‘गिलोटिन’ एक यंत्र होता है. कुछ दशक पहले तक यूरोप के कई देशों में इस यंत्र का इस्तेमाल अपराधियों को मौत की सजा देने के लिए किया जाता था. इस यंत्र के ऊपरी हिस्से में लोहे की एक बड़ी भारी ब्लेड लगी होती है. ब्लेड के ठीक नीचे एक तख़्त होता है जिस पर अपराधी को बांध दिया जाता है. जैसे ही ऊपर से लोहे की ब्लेड गिराई जाती है, अपराधी का सर एक ही झटके में धड़ से अलग हो जाता है.

‘गिलोटिन’ यंत्र का प्रयोग अब बंद हो चुका है लेकिन इस शब्द का प्रयोग आज भी अलग-अलग अर्थों में किया जाता है. भारतीय संसदीय प्रणाली में भी इस शब्द का प्रयोग बजट सत्र के दौरान किया जाता है. बजट सत्र में सभी मंत्रालय अनुदान के लिए अपनी-अपनी मांग रखते हैं. इन मांगों पर चर्चा होती है जिसके बाद सदन इन्हें संशोधनों के साथ या उसके बिना ही पारित कर देता है. चूंकि हमारी व्यवस्था में 50 से भी ज्यादा मंत्रालय हैं लिहाजा हर मंत्रालय की मांगों पर विस्तार से चर्चा कर पाना संभव नहीं होता. ऐसे में अंतिम दिन तक भी जिन मांगों पर चर्चा नहीं हुई हो उन्हें एक साथ ही मतदान के लिए रख दिया जाता है और एक झटके में ही सभी मांगों को स्वीकार कर लिया जाता है. इस प्रक्रिया को ही ‘गिलोटिन’ कहते हैं.

‘गिलोटिन’ प्रक्रिया अंतिम विकल्प होता है और अमूमन इसे सत्र के आख़िरी दिनों में ही इस्तेमाल किया जाता है. लेकिन इन दिनों संसद का जो सत्र चल रहा है, उसमें देश का पूरा बजट ही ‘गिलोटिन’ प्रक्रिया से पारित कर दिया गया. किसी एक भी मंत्रालय की मांगों पर चर्चा नहीं हुई, न विनियोग और वित्त विधेयक पर और लगभग 24 लाख करोड़ रुपयों का बजट बिना किसी चर्चा के पारित कर दिया गया.

भारतीय लोकतंत्र में किसी भी पूर्ण बहुमत वाली सरकार के लिए मनचाहा बजट पारित करवाना कोई मुश्किल काम नहीं है. लेकिन फिर भी सरकार के लिए संसद की अनुमति लेना इसीलिए बाध्यकारी होता है ताकि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था बनी रहे और सरकार हमेशा संसद के प्रति जवाबदेह रहे. लेकिन बीते बुधवार जिस तरह से पूरा बजट सरकार ने गिलोटिन प्रक्रिया से पारित करवाया है, उसे देख कर कई लोग यह भी मान रहे हैं कि ऐसा करके सरकार ने लोकतंत्र को ही गिलोटिन पर लेटा दिया है. इस सत्र के दौरान संसद में जो कुछ हुआ, वह लोकतंत्र के लिए कितना घातक है यह समझने के लिए बीते बुधवार के घटनाक्रम को जानते हैं.

सुबह 11 बजे संसद का सत्र शुरू ही हुआ था कि विपक्ष ने पीएनबी घोटाले जैसे मुद्दों को लेकर हंगामा शुरू कर दिया. इसके चलते पहले दो मिनट के भीतर ही लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने सदन को 12 बजे तक स्थगित कर दिया. लेकिन इसके साथ ही उन्होंने यह भी कह दिया कि 12 बजे अनुदान मांगों पर गिलोटिन प्रक्रिया के जरिये वोटिंग होगी. इसी पर तमाम जानकार आश्चर्य जता रहे हैं. बजट सत्र ख़त्म होने में अभी लगभग तीन सप्ताह का समय बाकी था. इसके बावजूद भी ऐसी हड़बड़ी करते हुए चर्चा की गुंजाइश को ही समाप्त कर दिया गया.

