दिल्ली में आम आदमी पार्टी के 20 विधायकों को लाभ का पद मामले में फिलहाल राहत मिल गई है. दिल्ली हाई कोर्ट ने उनकी सदस्यता रद्द करने वाली चुनाव आयोग की सिफारिश को खारिज कर दिया है. अदालत ने इस मामले में आयोग को दोबारा सुनवाई करने का भी आदेश दिया है. आम आदमी पार्टी के इन विधायकों में अपनी याचिका में कहा था कि चुनाव आयोग ने इस मामले में फैसला करने से पहले उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका नहीं दिया था. इस फैसले के बाद आम आदमी पार्टी के नेता सौरभ भरद्वाज ने कहा, ‘विधायकों को अपनी बात रखने का मौका नहीं मिला था, इसलिए अदालत ने उन्हें यह मौका दिया है. अब चुनाव आयोग इस मामले की दोबारा सुनवाई करेगा.’

चुनाव आयोग ने इसी साल जनवरी में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से दिल्ली विधानसभा में आम आदमी पार्टी के 20 विधायकों की सदस्यता खत्म करने की सिफारिश की थी. आयोग ने इन सभी विधायकों को ‘लाभ का पद’ मामले में दोषी पाया था. इस मामले में पहले आम आदमी पार्टी के 21 विधायक शामिल थे. लेकिन पंजाब विधानसभा चुनाव के समय राजौरी गार्डन के विधायक जरनैल सिंह ने दिल्ली विधानसभा से इस्तीफा दे दिया था.

आम आदमी पार्टी के इन विधायकों के खिलाफ ‘लाभ का पद’ का यह मामला इन्हें संसदीय सचिव नियुक्त करने से जुड़ा है. अरविंद केजरीवाल सरकार ने इन विधायकों को 13 मार्च 2015 को संसदीय सचिव बना दिया था. हालांकि, प्रशांत पटेल नाम के एक वकील ने राष्ट्रपति से इसकी शिकायत कर दी थी. शिकायतकर्ता का कहना था कि दिल्ली में संसदीय सचिव ‘लाभ का पद’ है, इसलिए इस पर नियुक्त विधायकों की सदस्यता रद्द कर दी जानी चाहिए. इसके बाद राष्ट्रपति ने जांच के लिए इस मामले को चुनाव आयोग के पास भेज दिया था.

संविधान के अनुच्छेद 102(1)(ए) और 119(1)(ए) के मुताबिक अगर कोई सांसद और विधायक केंद्र या राज्य सरकार के अधीन कोई भी ‘लाभ का पद’ लेता है तो उनकी सदस्यता रद्द हो जाती है. हालांकि, संसद या विधानसभा कानून बनाकर किसी पद को ‘लाभ के पद’ के दायरे से बाहर कर सकते हैं. लेकिन दिल्ली में विधायक (अयोग्यता उन्मूलन) अधिनियम-1997 के तहत संसदीय सचिव का पद लाभ के पद से बाहर नहीं है. हालांकि, यह विवाद सामने आने पर दिल्ली सरकार ने इसे लाभ के पद के दायरे से बाहर करने के लिए एक संशोधन विधेयक पारित किया था. लेकिन पूर्व प्रभाव वाले इस विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी नहीं मिल पाई थी.