वर्ष 1977 में आई फ़िल्म ‘अमर अकबर एंथनी’ का एकदम शुरुआती दृश्य याद कीजिए. प्राण द्वारा निभाया गया किरदार किशनलाल सालों बाद जेल से बाहर आता है और घर आकर देखता है कि उसकी पत्नी (यह किरदार निरूपा रॉय ने निभाया है) बुरी तरह खांस रही है. जब उसे पता चलता है कि उसकी पत्नी को टीबी हो गई है, तो उसकी आंखों में दहशत और दर्द एक साथ उतर आते हैं. आगे इस फिल्म में निरूपा रॉय अपने छोटे-छोटे तीन बच्चों को पति के भरोसे छोड़कर इसलिए चली जाती हैं, क्योंकि वे नहीं चाहतीं कि पहले से भूखों मर रहे उसके परिवार पर उसकी बीमारी और उसके इलाज का बोझ पड़े.

अब ‘अमर अकबर एंथनी’ से 24 वर्ष पीछे चलते हैं, जब राजकपूर की ‘आह’ आई थी. उस फिल्म में भी टीबी की भयावहता का रेखांकन अच्छी तरह देखने को मिलता है. रईस बाप का एक बेटा गांवों में जाकर टीबी की चपेट में आ जाता है और फिर अपने मरने का इंतज़ार करता है. इसी तरह वर्ष 1951 में आई ‘हम लोग’ और 1963 में आई ‘बंदिनी’ भी टीबी के उस खौफ की कहानी कहती हैं. 1972 में आई संजीव कपूर अभिनीत ‘परिचय’ में भी नायक गरीबी और टीबी का शिकार दिखाया जाता है.

ये फिल्में काफी हद तक उस वक्त की हकीकत दिखाती हैं जब टीबी होने का मतलब था सारी दुनिया से कट जाना और ऐसे ही चुपचाप किसी कोने में मर जाना. तब टीबी की दवा नहीं थी. टीबी की पहली दवा स्ट्रेप्टोमाइसिन की खोज वर्ष 1943 में हुई, जिसके बाद दुनियाभर में टीबी पर नियंत्रण संभव हुआ. उसके पहले टीबी हो जाने पर रोगी को सैनेटोरियम भेज दिया जाता था, जहां शुद्ध हवा, अच्छा भोजन और चिकित्सकीय देखभाल से ही टीबी का इलाज करने की कोशिश की जाती थी. हालांकि दवा आने बाद भी दशकों तक टीबी एक बहुत घातक और लाइलाज बीमारी की तरह ही देखी जाती रही. उस दौर की फिल्में भी इस बात की गवाह हैं.

आज की फिल्मों में जब किसी खतरनाक बीमारी की बात करनी होती है, तो कैंसर के अलावा ऐसी बीमारियों के नाम लिए जाते हैं जो आमतौर पर देखने-सुनने को कम ही मिलते हैं. उस ज़माने में टीबी मानो एक राष्ट्रीय बीमारी थी, जो बड़ी सहजता से फिल्मों में मार्मिक मोड़ लाने के अचूक माध्यम के तौर पर प्रयोग में लाई जाती थी. पुराने ज़माने की और भी ऐसी बहुत-सी फिल्में हैं, जिनमें बीमार होने के नाम पर किरदार खांसते रहते थे. यह इस बात का भी संकेत है कि उस समय आम जनमानस टीबी को लाइलाज मानता था.

अब टीबी का इलाज सहज उपलब्ध है. सरकार ने वर्ष 2025 तक देश को टीबी मुक्त बनाने का लक्ष्य भी रखा है. हालांकि तमाम सरकारी प्रयासों के बावजूद अभी भी भारत में टीबी रोगियों के आंकड़े बेहद चिंताजनक हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) के मुताबिक विश्व के एक चौथाई टीबी के रोगी भारत में पाए जाते हैं. इसकी 2016 की रिपोर्ट के मुताबिक भारत 27.9 लाख रोगियों के साथ टीबी प्रभावित देशों की सूची में पहले स्थान पर है. वहीं उस साल लगभग 4.83 लाख लोगों की मृत्यु सिर्फ टीबी से हुई थी.

