हाल में केंद्रीय सूचना आयोग ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट सार्वजनिक की थी. साल 2016-17 की इस रिपोर्ट में बताया गया है कि केंद्रीय वित्त मंत्रालय सूचना के अधिकार यानी आरटीआई के तहत दिए गए आवेदनों को ख़ारिज करने में सबसे आगे रहा. मीडिया और सोशल मीडिया के एक हिस्से में इस तथ्य को थोड़ा ट्विस्ट के साथ दिखाया गया. जानकारी इस तरह दी गई जिससे लगे कि 2016-17 के दौरान आरटीआई आवेदनों को ख़ारिज करने वाले मंत्रालयों की लिस्ट में वित्त मंत्रालय के शीर्ष पर होने की वजह नोटबंदी है. कुछ ख़बरों में तो बाक़ायदा सीआईसी के हवाले कहा गया है कि नोटबंदी के बाद वित्त मंत्रालय ने सबसे ज़्यादा आरटीआई आवेदन ख़ारिज किए.

आर्थिक मामलों के कई जानकार और आलोचक मानते हैं कि नोटबंदी अपने उद्देश्यों की प्राप्ति में असफल रही. सरकार भी (वित्त मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय दोनों) नोटबंदी को लेकर आरटीआई के ज़रिए मांगी गई जानकारियां देने से इनकार करती रही है. वहीं, सूचना आयोग ने भी सरकार और वित्त मंत्रालय की तरफ़ से जानकारी नहीं देने पर संबंधित अफ़सरों को तलब किया है या मंत्रालय को जानकारी देने का निर्देश दिया है.

लेकिन ये सभी बातें अलग हैं. इनसे यह साबित नहीं होता कि वित्त मंत्रालय नोटबंदी की वजह से आरटीआई आवेदनों को ख़ारिज करने में सबसे आगे रहा. इस बारे में सीआईसी की सभी वार्षिक रिपोर्टें देखने पर पता चलता है कि ऐसा केवल अंदाज़े के आधार पर कह दिया गया.

सीआईसी की सभी वार्षिक रिपोर्टें बताती हैं कि 2005 में आरटीआई क़ानून लागू होने के बाद से आवेदनों को रद्द करने के मामले में ज़्यादातर मौकों पर वित्त मंत्रालय ही सबसे ऊपर रहा है. सरकार चाहे एनडीए की हो या यूपीए की, वित्त मंत्रालय अन्य सभी मंत्रालयों के मुक़ाबले ज़्यादा आवेदनों को ख़ारिज करता रहा है. अब तक केवल दो बार ऐसा हुआ है जब वित्त मंत्रालय की जगह कोई और मंत्रालय जानकारी नहीं देने के मामले में शीर्ष पर रहा हो. 2010-11 की रिपोर्ट में वित्त मंत्रालय सातवें नंबर पर रहा और 2013-14 की रिपोर्ट में तीसरे नंबर पर. बाक़ी सभी सालों की रिपोर्टों में वह सबसे ऊपर रहा. यानी आवेदनों को ख़ारिज करने वाले मंत्रालयों की लिस्ट में वित्त मंत्रालय का शीर्ष पर होना एक सामान्य बात है.

यहां यह सवाल ज़रूर उठाया जा सकता है कि हर साल वित्त मंत्रालय ही क्यों आरटीआई आवेदनों को सबसे ज़्यादा ख़ारिज करता है. लेकिन वह एक अलग मुद्दा है. साल 2016-17 की रिपोर्ट के मुताबिक़ वित्त मंत्रालय ने अपने यहां आए कुल 1,51,186 आरटीआई आवेदनों में से 27,833 आवेदन रद्द कर दिए. यानी उसने 18.41 प्रतिशत आवेदनों का जवाब नहीं दिया. लेकिन 2015-16 की रिपोर्ट के आंकड़ों में भी कोई ख़ास अंतर दिखाई नहीं देता. उस साल 1,55,308 आवेदन आए और 28,453 रद्द कर दिए गए. यानी 18.32 प्रतिशत आवेदनों का जवाब नहीं दिया गया.

इसी तरह 2014-15 में 20.23, 2013-14 में 19.16, 2012-13 में 21.34 और 2011-12 में 16.34 फीसदी आवेदनों को रद्द किया गया. वहीं, आरटीआई क़ानून के शुरुआती सालों की रिपोर्टों पर ग़ौर किया जाए तो पता चलता है कि 2006-07 में 32.71 फीसदी आवेदनों को रद्द कर दिया गया था. उसके बाद 2007-08, 2008-09 और 2009-10 में क्रमशः 26.65, 22.75 और 21.63 प्रतिशत आवेदन ख़ारिज कर दिए गए. इन सभी सालों के दौरान नोटबंदी जैसा कोई क़दम नहीं उठाया गया था फिर भी वित्त मंत्रालय सबसे ऊपर रहा.

इसके अलावा ख़ुद सीआईसी की रिपोर्ट में इस बात का ज़िक्र नहीं है कि नोटबंदी वाले साल में वित्त मंत्रालय ने सबसे ज़्यादा आरटीआई आवेदनों को रद्द कर दिया. आप इस लिंक पर जाकर सीआईसी की रिपोर्ट देख सकते हैं. इसमें कहीं भी नोटबंदी का ज़िक्र नहीं है. मीडिया रिपोर्टों में यह भी बताया गया कि ज़्यादातर आवेदन आरटीआई क़ानून की धारा 8 (1) का हवाला देकर रद्द कर दिए गए. इसके लिए इस धारा के उस नियम का सहारा लिया गया जिसके मुताबिक़ अगर प्राधिकारी (या मंत्रालय) इस बात से संतुष्ट न हो कि सूचना सार्वजनिक करने से अधिकांश जनता का हित जुड़ा है, तो उसे सूचना देने से छूट है.

सीआईसी की सभी वार्षिक रिपोर्टों के मुताबिक़ आरटीआई क़ानून की जिस धारा के तहत सबसे ज़्यादा आवेदन रद्द किए गए हैं वह सेक्शन 8 (1) है. बताया गया कि इस साल कुल 51 प्रतिशत आवेदन इस धारा के नियमों के तहत रद्द कर दिए गए. हालांकि ऐसा नहीं है कि इसी साल 50 प्रतिशत से ज़्यादा आवेदन इस धारा के तह रद्द किए गए हों. सीआईसी की रिपोर्टें बताती हैं कि 2009-10 से लेकर अब तक एक दो अपवादों को छोड़कर ऐसा ही रहा है.