व्लादिमीर पुतिन एक बार फिर रूस के राष्ट्रपति बन गए हैं. सोमवार को उन्होंने चौथी बार राष्ट्रपति पद की शपथ ली है और अब वे 2024 तक रूस के राष्ट्रपति बने रहेंगे. पुतिन जोसेफ स्टालिन के बाद रूस में सबसे ज्यादा समय तक राष्ट्रपति के पद पर रहने वाले नेता भी बन गए हैं.

साल 2000 में पहली बार चुनाव लड़कर राष्ट्रपति बने पुतिन की लोकप्रियता और ताकत में तब से लेकर अब तक लगातार इजाफा हुआ है. पहले चुनाव में मिले 53 फीसदी वोटों के मुकाबले इस बार उन्हें 77 फीसदी वोट हासिल हुए हैं. हालांकि पश्चिमी देश पुतिन पर चुनाव में धांधली का आरोप लगाते रहे हैं. इस आरोप में चाहे जितनी भी सच्चाई हो, लेकिन यह बात कोई नहीं नकार सकता कि इस दौरान जमीनी स्तर पर रूस में पुतिन के खिलाफ कोई बड़े प्रदर्शन या भारी माहौल बनते नहीं देखा गया. तो आखिर वे कौन-सी वजहें हैं जिनके चलते रूसी राष्ट्रपति की स्थिति आज वहां और मजबूत दिखाई देती है.

पहले दो कार्यकाल में देश की तस्वीर बदली

साल 2000 में जब पहली बार पुतिन रूस के राष्ट्रपति बने थे तब देश सोवियत संघ के पतन के बाद बदहाली से जूझ रहा था. उस समय रूस के लोग कमजोर आर्थिक स्थिति और भ्रष्टाचार से परेशान थे. ऐसे में देशवासियों को पुतिन में एक उम्मीद की किरण दिखाई दी और एक हद तक वे इस उम्मीद पर खरे भी उतरे. उन्होंने देश को आर्थिक संकट से बाहर निकाला.

साल 2000 से लेकर 2008 तक रूस की जीडीपी तेजी से बढ़ी और इस दौरान गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों की संख्या आधी हो गई. रूस पर निगाह रखने वाले कुछ जानकार कहते हैं कि इससे पहले तक रूस में अमीरी और गरीबी के बीच बड़ी भारी खाई थी. लेकिन सत्ता में आने के बाद पुतिन ने इसे तेजी से पाटने का काम किया. रूस की संघीय एजेंसी के अनुसार साल 2000 में रूस का प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय उत्पादन 49,800 रूबल था जो 2013 में बढ़कर 461,300 रूबल हो गया.

अपने शुरूआती आठ सालों के कार्यकाल में व्लादिमीर पुतिन ने सामाजिक कल्याण के क्षेत्र में भी काफी बदलाव किए. उन्होंने पेंशन बढ़ाने, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं के बुनियादी ढांचे में सुधार करने के साथ-साथ सामाजिक सुरक्षा कानूनों में भी बड़े बदलाव किए. इन सालों में उन्होंने लंबे समय से चली आ रही राजनीतिक अराजकता और कानून व्यवस्था को सुधारने के लिए कई नए कानून बनवाए. माना जाता है कि ये बड़े सुधार ही थे जिनकी वजह से रूस में जन्मदर बढ़नी शुरू हुई. कार्यशील जनसंख्या की कमी से जूझ रहे रूस में दो दशक बाद 2013 में पहली बार ऐसा हुआ जब देश की जन्मदर मृत्युदर से अधिक थी.

आक्रामक विदेश नीति ने पुतिन की ताकतवर नेता की छवि बनाई है

कई लोगों का मानना है कि पुतिन केवल इन बदलावों के चलते ही लोकप्रिय और ताकतवर नहीं बने हैं. इनके मुताबिक पुतिन ने जिस तरह से विश्व पटल पर रूस के वर्चस्व को फिर स्थापित किया है उसने भी इसमें बड़ी भूमिका निभाई है. 2014 में पश्चिमी देशों से टकराव की परवाह किए बिना क्रीमिया को रूस में शामिल करने के फैसले का उनकी ताकतवर नेता की छवि बनाने में अहम योगदान रहा है.

