केरल का कन्नूर एक बार फिर सुर्खियों में है. कारण वही है जो हमेशा ही रहता है. सोमवार रात यहां सीपीएम के एक कार्यकर्ता की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई. इसके एक घंटे बाद ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के एक कार्यकर्ता की इसी तरह हत्या की खबर आई. इस घटना पर सीपीएम का कहना है कि आरएसएस राजनीतिक हिंसा की संस्कृति खत्म नहीं करना चाहता. उधर, आरएसएस का जो कहना है उसका लब्बोलुआब भी कुछ यही है.

कन्नूर का नाम अगर किसी उत्तर भारतीय ने सुन रखा होगा तो इस नाम से जुड़ी तस्वीर में लाल रंग सबसे ज़्यादा होगा. फिर चाहे यह लाल रंग सीपीएम के लाल झंडों का हो या फिर कन्नूर की सड़कों पर बहते खून का. इन दिनों केरल में कोई चुनाव बहुत नजदीक नहीं है, फिर भी पूरा कन्नूर सीपीएम के झंडों से पटा पड़ा है. दूसरी तरफ, आप किसी भी समय खाकी पैंट, सफेद शर्ट वाले स्वयंसेवकों को कन्नूर की सड़कों पर मार्च करते देख सकते हैं.

‘अब हालात ये हो गए हैं कि वामपंथी भी मंदिरों से जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं. अब कृष्ण जन्माष्टमी के कार्यक्रमों में ये भी हिस्सा लेने की कोशिश करते हैं. पर अब उनके पास ऐसा करने का नैतिक अधिकार नहीं बचा है’

आखिर क्या है जो इस इलाके को राजनीतिक तौर पर इतना अस्थिर बनाता है? यूं तो समूचे केरल में राजनीतिक हिंसा अब चौंकाने वाली बात नहीं रही है, लेकिन कन्नूर का इतिहास सबसे ज़्यादा रक्तरंजित है. क्यों? इसके कई कारण हैं. कन्नूर में रहने वाले रिटायर्ड बैंकर सुभाष मेनन बताते हैं, ‘1980 तक इस इलाके में सीपीएम का वर्चस्व था. कांग्रेस का यहां आधार था. लेकिन सीमित. 1977 में आपातकाल खत्म होने के बाद आरएसएस ने इस इलाके का रुख कर लिया. यहां शाखाएं लगने लगीं. उन्होंने मंदिरों का सहारा लेकर अपना काम शुरू किया. उनकी शाखाएं मंदिरों के मैदानों में लगती थीं. मंदिरों में आने वाले लोग आरएसएस के राष्ट्रवाद और धर्म के घालमेल से प्रभावित होकर उनके साथ आने लगे. उनका प्रभाव बढ़ने का नतीज़ा यह हुआ कि सीपीएम के लोगों ने संघ कार्यकर्ताओं पर हमले करना शुरू कर दिया. उधर से भी इन हत्याओं का स्कोर बराबर करने में कोई कसर नहीं रखी गई.’ सोमवार की घटना इसकी पुष्टि करती है.

सुभाष मेनन यह भी याद दिलाते हैं कि 80 के दशक तक वामपंथियों के नेतृत्व में चले किसान और कोऑपरेटिव आंदोलन ठंडे पड़ चुके थे. इसके अलावा अब तक आम आदमी की पहुंच में रहा वाम नेता भी अपना रंग-ढंग बदल चुका था. सुभाष कहते हैं, ‘पहले जो नेता आम मजदूरों के साथ बात करता, बीड़ी पीता नज़र आता था. वो अब बड़े बंगलों और बड़ी गाड़ियों में कैद हो गया. आरएसएस की पहुंच बढ़ने के साथ-साथ कई वामपंथी नेता भी सीपीएम छोड़ कर बीजेपी में शामिल हो गए.’

इसके अलावा एक और बात थी जो सीपीएम के सबसे ज़्यादा खिलाफ गई. यह थी लोगों को मंदिर जाने से रोकना. सुभाष बताते हैं, ‘लोगों के मंदिर जाने से उन्हें लगने लगा कि ये बीजेपी में शामिल हो जाएंगे. जबकि वामपंथियों के प्रभुत्व वाले कोऑपरेटिव्स में मुसलमान मज़दूरों को या बाकी मुसलमान कैडर को कभी मस्जिद जाने से नहीं रोका गया. हिंदुओं को ये पसंद नहीं आया. अब हालात ये हो गए हैं कि वामपंथी भी मंदिरों से जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं. अब कृष्ण जन्माष्टमी के कार्यक्रमों में ये भी हिस्सा लेने की कोशिश करते हैं. पर अब उनके पास ऐसा करने का नैतिक अधिकार नहीं बचा है. उनके कब्ज़े में बस यहां की कोऑपरेटिव सोसाइटीज़ हैं, जिनमें काम दिलाकर वे अपने कैडर तैयार करते हैं.’