12 बजे जब सदन दोबारा शुरू हुआ तो अध्यक्ष ने सभी सदस्यों से प्रस्ताव मांगे. इनमें कटौती प्रस्ताव भी शामिल थे जिन्हें ‘कट मोशन’ कहा जाता है. ये प्रस्ताव बजट में संशोधन के लिए सदस्यों द्वारा दिए जाते हैं. इनके जरिये तमाम सांसद मंत्रालय की मांगों पर अपनी आपत्ति दर्ज करते हैं और उनमें संशोधन की मांग करते हैं. लेकिन इनमें से किसी भी प्रस्ताव पर चर्चा नहीं हुई और अध्यक्ष ने इन सभी प्रस्तावों को दो मिनट के भीतर ही एक साथ खारिज करने की घोषणा कर दी.

इसके तुरंत बाद अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने एक-एक कर सभी मंत्रालयों की अनुदान मांगों को पढ़ना शुरू किया और फिर एक साथ सभी मांगों को ध्वनि मत से पारित कर दिया. इस दौरान विपक्ष के कई सांसद विरोध में ‘केंद्र सरकार हाय-हाय’ कहते रहे लेकिन उनके ‘हाय-हाय’ को भी शायद अध्यक्ष ने ‘आय-आय’ सुन लिया. संसद में ध्वनि मत के दौरान सहमति में वोट देने वाले सदस्य ‘आय’ ही कहा करते हैं.

इस तरह से 50 से ज्यादा मंत्रालयों की अनुदान मांगों को पांच मिनट से भी कम समय में पारित कर दिया गया जबकि इस प्रक्रिया में अमूमन एक हफ्ते का समय लगता है. इसके बाद विनियोग विधेयक - जो सरकार को अनुदान मांगों के मुताबिक भारत की संचित निधि से धन खर्च करने की अनुमति देता है - को भी इसी तरह से कुछ ही मिनटों में पारित कर दिया गया. सदन को स्थगित करने से पहले अध्यक्ष ने घोषणा की थी कि 12 बजे अनुदान मांगों को लिया जाएगा. उस वक्त शायद ही कोई जानता था कि इन मांगों के साथ ही वित्त विधेयक को भी इसी तानाशाही प्रक्रिया से पारित कर दिया जाएगा. लेकिन जब ये मांगें और विनियोग विधेयक पारित हो गए, तब अचानक ही वित्त विधेयक को भी इस प्रक्रिया में शामिल कर दिया गया.

लगभग सवा 12 बजे अध्यक्ष ने वित्त विधेयक को भी वोटिंग के लिए ले लिया और एक-एक कर इसके प्रावधान पढ़ने शुरू कर दिया. वित्त विधेयक कर आदि में संशोधन के जरिये धन जुटाने करने की प्रक्रिया में बदलाव लाने का काम करता है. इस बार विधेयक में वित्त मंत्री अरुण जेतली द्वारा सुझाए गए 21 संशोधन भी शामिल थे. इन सभी संशोधनों के साथ इस विधेयक को ध्वनिमत से पारित कर दिया गया. अमूमन वित्त विधेयक घंटों की चर्चा के बाद पारित होता है, लेकिन बीते बुधवार यह काम 15 मिनट से भी कम समय में पूरा कर दिया गया. इस तरह से बिना किसी चर्चा के, बिना किसी विपक्षी आवाज़ को सुने हुए देश का बजट पारित हो गया. यह सब जिस तरीके से हुआ उससे यह सवाल भी खड़ा होता है कि अगर बजट ऐसे ही पारित होना है तो आखिर संसद का औचित्य ही क्या है?

