उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने हाल ही में एक साल पूरा किया है. अपनी एक वर्ष की उपलब्धियां गिनाते हुए वह इन दिनों आत्ममुग्धता से गदगद हुई जा रही है. लेकिन सरकार के शुरुआती कार्य और घोषणाएं ही उसकी सफलताओं पर सवाल खड़े करती दिखती हैं.

ऐसी घोषणाओं में से एक प्रमुख घोषणा बूचड़खानों यानी स्लाटर हाउसों पर पाबंदी की है. योगी ने सरकार बनाते ही उत्तर प्रदेश में अवैध बूचड़खानों पर रोक लगाने का अपना इरादा साफ कर दिया था. उत्तर प्रदेश में निजी क्षेत्र में चलने वाले बड़े और आधुनिक बूचड़खानों को छोड़ कर ज्यादातर बूचड़खाने वैध नहीं थे. ज्यादातर बिना लाइसेंस से चल रहे थे और इनमें सफाई आदि के भी पर्याप्त प्रबंध नहीं थे. इसलिए एनजीटी की शर्तों को पूरा न कर पाने के कारण और लाइसेंस नवीनीकरण में नगर निकायों की लापरवाही के चलते योगी सरकार के फरमान के बाद इनमें से ज्यादातर बूचड़खाने बंद हो गए. मांस कारोबारी और बूचड़खाने चलाने वाले इस मामले में हाईकोर्ट में पहुंचे. अब लाइसेंस नवीनीकरण, बूचड़खानों की बंदी और सरकार की नीति के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में लगभग सात माह से मामला विचाराधीन है.

हाईकोर्ट ने बीते साल 12 मई को इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा था कि सरकार किसी को नॉनवेज खाने से रोक नहीं सकती. अदालत ने सरकार को कारोबारियों को लाइसेंस देने तथा पुराने लाइसेंसों के नवीनीकरण का निर्देश दिया था और नए बूचड़खानों के निर्माण के लिए नगर निकायों को जिम्मेदार माना था. राज्य सरकार को 17 जुलाई तक इसका जवाब देना था. मगर अदालत में सवाल-जवाब का यह सिलसिला आज तक चल ही रहा है. इस बीच योगी सरकार ने एक अध्यादेश के जरिए नगर निकायों को भी बूचड़खानों की जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया. अब स्थिति यह है कि अदालत से कोई फैसला अभी तक आया नहीं और योगी सरकार के आदेशों के मुताबिक कागजों में उत्तर प्रदेश के सारे बूचड़खाने बंद हैं.

मुंह चिढ़ाती हकीकत

लेकिन इस मामले में सरकार के ‘आदेश’ की जमीनी असलियत सरकार को ही मुंह चिढ़ा रही है क्योंकि बूचड़खानों पर प्रतिबंध के बावजूद पूरे प्रदेश में मांस बिक रहा है, पशु काटे जा रहे हैं और पर्यावरण से जुड़े सारे प्रतिबंधों की खुले आम धज्जियां उड़ रही हैं. योगी सरकार के प्रतिबंध से पहले स्थानीय निकायों की जो थोड़ी बहुत देख-रेख थी, स्वास्थ्य अधिकारियों की जांच आदि का जो थोड़ा बहुत नाटक होता था वह भी अब नहीं हो सकता क्योंकि सरकार की नजर में तो बूचड़खाने बंद हैं. इसलिए घरों में जानवर काटे जा रहे हैं और मांस भी बिक ही रहा है. सरकार की नीति के चलते लखनऊ शहर में पिछले वर्ष बकरे का जो गोश्त 400 रु किलो के आस पास बिकता था वह अब 500 से ऊपर बिक रहा है और भैंस का मांस 180 से बढ़कर 250 रु प्रति किलो तक बिकने लगा है. सरकार के प्रतिबंधों के बाद न तो नए स्लाटर हाऊस बने हैं और न पुराने चल रहे हैं. इस कारण मांस खाने वाले भी परेशान हैं और कारोबारी भी.