जोसेफ स्टालिन की मौत के बाद सोवियत संघ की कमान संभालने वाले निकिता ख्रुश्चेव ने 1954 में क्रीमिया यूक्रेन को तोहफे के तौर पर दे दिया था. तब रूस और यूक्रेन दोनों ही सोवियत संघ का हिस्सा थे, इसलिए इस फैसले पर न तो जनता को कोई आपत्ति थी और न ही नेताओं को. लेकिन, जब यूक्रेन 1991 में आजाद हुआ तो क्रीमिया की अधिकांश आबादी रूस में विलय की मांग करने लगी. क्रीमिया में 59 प्रतिशत लोग रूसी मूल के हैं. हालांकि इस मांग के समर्थन में रूस ने कभी खुलकर ज्यादा सक्रियता नहीं दिखाई, लेेकिन जब यूक्रेन नाटो और यूरोपीय देशों की ओर झुकने लगा तब रूस यहां सैन्य दखल देने से भी नहीं चूका.

पुतिन द्वारा अमेरिका और नाटो की चेतावनियों की परवाह न करते हुए क्रीमिया को रूस में शामिल करने के बाद से अधिकांश रूसी नागरिकों को ये भी लगने लगा है कि पुतिन ही एक मात्र ऐसे नेता हैं जो उनके देश का खोया हुआ गौरव वापस दिला सकते हैं. यही वजह है कि सोवियत संघ के विघटन से आहत रूसी जनता के लिए कूटनीतिक मामलों और युद्धों में जीत काफी मायने रखती है. इसका पता इस बात से भी चलता है कि जब-जब रूस ने ऐसे मामलों में सफलता पाई है, तब-तब पुतिन की लोकप्रियता में भारी इजाफा देखा गया. रूस की चर्चित गैर सरकारी सर्वेक्षण एजेंसी ‘लेवीदा’ के अनुसार 2008 में जॉर्जिया युद्ध में जीत, 2014 में क्रीमिया विलय और 2016 में सीरिया में अमेरिकी मंसूबों पर पानी फेर देने के बाद रूस में पुतिन की लोकप्रियता शिखर पर पहुंच गई थी. ऐसे मौकों पर वे देश की 85 फीसदी से ज्यादा आबादी की पसंद बन गए थे.

फोटो : एएफपी
फोटो : एएफपी

जानकारों की मानें तो हाल में हुए चुनावों में पुतिन को उनकी ताकतवर नेता की छवि का सबसे ज्यादा फायदा मिला है. 2014 में पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों की वजह से रूस की अर्थव्यवस्था कोई बहुत अच्छे हाल में नहीं है, वहीं इस दौरान पुतिन की सरकार पर भ्रष्टाचार और मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप भी लगते रहे हैं, इसके बावजूद दबंग नेता की छवि की वजह से लोगों का उनके पक्ष में काफी रुझान देखा गया.

अपने कार्यकाल में पुतिन ने विपक्ष को पूरी तरह खत्म कर दिया है

रूस में राष्ट्रपति चुनाव के दौरान कई लोगों का यह भी कहना होता है कि वे पुतिन को मजबूरी में वोट देते हैं क्योंकि विपक्षी पार्टी से कोई मजबूत प्रत्याशी ही नहीं है. हालांकि, इस स्थिति के लिए भी पुतिन को जिम्मेदार ठहराया जाता है. कहा जाता है कि वे हर बार चुनौती दे पाने में सक्षम विपक्षी नेता को किसी न किसी तरह से चुनावी प्रक्रिया से बाहर करवा देते हैं. इस बार उनके कटु आलोचक और मजबूत विपक्षी नेता एलेक्सेई नावालनी के साथ भी ऐसा ही हुआ. नावालनी ने मौजूदा प्रधानमंत्री और पुतिन के करीबी दिमित्री मेदिवेदेव की अपार संपत्ति का खुलासा किया था जिसके बाद से वे रूसी युवाओं के बीच बेहद लोकप्रिय हो गये थे. लेकिन, पिछले दिनों एक पुराने मामले में नावालनी को दोषी ठहरा दिए जाने के बाद चुनाव आयोग ने उनकी उम्मीदवारी पर बैन लगा दिया.

