सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने एक बार फिर लोकपाल गठन को लेकर अपना मोर्चा खोल दिया है. इस बार उन्होंने लोकपाल की नियुक्ति के साथ-साथ किसानों से जुड़े मुद्दों को लेकर दिल्ली स्थित रामलीला मैदान में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की है. इससे पहले बीते साल गांधी जयंती पर उन्होंने लोकपाल की नियुक्ति को लेकर धरना दिया था.

कांग्रेसनीत यूपीए-2 की सरकार के दौरान साल 2011 में केंद्र में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्त कानून की मांग को लेकर आंदोलन कर चुके अन्ना हजारे अब इस मुद्दे पर मोदी सरकार को घेर रहे हैं. सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कुछ समय पहले उनका कहना था, ‘नई सरकार आई तो थोड़ी उम्मीद जागी, लेकिन इतने लंबे समय तक कानून को लटकाए रखने की वजह से मोदी सरकार की मंशा पर पूरे देश को शक पैदा होने लगा है.’

उधर, लोकपाल के गठन को लेकर सुप्रीम कोर्ट में भी एनजीओ कॉमन कॉज की एक याचिका पर सुनवाई चल रही है. लोकपाल और लोकायुक्त कानून-2013 के तहत नेता विपक्ष को चयन समिति में शामिल किए जाने का प्रावधान किया गया है. हालांकि, साल 2014 के चुनाव में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस को केवल 44 सीटें हासिल हुई थी. इसकी वजह से लोक सभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने उसके नेता को यह दर्जा नहीं दिया. संवैधानिक प्रावधानों के मुताबिक नेता विपक्ष का दर्जा हासिल करने के लिए कुल लोकसभा सीटों का 10 फीसदी (55) हासिल अनिवार्य होता है. इसे देखते हुए ही कॉमन कॉज की याचिका में नेता विपक्ष की जगह सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता को समिति में शामिल करने के लिए इस कानून में संशोधन की मांग की गई है.

इस याचिका पर सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने बीते महीने शीर्ष अदालत को बताया कि इसके गठन की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है. इसके लिए बीती एक मार्च को चयन समिति की बैठक भी बुलाई गई थी. इसमें लोक सभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे को ‘विशेष आमंत्रित अतिथि’ के रूप में बुलाया गया. इससे नाराज होकर उन्होंने इस बैठक में शामिल होने से इनकार कर दिया. उन्होंने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर अपनी आपत्ति दर्ज की. साथ ही, सरकार की नीयत पर भी सवाल उठाए. मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा, ‘विशेष आमंत्रित अतिथि के तौर पर मेरी मौजूदगी केवल दिखावा होती, क्योंकि इस हैसियत से मुझे बैठक में न अपनी राय रखने का अधिकार होता और न वोट देने का.’

इसके बाद छह मार्च की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने लोकपाल गठित करने के लिए केंद्र को 14 अप्रैल तक का वक्त दिया है. सरकार ने इस काम में देरी की वजह मल्लिकार्जुन खड़गे द्वारा बैठक में शामिल होने से इनकार और चयन पैनल में शामिल वरिष्ठ अधिवक्ता पीपी राव की मौत को बताया है. पीपी राव की मौत बीते साल सितंबर में हो गई थी.

देरी से दिखी सक्रियता पर भी सवाल

कांग्रेस के खिलाफ भ्रष्टाचार को मुख्य चुनावी मुद्दा बनाने वाली भाजपा ने अपने चुनावी घोषणापत्र में प्रभावशाली लोकपाल के गठन का वादा किया था. केंद्र की सत्ता में आने के बाद भी वह लगातार भ्रष्टाचारमुक्त भारत की बात दोहरा रही है. इसके बावजूद करीब चार साल के शासन में वह लोकपाल का गठन नहीं कर पाई है. इसकी वजह वह कानूनी प्रावधानों को बताती रही है. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की कई फटकारों के बाद अब वह इस पर कुछ सक्रियता दिखा रही है.

उधर, जानकार केंद्र की इस सक्रियता पर भी सवाल उठा रहे हैं. उनका कहना है कि मोदी सरकार नेता विपक्ष वाले प्रावधान की आड़ में लोकपाल के गठन को लटका रही है. दूसरी ओर, वह सीबीआई के मुखिया की नियुक्ति के लिए 2014 में ही दिल्ली स्पेशल पुलिस इस्टैब्लिशमेंट एक्ट (1946) को संशोधित कर चुकी है. सीबीआई प्रमुख की चयन समिति में भी ‘नेता विपक्ष’ का प्रावधान था. इसे संशोधित करके अब इस शब्द को ‘सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता’ कर दिया गया है. इसके अलावा सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून और केंद्रीय सतर्कता कानून में भी नेता विपक्ष न होने पर सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता को चयन समिति में शामिल करने का प्रावधान शामिल किया गया है.

