अभी एक केंद्रीय मंत्री ने वेदों के ‘विज्ञान’ की तुलना स्टीफन हॉकिन्स और अल्बर्ट आइंस्टीन के भौतिक-विज्ञान संबंधी सिद्धांतों से कर दी. इसके बाद से हमारे वामपंथी मित्रों के बीच चुटकुलों का दौर चल रहा है. वे पूछ रहे हैं कि वैदिक लोग अगर ‘विज्ञान’ के मामले में हॉकिन्स से आगे थे, तो उन्होंने वैदिक युग में ही ‘हॉकिन्स’ प्रेशर-कुकर का आविष्कार क्यों नहीं कर लिया!

इस मामले में अगर हम क्रिया-प्रतिक्रियाओं को देखें तो ये हमारे समाज के एक बड़े ही नकारात्मक पहलू की तरफ इशारा करती हैं. दरअसल अंध-महिमामंडन और कुस्वादु-महिमाखंडन की ये दोनों ही प्रवृत्तियां घोर सभ्यतागत आत्महीनता की परिचायक हैं. इसी आत्महीनता की वजह से दक्षिणपंथी धारा अपने भगवान गणेश के सिर का प्रत्यारोपण कर पुष्पक-विमान से ब्रह्मांड का चक्कर लगाती रहती है. और वामपंथी धारा, खासकर नव-वामपंथियों को लगता है कि भारत का वैदिक ज्ञान-विज्ञान और चिंतन जो है, जितना है, बस यही ‘गल्प-गुच्छ’ है.

वास्तव में, यह समस्या ‘विज्ञान’ या ‘साइंस’ के संकीर्ण और व्यापक अर्थ को लेकर भी है. भौतिक विज्ञान से लेकर सामाजिक विज्ञान और मनोविज्ञान तक ‘तथ्य (फैक्ट्स) बनाम मूल्य (वैल्यूज़)’ और ‘ऑब्जेक्टिविटी बनाम सब्जेक्टिविटी’ का कोई अंतिम समाधान हमें मिल ही गया हो, ऐसा नहीं है. दर्शन, तत्व-मीमांसा और अध्यात्म में जीवन और ज्ञान के दूसरे रहस्य हमें अब भी रोमांचित और प्रेरित करते ही हैं. तर्क ने यदि भावना को पूरी तरह जीत लिया होता, तो हमारा साहित्य एकदम नीरस हो चुका होता और हमारी कला बंजर हो चुकी होती. भौतिक वास्तविकताएं हमारी कल्पनाओं को सीमाओं में कैद कर चुकी होतीं. सोचने वाली बात है कि क्या हिमालय पर जमी बर्फ में हमें हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का रासायनिक समीकरण मात्र ही दिखाई देता है? क्या जंगल और खेतों की हरितिमा में हम क्लोरोफिल और प्रकाश-संश्लेषण ढूंढ़ते फिरते हैं.

न चाहते हुए भी कहना पड़ता है कि आज के भारत का दक्षिणपंथ और वामपंथ यहां की सामान्य और श्रमनिष्ठ जनता को ‘गिनी-पिग’ या बलि का बकरा से अधिक कुछ नहीं समझता. एक पंथ उसे अंध-श्रद्धा की ओर धकेलकर उसका राजनीतिक इस्तेमाल करना चाहता है, और दूसरा उसे अंध-अश्रद्धा की ओर ले जाकर निरा भौतिकतावादी बनाना चाहता है. इन पंक्तियों के लेखक की हाल में एक हिंदू संगठन के प्रचारक से भेंट हुई. उसने कहा कि वह आजकल हिंदुओं के बीच मांसाहार को बढ़ाने का प्रचार कर रहा है. इसके लिए वह पौराणिक कहानियों तक का सहारा लेता है. उसका मानना था कि यदि हिंदू अधिकाधिक मांसाहारी नहीं बने, तो वे किसी आसन्न संघर्ष की स्थिति में अन्य धर्मपंथियों का मुकाबला नहीं कर पाएंगे.

