फ़ेसबुक पर कुछ दिनों से सेना के एक जवान की पिटाई का वीडियो चर्चा का विषय बना हुआ है. वीडियो में भीड़ में शामिल कई लोग जवान को पीटते दिख रहे हैं. इसे लेकर अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं. कहीं इसे सेना के प्रति ‘कश्मीरियों की नफ़रत’ से जोड़कर देखा जा रहा है तो कहीं इसे रोहिंग्या मुसलमानों को शरण देने का नतीजा बताया जा रहा है. नीचे वीडियो देखा जा सकता है.

वीडियो को लेकर एक पोस्ट में कहा गया है, ‘यह वीडियो अभी-अभी जम्मू से आया है. क्या गृह मंत्रालय तुरंत कुछ करेगा? किसी जवान की यह हालत भारत की जनता नहीं सहेगी. तुरंत जांच हो कि क्या हमला करने वाले रोहिंग्या हैं?’ एक और वायरल पोस्ट में कहा गया है, ‘आंखें खोलो और देखो, हमारे जवानों के साथ कश्मीर में क्या हो रहा है. अगर देश को फिर से ग़ुलाम होने से बचाना है तो भारत देश का हरेक नागरिक इस वीडियो को सौ लोगों को शेयर करे.’

ज़्यादातर लोगों ने इन बातों को सच मान लिया है. वे रोहिंग्या मुसलमानों और कश्मीरियों को कोसने के साथ सरकार के कार्रवाई नहीं करने पर उसकी आलोचना कर रहे हैं. लेकिन क्या सच में इस वीडियो को लेकर किए जा रहे दावे सही हैं?

जांच करने पर इस दावे की तो पुष्टि होती है कि वीडियो कश्मीर का ही है, लेकिन यह हालिया हुई किसी घटना का नहीं है. साथ ही इसे सेना को लेकर कश्मीरियों की ‘नफ़रत’ या रोहिंग्या मुसलमानों से जोड़ना सही नहीं है. दरअसल यह घटना उस डर का नतीजा थी जो कई साल पहले दिल्ली में काले बंदर और पूर्वी उत्तर प्रदेश में मुंहनोचवा की अफ़वाहों के समय देखने को मिला था. दिल्ली में काले बंदर का ख़ौफ़ इतना था कि कई लोग अपने घर छोड़ कर भाग गए थे. वहीं, उत्तर प्रदेश में मुंहनोचवा का ऐसा आतंक फैला कि उसे ख़त्म करने के चक्कर में कई मासूम लोगों की हत्या कर दी गई थी.

ऐसा ही कुछ पिछले साल हुआ था. उत्तरी भारत के कई राज्यों में चोटी कटवा की अफ़वाह उड़ी थी. दावा किया गया कि कोई रहस्यमय तरीक़े से महिलाओं की चोटी काट के भाग जाता है. उस समय की रिपोर्टों के मुताबिक़ देश के आठ राज्यों में चोटी कटवा का आतंक फैल गया था. कश्मीर में भी महिलाओं के बाल काटे जाने की घटनाएं सामने आई थीं. पहली घटना सितंबर 2017 में हुई और उसके बाद कई घटनाओं की रिपोर्टें मिलीं. लेकिन किसी घटना की रिपोर्ट में पीड़ित ने कटे बाल बतौर सबूत जमा नहीं कराए. फिर भी घाटी के लोगों में चोटी कटवा का आतंक फैलता चला गया.

हालात तब और बिगड़ गए जब अलगाववादी नेताओं ने चोटी कटवा की घटनाओं को सेना से जोड़ दिया. अलगाववादियों ने आरोप लगाया कि चोटी कटवा के हमलों के पीछे सुरक्षाबलों का हाथ है. इसी बीच 17 अक्टूबर 2017 को कुपवाड़ा में सेना के एक जवान को चोटी कटवा होने के शक में भीड़ ने पकड़ लिया और बुरी तरह पीटा. पुलिस ने बड़ी मुश्किल से उसे बचाया.

जानकारों के मुताबिक अब चूंकि घटना कश्मीर में हुई इसलिए सोशल मीडिया के खिलाड़ियों के लिए लोगों की भावनाओं को भड़काना आसान हो गया. वहीं, वीडियो को रोहिंग्या मुसलमानों से जोड़ने की कोशिश इसलिए कामयाब रही क्योंकि एक बड़े वर्ग की राय है कि उन्हें शरण नहीं दी जानी चाहिए वर्ना भारत की सुरक्षा को ख़तरा हो सकता है. लेकिन दोनों ही दावे ग़लत साबित हुए हैं.