इन आंकड़ों से भी चिंताजनक यह तथ्य है कि एक बड़ा आंकड़ा देश में छिपे हुए टीबी रोगियों का भी है. एक सरकारी अनुमान के मुताबिक हर साल देश में लगभग 10 लाख लोगों की मृत्यु टीबी की वजह से हो जाती है. इनमें से करीब आधे से ज्यादा वे लोग होते हैं जिनकी जांच नहीं हो पाती या जिनका इलाज निजी क्लीनिकों में चल रहा होता है या फिर इनकी मृत्यु की जानकारी सरकारी आंकड़ों में दर्ज नहीं हो पाती.

टीबी को जड़ से खत्म करने के लिए एक इस वर्ष एक नया नियम आया है. 16 मार्च 2018 को जारी स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की अधिसूचना के मुताबिक कोई चिकित्सक, अस्पताल या मेडिकल स्टोर वाले किसी भी टीबी मरीज की जानकारी छुपा नहीं सकते. उनके पास आने वाले हर टीबी मरीज की जानकारी उन्हें टीबी अस्पताल या संबंधित स्वास्थ्य केंद्र में देनी होगी. ऐसा न करने पर भारतीय दंड संहिता की धारा 269 और 270 के तहत उन्हें छह माह से लेकर दो साल तक की सजा हो सकती है और जुर्माना भी भरना पड़ सकता है.

टीबी के इलाज में एक दिक्कत यह भी है कि शुरुआती इलाज में फायदा दिखने पर अक्सर रोगी दवा बंद कर देते हैं, जबकि टीबी का जीवाणु शरीर के अंदर बिना अपने लक्षण दिखाए कई वर्ष निष्क्रिय अवस्था में बना रह सकता है. अनुकूल परिस्थिति मिलने पर यह फिर से सक्रिय हो जाता है. इसके अलावा सबसे बड़ी दिक्कत है टीबी को लेकर फैली भ्रांतियां और इसके प्रति समाज का नकारात्मक रवैया. लोगों में अभी भी टीबी के प्रति वह स्वीकार्यता नहीं आई है, जिसकी ज़रूरत है.

अभी भी ऐसे लोग हैं, जो खुद को या अपने परिवार में किसी को टीबी हो जाने पर इसे छुपाते हैं. फिर सही इलाज न मिलने से रोगी की मौत तक हो जाती है. इस रोग के प्रति जागरूकता के अभाव में लोग सामने नहीं आते और अपने जीवन के साथ खुद खिलवाड़ करते हैं. कुछ गैर जिम्मेदार लोग परिवार के आश्रित वृद्धजनों के इस रोग से ग्रसित होने पर उनके इलाज की जरूरत नहीं समझते. इस कारण रोगियों की सही संख्या पता लगाने और देश को पूरी तरह टीबी मुक्त बनाने में मुश्किल आ रही है. सभी रोगियों का सामने आना इसलिए भी जरूरी है, ताकि उनसे दूसरे लोगों में हो रहे टीबी के प्रसार को रोका जा सके.

टीबी यानी ट्यूबरोकलोसिस को हिंदी में क्षयरोग कहते हैं. दो सप्ताह या उससे अधिक समय से लगातार खांसी और उसके साथ बलगम आना, बुखार, विशेष रूप से शाम को बढ़ने वाला बुखार इसके प्रमुख लक्षण हैं. इसके अन्य लक्षणों में वजन का घटना, भूख कम लगना, सीने में दर्द, बलगम के साथ खून आना शामिल है.

फेफड़ों के अलावा शरीर के दूसरे हिस्सों में भी टीबी हो सकती है. मस्तिष्क की टीबी में सिरदर्द, बुखार, खुमारी, गर्दन में जकड़न की शिकायत और रीढ़ की टीबी में पीठ-दर्द, बुखार और रीढ़ में सूजन आ जाती है. टीबी के लक्षण दिखते ही तुरंत जांच करवानी चाहिए. पुष्टि होते ही इलाज शुरू करवा देना चाहिए. जितनी जल्दी इलाज शुरू होगा, उतनी ही जल्दी यह सही हो सकती है.