ठीक इसी तरह वामपंथ भी सबको अंध-अश्रद्धा की ओर ले जाकर निरा भौतिकतावादी बनाना चाहता है और भूल जाता है कि मनुष्य का व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन ऐसा एकांगी नहीं होता. संसाधन के बंटवारे और उत्पादन-संबंधों की एक तर्कसंगत व्याख्या कर पाने में सक्षम होने के बावजूद भौतिकतावाद की अपनी सीमाएं हैं. स्वाभाविक अस्तित्ववादी प्रश्नों का पूरा समाधान वहां भी नहीं है. वास्तविक शांति, करुणा और चरित्र हासिल कर पाने की गारंटी वहां भी नहीं है. फिर कोई इतने फ़ैसलाकुन तरीके से कैसे एक-दूसरे हल्के दर्जे का व्यंग्य करता रहता है. दरअसल यह सतही आत्मविश्वास हमारी पंथवादी सोच की वजह से होता है. फिर चाहे वह दक्षिणपंथ हो, वामपंथ हो, पुराणपंथ हो या कुरानपंथ.

यदि हमारे सारे वामपंथी मित्र एकदम वैज्ञानिक मिज़ाज या ‘साइंटिफिक टेम्प्रामेंट’ वाले हो चुके होते, तो इनमें से एक भी शारीरिक रूप से तोंदिल न होते. आपस में ही परस्पर-द्वेषी न होते. शराब और सिगरेट से अपना कलेजा न जला रहे होते. हमारे वामपंथी मित्र कह सकते हैं कि विज्ञान को समझना एक बात है और इसे जीवन में अपनाना दूसरी बात.

लेकिन ठीक यही बात तो अध्यात्मवादी भी कहते हैं कि प्राचीन शास्त्रों को उनके कथित अनुयायियों के आधार पर मत कोसो. अध्यात्म वास्तव में मनोविकारों को या शरीर और मन की संवेदनाओं को समझने का एक विज्ञान है. इसका भी अपना एक अनुशासन है. इसके भी अपने नियम और सूत्र हैं. इसमें भी प्रयोग और साधना की एक लंबी परंपरा रही है. अलग-अलग मत-मतांतर रहे हैं. समय, काल, परिस्थिति और व्यक्तिविशेष के आधार पर विकृतियां, भटकाव और भ्रष्टाचरण भी इसमें आए ही होंगे. तो क्या हम किसी मूढ़ पुराणपंथी या धर्मांध कुरानपंथी को देखकर उसे समस्त आध्यात्मिक परंपरा का प्रतिनिधि घोषित कर देंगे? और ऐसे मूढ़जनों की आड़ में संपूर्ण आध्यात्मिक परंपरा की लानत-मलानत कर स्वयं को एक से बढ़कर एक मार्क्सवादी साबित करने का तात्कालिक संतोष पाएंगे? क्या हम इसी से सामाजिक वास्तविकताओं को ‘वैज्ञानिक’ रूप से देखने-समझने का व्यापक नजरिया हासिल कर पाएंगे? क्या हम लोगों के हृदय को छूकर उनसे जुड़ पाएंगे या उनका प्रबोधन कर पाएंगे?

आज कहीं एक सौ आठ पुरोहित मिलकर गायों को भागवत का पाठ सुना रहे हैं. जबकि उसी भागवत में यहां-वहां बिखरे कुछ ज्ञान के मोती यदि ये पुरोहित अपने जीवन में अपना लेते, तो इनका वास्तविक कल्याण हो सकता था. कहीं कोई स्वयंभू पंडित पहले से धुआं-प्रदूषित मेरठ शहर में पांच सौ क्विंटल लकड़ी जलाकर उसे शुद्ध करने का ‘अच्युतचंडी यज्ञ’ कर रहा है. दूसरी तरफ कहीं कोई मौलवी फतवा जारी कर मुस्लिम पुरुषों को व्यभिचार का लाइसेंस दे रहा है या कोई दूसरा मौलवी दुनियाभर में इस्लाम का परचम लहराने का ख्वाब दिखाता रहता है. आजकल ऐसे मूढतापूर्ण कार्यों को धर्म और अध्यात्म मान लिया जाता है और इसके विरोधी संपूर्ण आध्यात्मिक परंपरा को जाने-अनजाने एक ही डंडे से हांकने लग जाते हैं.

