2017 में हुए विधानसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी को जबर्दस्त बहुमत मिला था. समाजवादी पार्टी (सपा), बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और कांग्रेस का प्रदर्शन बहुत ही बुरा रहा. लेकिन उन नतीजों के तकरीबन साल भर बाद दो लोकसभा सीटों गोरखपुर और फूलपुर में हुए हालिया उपचुनाव के नतीजों ने विपक्ष की साल भर पहले की निराशा थोड़ी कम होती दिखती है. ऐसे में सवाल उठता है कि 2017 के जबर्दस्त झटके के साल भर बाद और 2019 के लोकसभा चुनावों के तकरीबन साल भर पहले उत्तर प्रदेश में विपक्ष कहां खड़ा है.

उत्तर प्रदेश की मुख्य विपक्षी पार्टी सपा है. अपनी आंतरिक कलह से निकलकर सपा अखिलेश यादव की अध्यक्षता में एक नया आकार लेती दिख रही है. यह सपा मुलायम सिंह यादव की सपा से कई मामले में अलग दिख रही है. मुलायम सिंह यादव के दौर में सपा में प्रभावी रहे अमर सिंह, शिवपाल सिंह यादव, आजम खान और नरेश अग्रवाल जैसे लोग अब अखिलेश के आसपास नहीं हैं. अखिलेश के आसपास बिल्कुल नई टीम है. पुरानी टीम के जो लोग हैं भी, उनकी पहचान अब अखिलेश यादव से जुड़ गई है.

मुलायम सिंह के दौर में परिवार के कई लोग पार्टी में सक्रिय थे. अब अखिलेश यादव ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वे परिवार को आगे नहीं बढ़ाएंगे. अखिलेश की पत्नी डिंपल यादव के बारे में यह घोषणा हो गई है कि वे अगला लोकसभा चुनाव नहीं लड़ेंगी. इसका मतलब यह हुआ कि मुलायम सिंह यादव के परिवार से अखिलेश के अलावा जो लोग अभी सांसद या विधायक हैं, उनका राजनीतिक भविष्य भी अभी स्पष्ट नहीं है.

सत्ता से बेदखल होने के साल भर बाद अभी उत्तर प्रदेश की मुख्य विपक्षी पार्टी सपा में एक बदलाव यह भी दिख रहा है कि वह हर जाति को अपने साथ लेकर चलने पर अधिक ध्यान दिए बगैर खुद को पिछड़ों की पार्टी के तौर पर और मजबूती से पेश करने में लगी है. अखिलेश यादव खुलेआम पिछड़ों और वंचितों के नाम पर सपा की राजनीति आगे बढ़ाने की बात कर रहे हैं. पार्टी के लोगों की मानें तो अखिलेश को लगता है कि मायावती के कमजोर होने और योगी आदित्यनाथ के उभार से पिछड़े वर्ग के लोगों में एक राजनीतिक असुरक्षा का भाव पैदा हुआ है और अगर ठीक ढंग से उन्होंने अपनी राजनीति आगे बढ़ाई तो यह वर्ग सपा के साथ आ सकता है.

इसी कोशिश के तहत बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन की कोशिश भी सपा की ओर से चल रही है. गोरखपुर और फूलपुर में बसपा ने सपा प्रत्याशी का समर्थन किया और दोनों सीटें सपा जीत गई. हालांकि सपा और बसपा के एक साथ आने और अगला लोकसभा चुनाव एक गठबंधन के तहत लड़ने की राह में बहुत रोड़े हैं. लेकिन उपचुनाव के नतीजों के बाद दोनों दलों की ओर से यह कोशिश चल रही है उत्तर प्रदेश में भाजपा को घेरने के लिए गठबंधन के विचार को साकार किया जाए.

उत्तर प्रदेश की राजनीति को जो लोग समझते हैं, उन्हें लगता है कि अभी की स्थिति में मायावती के लिए अकेले भाजपा का मुकाबला करना आसान नहीं है. अगर मायावती यह जोखिम लेती भी हैं तो इससे पूरा विपक्ष कमजोर होगा और अंततः इसका फायदा भाजपा को मिलेगा. ऐसे में मायावती के लिए रास्ता भी यही बचता है कि सपा से पुरानी प्रतिद्वंदिता को भूलकर एक गठबंधन बनाने की दिशा में बढ़ा जाए.

सपा-बसपा के इस संभावित गठबंधन को महागठबंधन बनाने की कोशिशें भी चल रही हैं. उत्तर प्रदेश में भी और राष्ट्रीय स्तर पर भी कुछ महत्वपूर्ण विपक्षी नेता इस बात के लिए प्रयासरत हैं कि सपा-बसपा और कांग्रेस का महागठबंधन हो. साथ ही इसमें अजित सिंह की राष्ट्रीय लोक दल और इसके अलावा पीस पार्टी जैसी उत्तर प्रदेश की छोटी पार्टियों को भी जोड़ा जाए. 2015 में बिहार विधानसभा चुनावों में बने महागठबंधन के तर्ज पर उत्तर प्रदेश में भी महागठबंधन बनाने की कोशिशें चल रही हैं.

कुल मिलाकर उत्तर प्रदेश में विपक्ष की स्थिति अभी यह है कि हर कोई अपने-अपने स्तर पर महागठबंधन को मूर्त रूप देने के लिए प्रयासरत है. उपचुनावों में प्रायोगिक गठबंधन को मिली कामयाबी के बाद प्रदेश में विपक्ष में यह आत्मविश्वास आया है कि अगर वे सभी मिलकर एक जगह आने में कामयाब हुए तो भाजपा के पास नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ जैसा प्रभावी चेहरा होने के बावजूद वे देश के सबसे बड़े राज्य में भाजपा का विजय रथ रोक सकते हैं.

हालांकि, हालिया संपन्न राज्यसभा चुनावों में सपा और बसपा के बीच अपेक्षित समन्वय का अभाव दिखा. नतीजतन भाजपा एक अतिरिक्त सीट जीतने में कामयाब हो गई. इसके बावजूद मायावती ने साफ कर दिया है कि सपा-बसपा का साथ बरकरार रहेगा. लेकिन सीटों के बंटवारे से लेकर अहं के टकराव और कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय जैसे कई अंतर्विरोध इस प्रस्तावित महागठंधन से जुड़े हुए हैं. इन्हीं अंतर्विरोधों से पार पाकर एक प्रभावी राजनीतिक गठजोड़ तैयार करना ही उत्तर प्रदेश में आज विपक्ष की सबसे बड़ी चुनौती है.