लोकपाल की नियुक्ति करने वाली चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोक सभा अध्यक्ष, देश के मुख्य न्यायाधीश या उनके द्वारा नियुक्त न्यायाधीश, राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त कानूनी जानकार के साथ नेता विपक्ष को शामिल किया गया है. इससे पहले बीते साल अप्रैल में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से लोकपाल की नियुक्ति बिना किसी देरी के करने को कहा था. साथ ही, इस पर विशेष जोर दिया था कि नेता विपक्ष का प्रावधान इस नियुक्ति के रास्ते में नहीं आना चाहिए.

इस मामले में मोदी सरकार को सवालों के कटघरे में खड़ा करने वालों का कहना है कि यदि सीबीआई नियुक्ति के लिए संबंधित कानून किया जा सकता है तो लोकपाल के मामले में सरकार इससे दूर क्यों भाग रही है. दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद भी लोक सभा में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता को केवल ‘विशेष आमंत्रित सदस्य’ के रूप में बुलाना, उसकी मंशा को जगजाहिर करता है.

सवाल विपक्ष पर भी

इस मामले में सवाल विपक्ष की भूमिका पर भी उठ रहे हैं. नीरव मोदी सहित अन्य मामलों पर संसद में सरकार को घेरने वाली कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी पार्टियां लोकपाल के मुद्दे पर सरकार को कटघरे में खड़ा करने से बचती हुई दिखाई देती हैं. जानकारों के मुताबिक अगर विपक्ष की तरफ से इस मुद्दे का जिक्र होता भी है तो इसमें महज औपचारिकता पूरी करने की कवायद होती है. इस मामले में दिल्ली की सत्ताधारी आम आदमी पार्टी (आप) का हाल भी ऐसा ही दिखता है जबकि उसका गठन ही लोकपाल आंदोलन के बाद देश को साफ सुथरी सरकार मुहैया कराने के दावे के साथ किया गया था.

मोदी सरकार पर अब तक लोकपाल की नियुक्ति न करने के साथ ही इस कानून को कमजोर करने का भी आरोप है. केंद्र ने साल 2013 के मूल कानून के कुछ प्रावधानों को लेकर 2016 में संसद में लोकपाल और लोकायुक्त संशोधित कानून पेश किया था. इसमें सरकारी अधिकारियों द्वारा अपनी संपत्ति घोषित करने के नियमों को निर्धारित करने की शक्ति केंद्र सरकार के हाथों में दे दी गई है. इससे पहले मूल कानून में सरकारी अधिकारी द्वारा खुद के साथ पत्नी और बच्चों की संपत्ति भी घोषित करने का प्रावधान किया गया था. साथ ही, इस जानकारी को संबंधित मंत्रालय की वेबसाइट पर सार्वजनिक करने की बात कही गई थी. इन संशोधनों को लेकर भी एक तबके का कहना है कि सरकार ने इस कानून को कमजोर करने के लिए संशोधित कानून तो संसद से पारित करवा लिया लेकिन, विपक्ष वाले प्रावधान में बदलाव के लिए कुछ नहीं किया. उनके मुताबिक इस कदम से साफ हो जाता है कि लोकपाल की नियुक्ति की को लेकर सरकार की मंशा क्या है.

भ्रष्टाचार के खिलाफ रामबाण माने जाने वाले लोकपाल के लिए जनता को पांच दशक तक का इंतजार करना पड़ा. इसकी मांग के लिए 2011 में देश की जनता बड़ी संख्या में सड़कों पर उतरी. फिर 2013 में कानून बना. लेकिन इसके पांच साल बाद भी इस कानून को जमीन पर नहीं उतारा जा सका है. इस आंदोलन को समर्थन देने वाली एक पार्टी केंद्र की सत्ता में करीब चार साल बिता चुकी है. दूसरी ओर, इस आंदोलन को खड़ा करने वालों का एक समूह भी दिल्ली की सत्ता हासिल करने के बाद इसे भूलता हुआ दिखाई देता है. विपक्ष भी संसद में इसे लेकर मौन नजर आता है. कुल मिलाकर लोकपाल का हाल ठन ठन गोपाल नजर आ रहा है.