यह सच है कि टीबी एक संक्रामक रोग है. रोगियों के खांसने और थूकने से यह रोग प्रसारित होता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि यह रोग दूर नहीं हो सकता. टीबी का इलाज संभव हैं. इसके अलावा यह छूने या हाथ मिलाने से नहीं फैलती. टीबी होने पर समय से दवाई लेने और कोर्स पूरा करने के साथ रोगी को कुछ और सावधानियां रखनी चाहिए. हमेशा मुंह पर कपड़ा रखकर ही खांसना चाहिए. कभी खुले में नहीं थूकना चाहिए. कोर्स पूरा होने के बाद बलगम की जांच जरूर करानी चाहिए, जिससे पता चल सके कि रोग सही हुआ है या नहीं.

सरकार ने एक अप्रैल 2018 से टीबी रोगी को हर महीने 500 रुपए दिया जाना भी तय किया है, ताकि वह अपने खान-पान का ध्यान रख सके. इस समय डब्ल्यूएचओ द्वारा निर्धारित डॉट्स प्रणाली के तहत टीबी का इलाज किया जा रहा है, जिसमें उचित देखरेख में रोगी की दवा की जाती है. टीबी की अलग-अलग किस्म की पहचान के लिए अब आधुनिक विधियां विकसित हो चुकी हैं. निक्षय नामक ऑनलाइन साफ्टवेयर से अधिक से अधिक मरीजों की पहचान करके उनका तुरंत इलाज शुरू किया जाने लगा है. ऐसे ही तमाम प्रयासों और स्वास्थ्य विभाग की योजनाओं के चलते टीबी के रोगियों की संख्या और उनकी वृद्धि में कमी तो आई है, फिर भी मंजिल अभी बहुत दूर है.

टीबी से जुड़ी भ्रांतियों से जितनी जल्दी निपट लिया जाए, उतनी जल्दी हम मंजिल के करीब पहुंचेंगे. एक भ्रांति यह है कि टीबी गरीबों को ही होती है, जबकि ऐसा नहीं है. उदाहरण के लिए सुपरस्टार अमिताभ बच्चन को भी वर्ष 2000 में टीबी हुई थी. हां, अभावग्रस्त लोगों की रोग-प्रतिरोधक क्षमता कम होने के कारण वे जल्दी इस रोग की चपेट में आते हैं. कुछ लोग मानते हैं कि टीबी कभी जड़ से खत्म नहीं होती. यह बात सही नहीं है. दवाई का कोर्स पूरा करने पर यह हमेशा के लिए चली जाती है. इसके अलावा यह भी मान्यता होती है कि सरकारी दवाएं ज्यादा प्रभावी नहीं होती. यह सोच भी गलत है. ये दवाएं और डॉट्स कार्यक्रम भी निजी अस्पतालों में किए जाने वाले इलाज जितने प्रभावी हैं.

24 मार्च, 1882 को जर्मन फिजिशियन और माइक्रोबायोलॉजिस्ट रॉबर्ट कोच ने टीबी के जीवाणु की खोज की थी. यह खोज आगे इसके इलाज में बहुत सहायक बनी. इसीलिए विश्वभर में टीबी के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए विश्व टीबी दिवस के रूप में 24 मार्च का दिन चुना गया है. टीबी का इलाज आसानी से उपलब्ध होने के बाद पुरानी फिल्मों में फिल्माए गए टीबी वाले दृश्य जब दूरदर्शन पर आते थे, तो साथ में नीचे एक नोट भी लिखा होता था, जो बताता था कि टीबी अब लाइलाज नहीं है. यह टीबी के प्रति समाज में गहरे बैठे पुराने डर को खत्म करने की एक कोशिश थी. यह डर अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हो पाया है. बॉलीवुड फिल्मों में टीबी की बीमारी अब बीते जमाने की बात हो गई है. असल ज़िन्दगी में भी यह दिन जल्दी देखने को मिले!