कन्नूर में राजनीति से शायद ही कोई अछूता हो. इलाके के निवासी राजन नांबियार बताते हैं, ‘कन्नूर में हर शख्स पॉलिटिकल है. आप चाहें सीपीएम को वोट दें या ना दें, अगर आपके पिता किसी सीपीएम कैडर के करीब रहे हैं तो आप सीपीएम परिवार का हिस्सा हैं. और आपको उसी तरह देखा जाएगा.’ वे आगे जोड़ते हैं, ‘इलाके में आपकी राजनीतिक पहचान धार्मिक पहचान से ज़्यादा ताकतवर है. इसी तरह यहां धर्म के खिलाफ बात करने वाले को बख्श दिया जाएगा, लेकिन पार्टी के खिलाफ बात करने की हिम्मत जुटाना मुश्किल काम है.’

‘अगर कहीं आपको कुछ ऐसी बात कहते सुन लिया गया जो किसी पार्टी कैडर को नागवार गुज़री हो तो पहले आपको कहीं भी रोक कर धमका दिया जाएगा. दूसरी वॉर्निंग के तौर पर आपके बगीचे के पेड़ काट दिए जाएंगे’  

अगर कोई ऐसा करता है तो उसके लिए जिंदगी आसान नहीं रह जाती. राजन कहते हैं. ‘अगर कहीं आपको कुछ ऐसी बात कहते सुन लिया गया जो किसी पार्टी कैडर को नागवार गुज़री हो तो पहले आपको कहीं भी रोक कर धमका दिया जाएगा. फिर दूसरी वॉर्निंग के तौर पर आपके बगीचे के पेड़ काट दिए जाएंगे खासकर फल आने से ठीक पहले आपके केले के पेड़ों को काट दिया जाएगा, घर पर पत्थर फेंके जाएंगे, आपकी गाड़ी जला दी जाएगी. उसके बाद भी अगर आप नहीं समझे तो फिर आपका भगवान ही मालिक है. आपकी जान जाएगी या शरीर का कोई हिस्सा, कोई नहीं जानता. कम से कम आप कन्नूर में सीपीआइ (एम) के खिलाफ नहीं बोल सकते.’

लेकिन यह सिर्फ बोलने की बात नहीं है. पार्टी के तमाम कायदे-कानून भी मानने पड़ते हैं. जैसा कि सुभाष मेनन बताते हैं, ‘हर तीसरे दिन किसी न किसी बात पर हड़तालें होती हैं. आप को उन्हें भी मानना होता है. माना कि ए के गोपालन जैसे नेताओं ने कन्नूर और केरल के पिछड़े लोगों के लिए बहुत कुछ किया. एक वक्त था जब उनकी वाकई इज़्ज़त थी लेकिन अब डर का माहौल है.’ मलयालम में छपने वाला केरला स्टेट कमेटी ऑफ द कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया का मुखपत्र ‘देशाभिमानी’ सामने रखते हुए वे कहते हैं, ‘आप ये अखबार देखिए, ये भी हमें ज़बरन खरीदने पर मज़बूर किया जाता है.’

केरला स्टेट कमेटी ऑफ द कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया का मुखपत्र ‘देशाभिमानी’
केरला स्टेट कमेटी ऑफ द कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया का मुखपत्र ‘देशाभिमानी’

आरटीआई के तहत पूछे गए एक सवाल पर पुलिस के जवाब की मानें तो साल 2000 से 2016 के बीच में कन्नूर में कुल 69 राजनीतिक हत्याएं हुईं. इनमें से 30 लोग सीपीएम के और 31 लोग भाजपा से थे. बाकी लोग इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग व अन्य संगठनों से थे. कन्नूर के श्री नारायणा कॉलेज के सामजिक विज्ञान विभाग के अध्यक्ष टी शशिधरन के एक शोधपत्र के मुताबिक कन्नूर में पहली राजनीतिक हत्या का शिकार 1969 में एक आरएसएस प्रचारक को बनना पड़ा था. उसके बाद ये सिलसिला बदस्तूर जारी रहा है.