रूस में न केवल विपक्षी नेताओं बल्कि सरकार के खिलाफ आवाज उठाने वालों को भी किसी न किसी तरह चुप करा दिया जाता है. 2015 में पुतिन के प्रबल विरोधी बोरिस नेमत्सोव की मॉस्को में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक देश के पूर्व उप प्रधानमंत्री नेमत्सोव ने अपनी जांच-पड़ताल में पाया था कि क्रीमिया युद्ध पुतिन का एक-तरफा फैसला था जिसे उन्होंने केवल इसलिए अंजाम दिया ताकि देश में उनकी छवि मजबूत हो जाए. वे जल्द ही पुतिन के खिलाफ इसे लेकर बड़ा खुलासा करने वाले थे और देशव्यापी आन्दोलन छेड़ने पर भी विचार कर रहे थे. नेमत्सोव इससे पहले 2013 में पुतिन सरकार पर सोची ओलंपिक में 30 बिलियन डॉलर का घोटाला करने का आरोप भी लगा चुके थे. अपनी मौत से हफ्ते भर पहले ही उन्होंने अपने कई करीबियों से पुतिन द्वारा हत्या करवाए जाने की आशंका जताई थी.

मीडिया पर कब्जा और चुनावों में धांधली

रूसी मीडिया पुतिन की एक बड़ी ताकत माना जाता है. इस पर सरकार का नियंत्रण है. राष्ट्रपति पुतिन पर मीडिया के जरिये देश के माहौल को अपने पक्ष में करने के आरोप भी लगते रहे हैं. कहा जाता है कि रूस में क्रीमिया के विलय के पहले मीडिया ने पुतिन के इस फैसले के पक्ष में जबर्दस्त माहौल बनाने का काम किया था. इसके बाद जब पश्चिमी देशों ने रूस पर प्रतिबन्ध लगाए तो मीडिया ने इसे रूस के खिलाफ षड्यंत्र की तरह पेश किया. पिछले दिनों चुनाव से पहले भी मीडिया के जरिये ऐसा माहौल बनाने की कोशिश हुई थी कि पश्चिमी देश रूस पर हमला करने वाले हैं और पुतिन ही एक मात्र ऐसे नेता हैं जो देश को इससे बचा सकते हैं.

जानकारों की मानें तो रूसी मीडिया पुतिन का गुणगान करने, यूरोपीय देशों के खिलाफ प्रोपगेंडा फैलाने और राष्ट्रवाद की भावना का विस्तार करने में ही लगा रहता है. देश के मीडिया पर अपनी पकड़ मजबूत करने के उद्देश्य से ही व्लादिमीर पुतिन 2014 में कानून बनाकर रूसी मीडिया संस्थानों में विदेशी निवेश 50 फीसदी से घटाकर 20 फीसदी कर चुके हैं.

रूसी राष्ट्रपति पर धांधली के जरिये चुनाव जीतने के आरोप भी लगते रहे हैं. इस बार के चुनाव में जहां विपक्षी नेता एलेक्सेई नावालनी ने देशभर में धांधली के आरोप लगाए हैं. वहीं रूसी चुनाव आयोग ‘गोलोस’ को भी अनियमिताओं की शिकायतें मिली हैं. गोलोस का कहना है कि कई पोलिंग स्टेशनों पर उसके पर्यवेक्षकों को घुसने ही नहीं दिया गया साथ ही कई जगह मत पेटियों में पहले से ही मत पड़े हुए थे. इसके अलावा कई वीडियो भी सामने आए हैं जिनमें पोलिंग स्टेशनों पर तैनात सरकारी कर्मचारियों को साफ़ तौर पर धांधली करते हुए देखा जा सकता है.