छुट्टा जानवर समस्या बने

इस मामले में एक और बड़ा तथ्य यह भी है कि योगी सरकार के प्रतिबंधों के बाद गांवों में लगातार बढ़ रहे छुट्टा गाय, बछड़े और सांड़ ग्रामीणों के लिए बड़ी समस्या बन गए हैं. सूबे में अवैध स्लाटर हाउसों पर रोक तो है लेकिन भैंस के वध पर कोई रोक नहीं है. इसलिए बांझ भैंसें तो अभी भी मांस व्यापारी किसी न किसी रूप में खरीद ही रहे हैं मगर गोवंश को लेकर कानूनी स्थिति, योगी सरकार के गौ प्रेम और पुलिस व गौरक्षकों के कारण मांस व्यापारियों ने गोवंश की खरीद-फरोख्त एकदम बंद कर दी है. इसलिए गांवों में ऐसे पशुओं की संख्या तेजी से बढ़ रही है. अनुपयोगी पशुओं से पीछा छुड़ाने के लिए लोग उन्हें छुट्टा छोड़ने पर मजबूर होने लगे हैं. पूर्वांचल के इलाकों से लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश और बुंदेलखंड तक हर इलाके में छुट्टा पशु बड़ी समस्या बनते जा रहे हैं. कई गांवों में ग्रामीण रात भर पहरा देकर छुट्टा पशुओं से फसल बचाने में लगे हैं.

कई इलाकों में ऐसे पशुओं के कारण लोगों में हिंसक झड़पें भी होने लगी हैं. लखीमपुर खीरी में ग्रामीणों ने ऐसे पशुओं को सरकारी स्कूलों में बंद करके अपना विरोध जताया था तो मेरठ में नाराज किसानों ने आवारा पशुओं को तहसील कार्यालयों पर बांध कर नाराजगी जाहिर की थी. गोरखपुर में किसान इस बात से चिंतित हैं कि अगर सरकार ने जल्द इस समस्या का समाधान नहीं किया तो गांवों में अन्न का संकट खड़ा हो सकता है. बुंदेलखंड में तो पानी और चारे की कमी के कारण पहले से ही अनुपयोगी पशुओं को छोड़ देने की ‘अन्ना’ प्रथा प्रचलित थी. लेकिन योगी सरकार के प्रतिबंधं के बाद अब इनकी संख्या बहुत तेजी से बढ़ रही है. एक सर्वेक्षण के अनुसार चित्रकूट धाम मंडल में ही अन्ना पशुओं की संख्या पिछले आठ महीने में डेढ़ गुनी हो चुकी है. बांदा में 95 हजार, महोबा में एक लाख सात हजार, चित्रकूट में एक लाख तीस हजार और हमीरपुर में 85 हजार से अधिक इस तरह के पशु हो चुके हैं.

प्रतिबंधों से पहले चित्रकूट धाम मंडल से लगभग ऐसे 10 हजार पशु हर महीने पशु व्यापारियों को बेचे जाते थे. अब यह सिलसिला लगभग बंद हो चुका है. नतीजा यह हुआ है कि वहां पहले से ही सूखे की मार झेल रही फसलों पर भी बर्बादी का खतरा बढ़ रहा है. ऐसे पशुओं के कारण सड़क दुर्घटनाओं की संख्या भी बढ़ने लगी है. हालात से परेशान योगी आदित्यनाथ के गृह नगर गोरखपुर के किसान श्रीराम कुशवाहा कहते हैं, ‘पता नहीं कैसी सरकार आ गई है कि हम अपने पशु भी बेच नहीं सकते’. उसी इलाके के एक अन्य ग्रामीण बताते हैं, ‘हमारे पास दो बछड़े थे. कोई खरीदने को तैयार नहीं था. एक रात हम डाला में लाद कर उन्हें बहुत दूर ले गए और वहीं छोड़ आए. क्या करते’. योगी के प्रतिबंधों से पहले भी उत्तर प्रदेश में गोवंश का व्यापार स्थानीय खपत के लिए बहुत कम होता था. ज्यादातर ऐसे पशुओं को व्यापारी बिहार होकर पश्चिम बंगाल पहुंचाते थे जहां से उत्तर पूर्वी राज्यों से लेकर बांग्लादेश तक इन जानवरों का व्यापार होता था. लेकिन अब यह सब ठप है. नतीजतन छुट्टा पशुओं की समस्या बढ़ती जा रही है.

