मध्य प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के अध्यक्ष पद को लेकर फिर अटकलें तेज हैं. सोमवार को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने एक चैनल के कार्यक्रम में कहा कि अगला भाजपा प्रदेश अध्यक्ष कौन होगा, इसे लेकर तस्वीर बुधवार तक साफ हो जाएगी.

चर्चा है कि चुनाव के ऐन मौके पर भाजपा ने जो काम 2008 और 2013 में किया, वही इस बार फ़िर किया जा सकता है. अटकलें लग रही हैं कि इस बार भी मौज़ूदा प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार सिंह की विदाई हो सकती है. उनकी जगह जो नाम प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए सबसे आगे बताया जा रहा है वह केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर का है. हालांकि भाजपा के अंदरखाने बातचीत करने पर कुछ और नाम भी निकलकर सामने आते हैं, लेकिन इनमें भी नरेंद्र तोमर की ही दावेदारी मज़बूत बताई जा रही है. ऐसा होनेकी वज़हें भी खूब गिनाई जा रही हैं.

नंदकुमार की विदाई क्यों?

मध्य प्रदेश भाजपा में नंदकुमार को ऐसे नेताओं को गिना जाता है जिनकी ज़ुबान उनके काबू में नहीं रहती. मसलन इन दिनों पूरे देश में आक्रोश का सबब बने कठुआ बलात्कार और हत्या मामले को लेकर उन्होंने कहा कि यह पाकिस्तान की साजिश है. इससे पहले हाल ही में अपने गृह नगर बुरहानपुर में पुलिस थाने की नई इमारत का शुभारंभ करते हुए नंदकुमार ने कहा, ‘अपराध करने के बाद अपराधी हमसे (जन प्रतिनिधियों से) यह उम्मीद करते हैं कि हम उन्हें पुलिस से बचाएं. हमें भी मज़बूरी में पुलिस को फोन कर के उन्हें छुड़वाना पड़ता है. ऐसे में पुलिस को बेहद दबाव में काम करना पड़ता है.’

वैसे यह पहला मौका नहीं है जब भाजपा और उसके मुखिया ऐसी स्थितियों में उलझे हों. इससे पहले जब राज्य के आनंद मंत्री लाल सिंह आर्य के ख़िलाफ़ हत्या के एक मामले में ग़िरफ़्तारी वारंट जारी हुआ था तब भी ऐसी ही स्थिति बनी थी. उस वक़्त भी नंदकुमार सिंह दावे के साथ कह रहे थे, ‘मेरे लाल सिंह निर्दोष हैं. उनकी जमानत का बंदोबस्त कर लिया जाएगा.’ आगे चलकर वह बंदोबस्त हो भी गया.

यही नहीं, पिछले साल जब भाजपा अध्यक्ष अमित शाह मध्य प्रदेश की तीन दिन की यात्रा पर आए थे तो उन्होंने भी पार्टी के संगठन के काम करने के तौर-तरीकों पर ख़ासा ऐतराज़ जताया था. ख़ास तौर पर पार्टी के ज़मीनी कार्यकर्ताओं की उपेक्षा के मामले का उन्होंने विशेष उल्लेख किया था. तभी से प्रदेश नेतृत्व में देर-सबेर परिवर्तन तय होने की बात कही जा रही थी. इसके बाद जब हाल में मुंगावली और कोलारस विधानसभा उपचुनाव में भाजपा को हार मिली तो यह लगभग तय हो गया कि नंदकुमार को जाना होगा. इस हार के बाद सरताज सिंह और बाबूलाल गौर जैसे पार्टी के अतिवरिष्ठ नेताओं ने प्रदेश नेतृत्व के ख़िलाफ़ सीधा मोर्चा ही खोल दिया.

हालांकि एक वर्ग अब भी बदलाव से इंकार कर रहा है

वैसे इन तमाम स्थितियों और अटकलों के बावज़ूद एक वर्ग ऐसा भी है जो बदलाव की संभावनाएं नकारता है. मिसाल के तौर पर प्रदेश उपाध्यक्ष विजेश लूनावत से कुछ दिन पहले जब सत्याग्रह ने राय लेनी चाही तो उन्होंने साफ़ कहा, ‘पार्टी में कोई असंतोष नहीं है. जिन वरिष्ठ नेताओं को थोड़ी-बहुत शिकायत थी उनका प्रदेश नेतृत्व ने समाधान कर दिया है. रही बदलाव की बात तो पार्टी मौज़ूदा नेतृत्व की अगुवाई में ही विधानसभा चुनाव में उतरेगी.’

इसके बावज़ूद बदलाव की संभावनाएं सिरे से ख़ारिज़ नहीं की जा सकतीं. इसकी कुछेक मज़बूत वज़हें तो ऊपर गिनाई जा चुकी हैं. सो अब यह सवाल भी हो ही सकता है कि अगले प्रदेश अध्यक्ष के दावेदार कौन-कौन हो सकते हैं. उनकी दावेदारी को मज़बूत और कमज़ोर करने वाली कौन-कौन सी चीजें हो सकती हैं? इसका जायज़ा लेते हैं.

प्रदेश अध्यक्ष पद के दावेदारों में कई नाम हैं. जैसे- नरेंद्र सिंह तोमर, नरोत्तम मिश्र, कैलाश विजयवर्गीय, प्रह्लाद सिंह पटेल आदि. इन सभी की दावेदारी के पीछे उनकी अपनी कुछ ख़ासियतें हैं. लेकिन थोड़ी-बहुत चीजें ऐसी भी हैं जो उनकी दावेदारी को कमज़ोर करती हैं.

