देश का दूरसंचार क्षेत्र इन दिनों गलाकाट प्रतिस्पर्धा के दौर से गुजर रहा है. सितंबर 2016 में रिलायंस जियो के मैदान में उतरने के बाद से तो टेलीकॉम कंपनियों को टैरिफ प्लान में भारी कटौती करनी पड़ी है. इससे इन कंपनियों का मुनाफा घटा है. उनके मुनाफे में हुई कमी का असर सरकार की आय पर भी पड़ा है.

पिछले साल सत्याग्रह की एक रिपोर्ट में भी आशंका जताई गयी थी कि रिलायंस जिओ के आने से सरकार की कमाई में गिरावट का अंदेशा है. वही हुआ है. रिलायंस जिओ के बाज़ार में पकड़ बनाने के बाद पलटे हालात ने सरकार की आय में ज़बरदस्त कमी ला दी है. वित्तीय घाटा कम करने की कोशिशों में जुटी सरकार के लिए यह खबर उसकी चिंता बढ़ाने वाली है.

दूरसंचार मंत्रालय की सालाना रिपोर्ट बताती है कि 2017-18 में इस क्षेत्र के सकल राजस्व में लगभग नौ फीसदी की गिरावट गई है. यह गिरकर 2.5 लाख करोड़ रह गया है. पिछले साल, यानी 2016-17 में यह आंकड़ा क़रीब 2.8 लाख करोड़ था.

दूरसंचार कंपनियों से सरकार को होने वाली आय के दो हिस्से होते हैं - स्पेक्ट्रम और लाइसेंस फ़ीस. इसके तहत कंपनियों को उनके सकल समायोजित राजस्व (एजीआर) का एक निश्चित फीसदी हिस्सा सरकार को देना होता है. इससे सरकार को हर साल एक नियमित आय होती है. यानी दूरसंचार कंपनियों की आय में गिरावट का नुकसान उसे भी होता है.

लाइसेंस फ़ीस सर्किल आधारित होती है. मेट्रो और बड़े टेलिकॉम सर्किल (केटेगरी ए) में लाइसेंस फ़ीस एजीआर का 10 फीसदी है. केटेगरी ‘बी’ सर्किल में यह आंकड़ा आठ और केटेगरी ‘सी’ में छह फीसदी है. औसतन यह 8.5 फीसदी है. 2016-2017 में लाइसेंस फ़ीस से सरकार की कुल कमाई थी 15,975 करोड़ रुपये जो 2017-2018 में घटकर 12,975 करोड़ रह गयी है. यानी इसमें कुल 18.8 फीसदी की गिरावट आई है.

अब बात करते हैं स्पेक्ट्रम चार्ज की. जीएसएम ऑपरेटर्स को स्पेक्ट्रम चार्ज के तौर पर एजीआर का औसतन 3.5 फीसदी सरकार को देना होता है. उधर, रिलायंस जिओ के पास ब्राडबैंड वायरलेस एक्सेस यानी बीडब्लूए लाइसेंस है, जिसके तहत स्पेक्ट्रम चार्ज एजीआर का सिर्फ एक फीसदी ही है. ऐसे में, ज़ाहिर था कि जैसे-जैसे जिओ का कारोबार बढ़ेगा और अन्य ऑपरेटरों का कम होगा तो स्पेक्ट्रम से होने वाली सरकार की कमाई में गिरावट आएगी. 2016-2017 में कुल कमाई थी 7,573 करोड़ रुपये. 2017-2018 में यह 32.8 फीसदी घटकर 5089 करोड़ रह गयी है. इंडस्ट्री के जानकारों का मानना है कि आने वाले वक्त में सरकार की दिक्कतें कम होने वाली नहीं हैं.

इसके अलावा कई और बातें हैं जहां सरकार के साथ-साथ बाकी अन्य को भी दिक्कतों का सामना पड़ रहा है. टेलिकॉम कंपनियों के पसीने छूट गए हैं. एक के बाद एक विलय हो रहे हैं. लगभग कई हज़ार कर्मचारी एक साल में बेरोज़गार हो गए हैं, रिलायंस कम्युनिकेशंस और एयरसेल जैसी कंपनियां लगभग दिवालिया हो गयी हैं और बैंकों पर भी इसका असर देखने को मिल रहा है.

पिछले साल स्टेट बैंक की भूतपूर्व चेयरमैन अरुंधती भट्टाचार्य ने टेलिकॉम सेक्रेटरी अरुणा सुन्दराराजन को एक पत्र लिखा था. इसमें उन्होंने बताया था कि नए खिलाड़ियों के आने के बाद से टेलिकॉम कंपनियों की ख़राब हो चुकी हालत के चलते बैंक की बैलेंस शीट्स पर दबाव आ गया है. जाहिर है नए खिलाड़ियों से उनका मतलब रिलायंस जिओ से था. उन्होंने लिखा था, ‘कुछ टेलिकॉम कंपनियां इस दवाब को शायद न झेल पाएं. सब टेलिकॉम कंपनियों पर बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थानों का करीब चार लाख करोड़ रुपये क़र्ज़ है.’ उन्होंने आगे लिखा था कि इस चार लाख करोड़ रुपये के ब्याज़ की भरपाई और मूल रकम की वसूली पर प्रश्न चिन्ह लग गया है.

इसके बाद सरकार ने दूरसंचार नीति में कुछ अहम बदलाव तो किए पर ये नाकाफ़ी मालूम पड़ते हैं. मसलन कंपनियों द्वारा ख़रीदे गए अतिरिक्त स्पेक्ट्रम की वसूली के लिए सरकार ने 10 के बजाए 16 किश्तें कर दी हैं. पर जानकार कहते हैं कि तेल तो तिलों में से ही निकलेगा. दूसरा, प्रत्येक कंपनी को अतिरिक्त स्पेक्ट्रम भी दिया गया है जिससे उन्हें कुछ सहारा मिलेगा. 2018 की राष्ट्रीय दूरसंचार नीति में 5जी, इंटरनेट ऑफ़ थिंग्स, लाइसेंस और रेगुलेटरी नियमों में आमूलचूल बदलाव की बात की जा रही है.

जो भी है, फिलहाल तो दूरसंचार कंपनियों की राह मुश्किल जान पड़ती है. ऐसे में जब एयरटेल के चेयरमैन सुनील भारती मित्तल अपना दुखड़ा रोते हैं तो रिलायंस जिओ के मुकेश अंबानी उन्हें बच्चों की तरह न रोने की सलाह देते हैं. एक समय था जब रिलायंस इंडस्ट्रीज को देशभर में अपने पेट्रोल पंप बंद करने पड़े थे और मुकेश अंबानी ने सरकार से उनके और सरकारी कंपनियों के बीच बराबरी का मैदान न होने की बात का रोना रोया था. वह कहते हैं न- टाइम टाइम की बात है प्यारे, तू रगड़ा या मैं रगड़ा.