देश में विशेष राज्य के दर्जे को लेकर सियासत गर्म है. बीती 16 मार्च को आंध्र प्रदेश की सत्ताधारी तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी) ने इसकी मांग को लेकर केंद्र की राष्ट्रीय प्रजातांत्रिक गठबंधन (एनडीए) से खुद को अलग कर लिया. टीडीपी प्रमुख और मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू का कहना है कि विभाजन के जरिए पहले कांग्रेस ने राज्य के साथ अन्याय किया और अब भाजपा उसे आगे बढ़ा रही है. इसके बाद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने नायडू को एक चिट्ठी लिखकर उन पर झूठ बोलने का आरोप लगाया. उनके मुताबिक मोदी सरकार ने आंध्र प्रदेश की हरसंभव मदद की. अमित शाह का यह भी कहना था कि टीडीपी के गठबंधन से अलग होने की वजह राज्य का विकास नहीं बल्कि, राजनीतिक फायदे-नुकसान का गणित है. इसके बाद चंद्रबाबू नायडू ने अमित शाह की चिट्ठी को झूठ का पुलिंदा बताया.

विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने के लिए कुछ मानक तय किए गए हैं. इनमें राज्य का आर्थिक रूप से पिछड़ा होना, अंतरराष्ट्रीय सीमा से लगा होना, उसका पहाड़ी राज्य होना और कम जनसंख्या घनत्व शामिल हैं. किसी राज्य को विशेष दर्जा हासिल होने पर उसे केंद्रीय योजनाओं में 90 फीसदी वित्तीय मदद मिलती है. साथ ही, राजस्व में बाकी राज्यों की तुलना में ज्यादा हिस्सेदारी के साथ-साथ उसे निवेश को प्रोत्साहन देने के लिए करों में अतिरिक्त छूट भी मिलती है.

आंध्र प्रदेश की दलील है कि तेलंगाना के अलग होने के बाद उसकी राजस्व स्रोत का बड़ा हिस्सा उससे छिन गया है. बताया जाता है कि अकेले हैदराबाद से अविभाजित आंध्र प्रदेश को करीब 75,000 करोड़ रुपये सालाना राजस्व हासिल होता था. इसके साथ ही उसका तर्क है कि उसे पोलावरम परियोजना और नई राजधानी अमरावती के लिए भी वित्तीय मदद की जरुरत है. उधर, केंद्र का कहना है कि वह राज्य के लिए विशेष आर्थिक पैकेज जारी कर सकता है लेकिन, उसे विशेष राज्य का दर्जा नहीं दिया जा सकता.

बीती सात मार्च को केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने विशेष राज्य का दर्जा न देने के पीछे 14वें आयोग की रिपोर्ट का हवाला दिया था. उन्होंने कहा था कि इस रिपोर्ट की सिफारिशें लागू होने के बाद अब विशेष राज्य का दर्जा नहीं दिया जा सकता. हालांकि, इससे पहले 2014 के चुनावी अभियान के दौरान भाजपा ने सत्ता में आने पर सूबे को 10 साल के लिए यह दर्जा देने का वादा किया था. इससे पहले 20 फरवरी, 2014 को तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी संसद में आंध्र प्रदेश को पांच साल के लिए विशेष राज्य का दर्जा देने की बात कही थी. वाईवी रेड्डी की अध्यक्षता वाले 14वें वित्त आयोग की रिपोर्ट को फरवरी, 2015 में संसद के सामने रखा गया था.

उधर, 14वें वित्त आयोग के एक सदस्य एम गोविंद राव ने सरकार की इस बात से साफ इनकार किया है कि रिपोर्ट में विशेष राज्य के दर्जे को खत्म करने की बात कही गई थी. उनके मुताबिक आयोग की यह जिम्मेदारी नहीं है कि वह इस दर्जे को लेकर अपनी सिफारिशें दे. साथ ही, राष्ट्रपति ने भी विशेष तौर पर उसे इस तरह की अतिरिक्त जिम्मेदारी नहीं सौंपी थी. एम गोविंद राव का आगे कहना है कि आयोग को राज्यों के बीच विशेष और सामान्य दर्जे का उल्लेख करने की जरूरत ही नहीं थी. उनके मुताबिक इसे देखते हुए विशेष राज्य के मुद्दे पर किसी तरह की सिफारिश करने का कोई सवाल ही नहीं उठता.

संविधान के अनुच्छेद-280 के तहत वित्त आयोग का गठन राष्ट्रपति द्वारा प्रत्येक पांच साल या जरूरत होने पर इससे पहले भी किया जाता है. इस अनुच्छेद के तहत आयोग को केंद्र और राज्यों के बीच करों के बंटवारे को तय करने का काम दिया गया है. साथ ही, संचित निधि से भी राज्यों को अनुदान देने के संबंध में यह अपनी सिफारिशें देता है. इनके अलावा यदि राष्ट्रपति उसे वित्तीय मुद्दों को लेकर कोई अतिरिक्त जिम्मेदारी सौंपते हैं तो उन पर भी आयोग अपनी रिपोर्ट सौंपता है.

14वें वित्त आयोग की रिपोर्ट को देखें तो इसमें करों में राज्यों की हिस्सेदारी 32 से बढ़ाकर 42 फीसदी कर दी गई है. इसके अलावा इसमें वस्तु और सेवा कर (जीएसटी) लागू होने की स्थिति में राज्यों के लिए मुआवजे की राशि भी तय की गई है. इस रिपोर्ट का अध्ययन करने पर यह बात सामने आती है कि इसमें विशेष राज्य के दर्जे को खत्म करने को लेकर साफ तौर पर कोई जिक्र नहीं किया गया है.

इनके अलावा विशेष राज्य के दर्जे को लेकर एम गोविंद राव की बातें अधिक विश्वसनीय होने के पीछे की एक और वजह भी है. जानकारों के मुताबिक इस दर्जे को तय करने का अधिकार प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय विकास परिषद (एनडीसी) को है. साल 2015 में मोदी सरकार द्वारा योजना आयोग को खत्म करने के साथ ही एनडीसी को भी हाशिए पर डाल दिया गया है. साल 1952 में योजना आयोग की स्थापना के बाद गठित इस परिषद की आखिरी बैठक 27 दिसंबर को 2012 को बुलाई गई थी.

2013 में राज्यों की आर्थिक स्थिति पर रघुराम राजन की अध्यक्षता में गठित समिति को पिछड़े राज्यों की पहचान करने की भी जिम्मेदारी सौंपी गई थी. इसने अपनी रिपोर्ट में विशेष राज्य के दर्जे को खत्म करने की पैरवी की है. हालांकि, इसके बाद जुलाई-2015 को एक सवाल के जवाब में केंद्रीय मंत्री इंद्रजीत राव ने साफ किया कि पूर्वोत्तर राज्यों को हासिल विशेष राज्य के दर्जे को खत्म करने को लेकर कोई प्रस्ताव नहीं है. पूर्वोत्तर के आठ राज्यों के साथ जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड को भी यह दर्जा हासिल है. तब उन्होंने यह भी कहा था कि 14वें वित्त आयोग ने राज्यों के बीच सामान्य और विशेष दर्जे को लेकर कोई उल्लेख नहीं किया है. केंद्रीय मंत्री का यह जवाब एम गोविंद राव की बातों की ही पुष्टि करता और अरुण जेटली की बातों को झुठलाता हुआ दिखता है.