टी शशिधरन इस स्थिति के लिए दो चीज़ों को ज़िम्मेदार ठहराते हैं. पहला है कन्नूर में सामाजिक हिंसा की परंपरा. वे कुडिप्पका का ज़िक्र करते हैंं. इस मध्ययुगीन परंपरा में एक परिवार द्वारा की गई किसी हिंसा या हत्या की घटना के जवाब में पीड़ित परिवार भी दोषी परिवार के साथ वही करता था. और यह सिलसिला चलता रहता था. शशिधरन लिखते हैं, ‘आज बिलकुल यही स्थिति राजनीतिक पार्टियों के बीच बनी हुई है. एक हत्या के बाद उसका बदला लेने के लिए अगली हत्या की जाती है.’

हिंसा के दूसरे कारण के तौर पर वे पिछड़े वर्ग के थिय्या युवकों के राजनीतिक इस्तेमाल को ज़िम्मेदार ठहराते हैं. उनके मुताबिक इन युवकों को राजनीति के ज़रिए मुख्यधारा में लाने का जो सपना दिखाया गया वह सिर्फ उनके इस्तेमाल का ज़रिया बना. शशिधरन के शब्दों में ‘इलाके में नौकरियां नहीं हैं. साक्षरता दर काफी अधिक होने के बाद भी ज़्यादातर युवा बुनकर, बीड़ी बनाने आदि के कुटीर उद्योगों से जुड़े हुए हैं. हालात से असंतुष्ट ये युवा राजनीति के ज़रिए सब बदल डालने की उम्मीद में फंस कर नेताओं की खूनी राजनीति का शिकार होते रहे हैं.’ इसके अलावा वे लिखते हैं कि पुलिस और प्रशासन की नाकामयाबी भी हिंसा की इस परंपरा के जारी रहने का एक बड़ा कारण है.

सुभाष मेनन मानते हैं कि लगातार होती हत्याओं ने कन्नूर की आम जनता को (हालांकि वे कहते हैं कि यहां सभी पॉलिटिकल हैं) एक हद तक असंवेदनशील बना दिया है. वे कहते हैं, ‘जैसे किसी स्लॉटर हाउस में मीट काटा जाता है, वैसे यहां हत्याएं की जाती हैं. एक वार में गला रेत कर जान नहीं ली जाती, टुकड़े-टुकड़े कर दिए जाते हैं. जितने ज़्यादा टुकड़े, दूसरी पार्टी को उतना कड़ा जवाब.’ वे दिसंबर 1999 में हुए जयाकृष्णन हत्या मामले का ज़िक्र करते हुए कहते हैं. ‘छोटे-छोटे बच्चों से भरी क्लास में उनके टीचर को टुकड़े-टुकड़े कर दिया गया था. बच्चे इतने सदमे में चले गए थे कि उन्हें मनोचिकित्सक की मदद लेनी पड़ी थी.’ 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में मृत्युदंड पाए पांच आरोपितों में से चार को संदेह का लाभ देते हुए छोड़ दिया था जबकि मुख्य आरोपित की सज़ा को आजीवन कारावास में बदल दिया था.

यह स्थिति कैसे बदल सकती है इसका जवाब आम लोगों के पास नहीं है. लेकिन शशिधरन अपने शोधपत्र में कुछ सुझाव देते हैं. सबसे पहले वे ज़ोर देते हैं कि इस तरह की हत्या और हिंसा की घटनाओं के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करते हुए दोषियों को कड़ी सजा होनी चाहिए. इसके अलावा वे आम जनता और पार्टी कैडर को हिंसा के खिलाफ जागरूक किए जाने की ज़रूरत की बात करते हैं. साथ ही वे परिस्थितियों को बदलने के लिए आर्थिक-सामाजिक विकास पर जोर देते हैं. कई जानकारों के मुताबिक यह स्वाभाविक है क्योंकि केरल एक साक्षर समाज ज़रूर है, लेकिन उसे प्रगतिशील अब भी नहीं कहा जा सकता.

राजन नांबियार कहते हैं, ‘केरल और कन्नूर ने कई आंदोलनों को ज़मीन दी है, कई नेता पैदा किए हैं. मौजूदा हालात में एक बार फिर कन्नूर को ऐसे नेताओं और आंदोलनों की ज़रूरत है जो इसे हिंसा के इस दुष्चक्र से निकाल सके.’

उनकी बात गलत नहीं लगती.