मैंने कभी अपने दादा जी को नहीं देखा इसलिए अक्सर ही एक उम्र पार कर चुके लोगों को देखकर मैं उनकी एक इमेज बना लेता हूं - अगर मेरे दादा जी होते तो वे कितने कूल होते! क्या वे कभी मज़ाक में मेरे कॉलेज के पहले दिन मुझे जेब खर्च के साथ किसी लिफाफे में यह कविता भी लिखकर देते!

‘उसका हाथ

अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा

दुनिया को

हाथ की तरह गरम और सुंदर होना चाहिए.’

और मैं उनसे उनके स्कूल की या मोहल्ले की या शहर की कोई ऐसी बात पूछता जो मेरे पूरे परिवार, खानदान, जात, बिरादरी में किसी को नहीं पता. क्या वे अपने पोते के आगे अपना सब कुछ खोलकर रख देते! क्या वे बैठकर मुझे सिखाते कि प्यार होता कैसे है और हो जाए तो उसे ऐसे कैसे लिखते हैं कि वह पूरी दुनिया का हो जाए!

मैंने पहली बार केदारनाथ सिंह जी की कवितायें किसी ट्रेन के सफर में पढ़ीं थीं. ऐसा लगा था जैसे मैं ट्रेन में नहीं किसी उड़न खटोले में बैठा हूं और अभी उड़कर पूरा आसमान छान मारूंगा.

केदारनाथ सिंह जी को जब भी पढ़ा मुझे यह भरोसा हुआ कि हमें जादू में विश्वास होना चाहिए. नहीं तो ट्रेन कभी उड़न खटोला हो सकती है! और किसी लड़की के हाथ में पूरी दुनिया और उसकी सुंदरता!

मैंने कई बार उनको अपना दादा जी जैसा सोचा है, उनसे बातें की हैं और उन्हें लिखा है. एक दिन सुबह सैर पर जाते हुए उन्होंने मुझे बताया था कि जब मैं तुम्हारी उम्र का था तो जर्मन कवि रिल्के की इस बात को अपना मंत्र बना लिया था:

‘एक कवि में इंतज़ार का माद्दा होना चाहिए’

मैं किसी शाम उनसे पूछता कि ‘दादा जी कविता कैसे आती है?’ तो वे एक कागज़ पर लिखकर धीरे से सरका देते कि

‘नहीं याद आते तो महीनों तक नहीं आते,

मगर जब याद आते हैं तो अक्सर याद आते हैं’

बस ऐसे ही आती है कविता, इससे ज़्यादा कभी फुर्सत से बताऊंगा.

मैं उनसे पूछता कि आप महीना भर के लिए दिल्ली छोड़कर गांव क्यों चले जाते हैं? चकिया में एक छोटा सा मकान और पांच बीघा खेत ही तो है. इस पर वे झिड़ककर बोलते – ‘गांव शक्ति बटोरने जाता हूं.’

जब वे गांव से दिल्ली को झेलने की ताकत बटोर कर लौटते तो मैं सोने से पहले किसी दिन मज़ाक-मज़ाक में उनसे पूछता - ‘क्या लगता है आपकी कविता से क्रांति आएगी?’

वे अपना चश्मा उतारकर रख देते फिर कुछ देर बाद कहते - ‘जो लोग यह समझते हैं कि कविता से क्रांति आएगी वे कविता के मूलरूप को ही नहीं समझते. कविता क्रांति के लिए माहौल तैयार करती है बस...’

‘आप मुझे इतनी पर्चियां लिख कर देते हैं कभी आपको पापा को कुछ लिखकर देना हुआ तो क्या लिखकर देंगे’ एक बार जब मैंने उनसे पूछा तो उन्होंने बिना एक मिनट गंवाये लिखा:

‘और सबसे बड़ी बात मेरे बेटे,

कि लिख चुकने के बाद,

इन शब्दों को पोंछकर साफ़ कर देना,

ताकि कल जब सूर्योदय हो

तो तुम्हारी पटिया,

रोज़ की तरह,

धुली हुई,

स्वच्छ चमकती रहे’

मैं अगर अपनी सारी बातचीत लिखने बैठूंगा तो शायद कई किताबें लिखनी पड़ें. मुझसे अक्सर लोग पूछते हैं कि लिखना क्यों चाहिए तो इसका जवाब मैं ऐसे ही टाल देता हूं. मुझे लगता है लिखा हुआ, और खासकर के अच्छा लिखा हुआ, छोड़कर जाना इस पूरी दुनिया के नाम वसीयत करके जाने जैसा है. जिसको पाकर कोई भी अमीर हो सकता है. एक-दो घर, कुछ ज़मीन से लेकर पूरी एक एम्पायर तक अपने बच्चे के लिए छोड़कर जाना एक अच्छी कविता के आगे कितना छोटा हो सकता है, यह केदारनाथ सिंह जी की हर एक कविता इस दुनिया में तब तक चीखती रहेगी जब तक कि शब्द हैं.