दुनिया की तमाम सुख-सुविधाएं और प्रसिद्धि भोग लेने के बाद जब लियो टॉल्सटॉय के मन में आत्महत्या का विचार पैदा हुआ, तो उन्होंने समकालीन दुनिया के सभी बड़े वैज्ञानिकों, दार्शनिकों, साहित्यिकों और धर्मोपदेशकों के साथ संवाद स्थापित कर जीवन और विज्ञान की इस बहुपक्षीय पहेली को समझने की कोशिश की थी. उन्होंने अपनी आत्मकथा में इस विषय पर एक लंबा प्रसंग लिखा है. उन्होंने प्रचलित सामाजिक विज्ञान और प्राकृतिक विज्ञान की अक्षमताओं और विरोधाभासों के बारे में तात्कालिक निष्कर्ष के रूप में लिखा-

‘मैं समझ गया कि ये सब विज्ञान बड़े दिलचस्प हैं, बड़े आकर्षक हैं; पर जीवन के प्रश्न के ऊपर उनके प्रयोग का जहां तक सवाल है वे उल्टी दिशा में ही ठीक और स्पष्ट हैं. वे जीवन के प्रश्न का उत्तर देने की जितनी ही कोशिश करते हैं, उतना ही अधिक आकर्षण-हीन होते जाते हैं. अगर कोई विज्ञानों के उस विभाग की तरफ ध्यान दे जो जीवन के प्रश्न का उत्तर देने की कोशिश करता है (इस विभाग में शरीर-विज्ञान, मनोविज्ञान, समाज विज्ञान आदि हैं) तो वहां उसे विचारों की आश्चर्यजनक दीनता, सबसे अधिक अस्पष्टता, अप्रासंगिक प्रश्नों को हल करने का एक बिल्कुल अनुचित और झूठा दावा तथा हरेक विज्ञानी द्वारा दूसरे का, और अपने द्वारा अपने ही बातों का, निरंतर खंडन होता दिखाई देगा.

वहीं अगर हम उन विज्ञानों की तरफ देखते हैं, जिनका जीवन के प्रश्नों को हल करने से कोई संबंध नहीं है, पर जो स्वयं अपने विशेष वैज्ञानिक प्रश्नों का जवाब देते हैं; तो इंसान की दिमागी ताकत को देखकर मुग्ध हो जाना पड़ता है. लेकिन हम पहले से ही जान चुके होते हैं कि वे जीवन के प्रश्नों का कोई जवाब नहीं देते. वे तो जीवन के प्रश्नों की उपेक्षा करते हैं. उनका कहना होता है कि ‘तुम क्या हो और क्यों जीते हो’ इस प्रश्न का न तो हमारे पास जवाब है और न उसके बारे में हम सोचते हैं. हां, अगर तुम प्रकाश और रासायनिक मिश्रणों के नियम जानना चाहो...अगर तुम गुण और परिमाण का संबंध जानना चाहो... तो हमारे पास स्पष्ट, यथार्थ और निर्विवाद उत्तर मौजूद हैं.’

ये तो हालत कर दी गई है हमारे विज्ञानों की. ज्यों-ज्यों वैज्ञानिक उपलब्धियों, खोजों और उत्पादों का अहंकार बढ़ता जा रहा है, वैसे-वैसे जीवन के प्रश्नों पर हमारी समस्याओं की जटिलता और असहायता भी बढ़ती जा रही है. लेकिन इसी वैज्ञानिकता के बचाव में हम शांति की खोज करने वाली आध्यात्मिक परंपरा को दुत्कारते हुए कहने लगते हैं कि तुम वैज्ञानिक हो तो हमें अपने ग्रंथों में रॉकेट साइंस ढूंढ़ के दिखाओ. विज्ञान के इस चलताऊ अर्थ के बजाए नई और ज्यादा वैज्ञानिक पीढ़ियों से अपेक्षा की जाती है कि वह विज्ञान को केवल जेनेटिक्स, रोबोटिक्स, इन्फॉर्मेटिक्स या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे विषयों तक ही रीड्यूस कर देने की भूल न करे.

