कम, लगभग पांच प्रतिशत तो इतने बीमार हो ही जाते हैं कि उन्हें किसी डॉक्टर को दिखाना पड़ जाये. वहीं एक प्रतिशत ऐसे बीमार होते हैं कि फिर उनको अस्पताल में भर्ती होना पड़ जाता है. आंकड़े यह भी बताते हैं कि इन भर्ती वालों में से लगभग एक प्रतिशत ऐसे बीमार हो सकते हैं कि मृत्यु तक हो जाये. विदेश यात्रा में मौत के कारणों में मात्र एक प्रतिशत तो किसी बड़े इन्फेक्शन का नतीजा होते हैं वरना लगभग 44 प्रतिशत मौतें हार्ट अटैक या लकवे (स्टोक) से, और लगभग 22 प्रतिशत मौतें वहां किसी न किसी दुर्घटना के कारण ही होती हैं.

इनमें से कई बीमारियां रोकी जा सकती हैं या उनका इंतजाम करके जाया जाए तो यात्रा में स्वस्थ रहा जा सकता है. तो जब भी विदेश यात्रा पर जाना हो तो ये कुछ प्रश्न खुद से जरूर पूछें. इन प्रश्नों का उत्तर जाने या समझे बिना विदेश यात्रा पर निकलना ठीक नहीं.

पहला सवाल - क्या मैं इस यात्रा के लिए मेडिकली फिट हूं?

दूसरा सवाल - अभी फिट होने के बावजूद, विदेश यात्रा पर मुझे किन-किन बीमारियों या मेडिकल प्रॉब्लम्स की आशंका के लिए तैयार रहना चाहिए?

तीसरा सवाल - मुझे अपने साथ किन दवाओं का किट बनाकर ले जाना चाहिये?

चौथा सवाल - क्या मुझे कुछ महत्वपूर्ण टीके भी लगवाकर यात्रा पर जाना चाहिए?

पांचवां सवाल - यात्रा से लौटने के बाद क्या कोई ऐसी स्वास्थ्य समस्या हो सकती है, जिसका सीधा संबंध इस विदेश यात्रा से निकलता हो?

अब हम इन सवालों के जवाब जानने-समझने की कोशिश करते हैं. पहला सवाल है - क्या मैं इस विदेश यात्रा के लिए फिट हूं?

यह प्रश्न उन लोगों के केस में महत्वपूर्ण है जिनको दिल की बीमारी, हाई ब्लड प्रेशर, एन्जियोप्लास्टी, बाईपास सर्जरी या लकवे का कोई अटैक कभी हुआ हो या सांस की कोई बीमारी हो.

अब सवाल आता है कि क्या ऐसे लोग अंतरराष्ट्रीय हवाई यात्रा के लिए फिट हैं? या कोई रिस्क है?

याद रहे कि हवाई जहाज के अंदर केबिन में जो दबाव बनाकर रखा जाता है वह लगभग वही होता है जो समुद्रतल से आठ हजार फीट की ऊंचाई पर होता है. इसे यूं जानें कि इस दबाव पर आक्सीजन करीब पचपन से साठ प्रतिशत के बीच हमें मिलती है जो सामान्यतः पर्याप्त है. लेकिन जिन लोगों के ह्रदय पहले ही कमजोर हों (हार्ट अटैक के बाद या बाईपास सर्जरी के बाद या एंजोप्लास्टी के बाद भी ऐसा हो जाता है), अथवा सांस की बीमारी रही हो या कभी कोई थ्रॉम्बोएंबोलिज्म हुआ हो तो उनको हवाई जहाज में ऑक्सीजन कम महसूस हो सकती है.

तो जब तक समुचित जांचों द्वारा डाक्टर आपके हृदय को ठीक-ठाक न पाए, हवाई यात्रा एक रिस्क रहेगी. ऐसे में अपनी ईसीजी, ईकोकार्डियोग्राफी आदि बताई गई जांचें करवा कर ही यात्रा पर निकलें.

यदि इनमें से उपरोक्त कोई भी बीमारी आपको हो तो बंजी डाइविंग, समुद्र में स्कूवा डाइविंग, सी वॉकिंग, पैरासेलिंग आदि में भी रिस्क होगा. बेहतर होगा कि यह सब न ही करें या इनको करने के लिए अपनी फिटनेस के बारे में अपने डॉक्टर से जांच करा के ही जाएं.

चूंकि यह विषय थोड़ा और विस्तार चाहता है सो हम इस लेख की अगली किस्त में बाकी के इन सवालों के उत्तर देने की कोशिश करेंगे.