नरेंद्र सिंह तोमर : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विश्वस्त केंद्रीय मंत्रियों में गिने जाते हैं. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की भी वे पहली पसंद हैं. इससे पहले 2008 और 2013 के राज्य विधानसभा चुनावों के प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए वे शिवराज के साथ मिलकर पार्टी की सत्ता में वापसी करा चुके हैं. पार्टी संगठन में लगभग सभी वरिष्ठ-कनिष्ठ नेताओं से उनकी अच्छी बनती है. आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ) की राय भी इनके बारे में अच्छी है. ऐसे में तोमर के अध्यक्ष बनने की संभावनाएं सबसे अधिक बनती हैं.

लेकिन केंद्र में मंत्री होना इनके लिए एक दिक्कत बन सकता है. प्रधानमंत्री मोदी इन्हें छोड़ेंगे या नहीं यह कहना मुश्किल है. चूंकि पार्टी में लंबे समय से ‘एक व्यक्ति एक पद’ का सिद्धांत लागू है. ऐसे में अगर केंद्र में मंत्री रहते हुए तोमर को प्रदेश अध्यक्ष पद की ज़िम्मेदारी दी गई तो पार्टी के ही कई असंतुष्टों के साथ विपक्ष को भी मुद्दा मिल सकता है. और अगर उन्हें मंत्री पद से इस्तीफ़ा दिलवाया गया तो प्रधानमंत्री मोदी को परेशानी हो सकती है.

नरोत्तम मिश्र : तोमर के बाद दूसरा नाम इनका है. मिश्र प्रदेश के वरिष्ठ मंत्रियों में शुमार हैं. इन्हें ‘शिवराज का संकट मोचक’ तक कहा जाता है. मंदसौर गोलीकांड में मारे गए किसानों के परिजनों को मुख्यमंत्री शिवराज के सत्याग्रह मंच तक लाने का कारनामा इन्होंने ही किया था जो इनके हुनर की हालिया मिसाल है. पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के विश्वस्तों में गिने जाते हैं. इसलिए भी इनकी दावेदारी मज़बूत होती है.

हालांकि चुनाव के दौरान पैसे देकर पक्ष में ख़बरें छपवाने के मामले में निर्वाचन आयोग उन्हें दोषी ठहरा चुका है. उनकी विधानसभा सदस्यता रद्द की जा चुकी है. तीन साल के लिए उन्हें कोई भी चुनाव लड़ने से भी प्रतिबंधित किया जा चुका है. वैसे चुनाव आयोग के आदेश के ख़िलाफ़ उन्होंने शीर्ष अदालत में याचिका लगा रखी है. लेकिन अगर इन्हें अध्यक्ष बनाया गया तो विपक्ष और जनता की अदालत में उनके साथ-साथ पार्टी को भी ज़वाब देना मुश्किल हो सकता है.

प्रह्लाद पटेल : दमोह से पार्टी सांसद और पिछड़े वर्गों का चेहरा. पटेल अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में राज्य मंत्री रह चुके हैं. पार्टी के युवा कार्यकर्ताओं में लोकप्रिय हैं. लेकिन प्रह्लाद हमेशा शिवराज के अनुकूल नहीं रहते. दूसरा- अभी कुछ समय पहले ही शिवराज सरकार में इनके भाई जालम सिंह पटेल को मंत्री बनाया गया है. संभव है इसी आधार पर इन्हें प्रदेश अध्यक्ष पद की दावेदारी छोड़ने के लिए मना लिया जाए.

कैलाश विजयवर्गीय : पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव. अमित शाह के विश्वस्त. पश्चिम बंगाल जैसे राज्य के प्रभारी. शिवराज सरकार में उद्योग मंत्री रहे हैं. लेकिन शिवराज से प्रतिद्वंद्विता भी रखते हैं. कभी-कभार आड़े-तिरछे बयान दे देते हैं. साथ ही सर्वमान्य तो क्या बहुमान्य चेहरे के तौर पर भी नहीं गिने जाते. अलबत्ता जोड-तोड़ में ज़रूर माहिर हैं.

भूपेंद्र सिंह : राज्य के गृह मंत्री. मुख्यमंत्री शिवराज के विश्वस्त. लेकिन मंदसौर गोलीकांड ने उनकी छवि पर बट्‌टा लगाया है. राज्य की कानून-व्यवस्था को भी विपक्ष लगातार मुद्दा बना रहा है. ऐसे में अगर इन्हें अध्यक्ष पद की ज़िम्मेदारी दी गई विपक्षी बंदूकें इनकी तरफ़ तन सकती हैं.

राकेश सिंह: एक नाम जबलपुर के सांसद राकेश सिह का भी लिया जा रहा है. राकेश सिंह 2004 से जबलपुर संसदीय सीट से सांसद हैं. वे 2014 में लगातार तीसरी बार यहां से लोक सभा में पहुंचे हैं. फिलहाल महाराष्ट्र के प्रभारी हैं. इन्हें मजबूत संगठनात्मक कौशल रखने वाले व्यक्ति के रूप में जाना जाता है. इनके साथ अब तक कोई विशेष विवाद भी नहीं जुड़ा है. ऐसे में ये तमाम दावेदारों के बीच छिपे रुस्तम साबित हो सकते हैं.