वे लोक-विज्ञान को हेय न समझें. वे स्वयं में सभी प्रकार के विज्ञानों को आत्मसात करने की विनम्रता पैदा करें. वे अपने आप में सभी प्रकार के विज्ञानों की व्यापकता और उपयोगिता के प्रति कृतज्ञताभाव पैदा करें. प्रकृति के अद्भुत रहस्यों को अलग-अलग ‘वैन्टेज प्वाइंट’ या नजरिए से समझने की अनेकान्तवादी उदारता विकसित करें. तब जाकर विज्ञान बनेगा विज्ञान. वास्तव में, धर्मपंथों के नाम पर बांटने और लड़ाने वाले पंथवादी या संप्रदायवादी सियासी विचार और अंधविश्वास ऐसे ही विज्ञान की कसौटी पर अपना दम तोड़ देंगे. तब जाकर प्रकट होगा और खिलेगा वैज्ञानिक युग का वैज्ञानिक अध्यात्म. तब जाकर सम्पूर्णता की ओर बढ़ेगा जीवन का भौतिक, नैतिक और भावनात्मक विज्ञान.

क्या हमारे कथित ‘वैज्ञानिक’ समुदाय ने संपूर्ण-धरती को ही बीसियों पर नष्ट कर सकने लायक परमाणु-हथियार नहीं बनाए हैं. यह कौन सी वैज्ञानिकता है जिसने पृथ्वी को रहने और बचने लायक नहीं छोड़ा है? यह कौन सी वैज्ञानिकता है, जो समूची मानव जाति को मिटा सकने लायक तरह-तरह के घातक और विषैले जैविक-रासायनिक हथियार बना चुका है? यदि केवल भौतिक प्रगति और आविष्कारमूलक विज्ञान से ही मनुष्य का कल्याण हो सकता, तो अतीत की विकसित सभ्यताएं मिटी नहीं होतीं. सभी तरह के विज्ञान एक-दूसरे के पूरक हैं. आविष्कारमूलक विज्ञान हमें नित नए साधन और सहूलियत दे रहा है, लेकिन उन्हीं साधनों के केवल नैतिक और कल्याणकारी इस्तेमाल का विवेक देने वाला विज्ञान भी तो विज्ञान ही है न? क्या हमारे भौतिक विज्ञान में अहिंसा, प्रेम, त्याग, संयम, सादगी और करुणा का पाठ भी पढ़ाया जाता है?

वेद, उपनिषद्, गीता, ताओ-ते-चिंग, धम्मपद या संसारभर के ऐसे ही अन्य आध्यात्मिक शास्त्रों को विज्ञान के इस व्यापक अर्थों की कसौटी पर ही कसना चाहिए. जो शास्त्र ऐसे संपूर्णतावादी विज्ञान की कसौटी पर खरा उतरेगा, केवल वही कायम रहेगा. ‘सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय’ की तर्ज पर वैज्ञानिक पीढ़ियां उसका परिष्कार करेंगी. इसलिए आत्मश्लाघापूर्ण महिमामंडन और प्रतिक्रियावादी महिमाखंडन करनेवाले सभी पंथवादियों को चाहिए के वे भी स्वयं को इस विज्ञान की कसौटी पर कसते रहें. क्योंकि जब-जब धर्मशास्त्र और विज्ञान का इस्तेमाल सियासत के लिए हुआ है, तब-तब वे न केवल आत्मघाती, बल्कि दुनियाभर के लिए विनाशकारी साबित हुए हैं, और हो रहे हैं.