अनेक स्थानों में ऐसे पशुओं के हमलों से लोगों की जानें भी चली गई हैं. अभी हाल में प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में सांड़ के हमले से बीएचयू की छात्रा निधि यादव की मौत हो गई थी. तब छुट्टा पशुओं का सवाल खूब चर्चा में आया था. अब राज्य सरकार ने इस समस्या के समाधान के लिए ऐसे आवारा पशुओं को रखने के लिए कान्हा उपवन योजना की घोषणा की है. बनारस में भी 10 एकड़ में ऐसा कान्हा उपवन बनना है, मगर अभी तो बजट ही उपलब्ध नहीं हुआ है. ऐसी ही चार गौशालाएं बुंदेलखंड में भी बननी हैं. इन छुट्टा पशुओं में बछड़ों की संख्या अधिक होने के कारण सरकार अब कृत्रिम गर्भाधान के जरिए बछड़ों के बजाय बछिया ही पैदा करने की एक योजना भी शुरू करने का दावा कर रही है.

लेकिन इस सबसे भी छुट्टा पशुओं की समस्या से निजात मिलना संभव नहीं. नगर निगमों में चल रहे कांजी हाऊस पहले से बदहाल हैं. जगह की कमी के कारण उनमें रखे जाने वाले पशुओं की संख्या भी सीमित ही हो सकती है. वैसे भी वहां पशुओं को बहुत थोड़े समय तक ही रखा जा सकता है. यानी यह व्यवस्था भी समस्या का पूर्ण समाधान नहीं हो सकती. राज्य में छोड़े गए पशुओं की देखभाल के लिए निजी संस्थानों द्वारा संचालित कुल 495 पंजीकृत गौशालाएं हैं. इन्हें सरकारी अनुदान भी दिया जाता है. मगर इनमें भी पहले से ही सीमा से अधिक पशु पल रहे हैं. इसलिए इनके जरिए भी कोई राहत संभव नहीं है. सरकार जिन कान्हा उपवनों की घोषणा कर रही है उनके जमीन पर उतरने में अभी काफी वक्त लग सकता है. तब तक स्थिति और भी गंभीर हो चुकी होगी अतः सरकार को जो कुछ भी करना है बहुत जल्द करना होगा.

विपक्ष इस मुद्दे को विधानसभा में भी उठा चुका है और गोरखपुर तथा फूलपुर के लोकसभा उपचुनावों के नतीजों में भी इस मुद्दे का असर दिख चुका है. इसलिए लोकसभा चुनावों में भी भाजपा के लिए यह सवाल परेशानी पैदा कर सकता है. सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र रायबरेली में दीवारों पर लिखी टिप्पणी इसका संकेत भी देती है जिसमें कहा गया है, ‘योगी जी आप गौ भक्ति करो, खूब करो. लेकिन हमारी खेती को किसी तरह गौ माता से बचा लो’.

योगी सरकार को अब यह सोचना होगा कि वह किस तरह इस समस्या का समाधान निकाल सकती है. विपक्ष तो उसे बाबा रामदेव की शरण में जाकर कोई उपाय तलाशने की सलाह दे ही रहा है क्योंकि गाय के नाम पर बाबा का कारोबार योगी सरकार से कहीं अच्छा चल रहा है.