लेकिन चिंता का विषय सिर्फ वह प्रकिया ही नहीं है जिसे अपनाते हुए इस बार बजट पारित किया गया. बल्कि इसके जरिये लाये गये परिवर्तन भी हैं. वित्त विधेयक में बिना बहस के हुए संशोधनों के जरिये राजनीतिक दलों के निरंकुश हो जाने की राह पहले से भी आसान कर दी गई है. इन संशोधनों के बाद अब राजनीतिक दलों की वह जवाबदेही भी ख़त्म हो गई है जो उन्हें विदेशी पैसा लेने से रोकती थी या इस पैसा का हिसाब जनता को बताने के लिए बाध्य करती थी.

वित्त विधेयक के जरिये इस बार ‘विदेशी सहायता विनियमन कानून’ (एफसीआरए) में भी संशोधन किये गए हैं. इन संशोधनों को पूर्ववर्ती प्रभाव से लागू किया गया है. इसका नतीजा ये है कि पिछले 42 सालों में राजनीतिक दलों ने जो भी चंदा विदेशों और विदेशी कंपनियों से लिया, अब उस पर कोई सवाल खड़े नहीं किये जा सकेंगे. ये उसी चालाकी का विस्तार है जो चालाकी सरकार ने 2016 में की थी. तब सरकार ने एफसीआरए में परिभाषित ‘विदेशी कंपनियों’ की परिभाषा को ही बदल दिया था.

‘विदेशी कंपनियों’ की परिभाषा में यह बदलाव इसलिए किया गया था क्योंकि 2014 के लोकसभा चुनावों से ठीक पहले दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक अहम फैसला सुनाया था. न्यायालय ने तब कांग्रेस और भाजपा दोनों को ही विदेशी कंपनियों से पैसा लेने का दोषी पाया था और इन दोनों ही पार्टियों के खिलाफ कार्रवाई के आदेश दिए थे. फिर यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा जहां 2016 के अंत में इस पर सुनवाई होनी थी. लेकिन इससे पहले ही सरकार ने ‘विदेशी कंपनियों’ की परिभाषा को ही बदल दिया और इस बदलाव को भी पूर्ववर्ती प्रभाव से लागू कर दिया. ऐसा करने के बाद कांग्रेस और भाजपा दोनों हाथों में हाथ डाले सुप्रीम कोर्ट पहुंचे और मुस्कुराते हुए न्यायालय से बाहर निकल आए.

2016 में की गई इसी चालाकी को अब और भी विस्तार दिया गया है और इन बदलावों को 42 साल पीछे ले जाते हुए साल 1976 से लागू कर दिया गया. यानी 1976 से लेकर अब तक जिन भी राजनीतिक दलों ने विदेशी कंपनियों से पैसा लिया, उनके खिलाफ अब कोई कार्रवाई नहीं होगी. यहां ये समझना भी महत्वपूर्ण है कि ‘विदेशी सहायता विनियमन कानून’ यानी एफसीआरए वित्त मंत्रालय के नहीं बल्कि गृह मंत्रालय के अधीन है. लिहाजा इसमें होने वाले संशोधनों को वित्त विधेयक में शामिल नहीं किया जाना चाहिए था. लेकिन ऐसा सिर्फ इसलिए किया गया ताकि वित्त विधेयक की आड़ में इन्हें आसानी से पारित करवा लिया जाए.

इन तमाम बातों को जानने के बाद क्या यह कहा जा सकता है कि हालिया बजट एक ‘लोकतांत्रिक बजट’ या एक ‘लोकतांत्रिक देश का बजट’ है? दुर्भाग्य ये भी है कि मुख्यधारा के मीडिया में बजट के इस तरह से पारित होने की चर्चा न के बराबर हो रही है. और चर्चा हो भी कैसे, देश के ‘सबसे तेज’ और सबसे ज्यादा टीआरपी वाले चैनल तो इन दिनों समुद्र में गोता लगाते हुए ‘श्रीकृष्ण की नगरी’ की खोज में निकले हुए हैं.