अच्छे किरदारों की भूख को आप पंकज त्रिपाठी के चेहरे पर आसानी से पढ़ सकते हैं. 2017 में ‘न्यूटन’, ‘बरेली की बर्फी’, ‘अनारकली ऑफ आरा’ और ‘गुड़गांव’ के दम पर साल के सर्वश्रेष्ठ अभिनेता बनकर उभरने के बावजूद उन्हें इस बात की चिंता अभी से सता रही है कि 2018 में उन्हें ‘न्यूटन’ जैसी कोई फिल्म अभी तक नहीं मिली है. सिर्फ दो महीने पुराना हुआ है ये साल, लेकिन पंकज त्रिपाठी बेचैन हैं. कमर्शियल सिनेमा की वकालत वे जी भरकर करते हैं, लेकिन जब इंडिपेंडेंट सिनेमा के बारे में कह रहे होते हैं तब उनके चेहरे की चमक देखने लायक होती है.

सत्याग्रह के साथ मुंबई में उनके घर पर हुई लंबी बातचीत में बात से बात निकलते हुए कई बार दार्शनिक भी हुई. ऐसी-ऐसी पंक्तियां मिलीं कि संवाद बन जाएं. बात करने का जो सुख होता है, उससे लंबे अरसे बाद फिर मुलाकात हुई. जहां बैठकर बात हुई वहां एक सोफा भी पहले से रखा मिला, लेकिन जब हमने बैठने के लिए प्लास्टिक की कुर्सी उठा ली, तो पंकज त्रिपाठी ने भी साथ ही साथ दूसरी उठा ली. सोफा हमें आखिर तक घूरता रहा कि ऐसी नाकद्री मेरी पहले कभी नहीं हुई, किसी सुपरस्टार का घर होता तो कब का वो मुझे ग्रहण कर चुका होता.

उसी लंबी मुलाकात के संपादित अंश, जिन्हें पढ़ने के बाद आप पंकज त्रिपाठी को इतना सारा जान चुके होंगे कि उनसे निजी तौर पर मिलने को व्याकुल होने लगेंगे :

पकंज जी, आप वो पहले शख्स हैं जिन्होंने दुनिया को बताया था कि कौवा बिरयानी भी कोई चीज होती है!

हाहा! हां!

(2004 में आई ‘रन’ पंकज त्रिपाठी की पहली फीचर फिल्म थी. बेहद छोटा-सा उनका रोल था, जिसका काम विजय राज के लिए मुसीबतें खड़ी करना था. ऐसे ही एक सीन में उन्होंने विजय राज को बताया था कि जो पांच रुपए की चिकन बिरयानी उन्होंने अभी-अभी खाई है, वो असल में कौवा बिरयानी है!)

मैं एक दोपहर हॉस्टल में सोया हुआ था. तब मैं दिल्ली में था. एक्टर लोगों का हॉस्टल था. वहां फिल्म से जुड़ा एक असिस्टेंट यह सोचकर आया कि यहां बहुत सारे एक्टर रहते हैं. मेरे बारे में उसे पता था. तो वो मिला और हम तुरंत ही ऑटो में बैठकर प्रगति मैदान आ गए जहां पहले से कैमरा लगा हुआ था. मुझे कुछ मालूम नहीं कि क्या फिल्म है, क्या बोलना है. असिस्टेंट बोला पैसे चार हजार मिलेंगे. तो तैयार हो गया, शर्ट दी उन्होंने. पैंट मेरी ही थी, चप्पल भी मेरी. पहले ही सीन में विजय राज से बोलना था कि तुम जो खाए हो वह कौवा बिरयानी है!

किस्मत देखिए, उस सीन के शूट होने के एक घंटे पहले तक मुझे मालूम नहीं था कि थोड़ी देर में मैं कोई फिल्म करने वाला हूं!

एक यक्ष प्रश्न पूछने की इच्छा नसीरुद्दीन शाह से लेकर आप तक से है. आप शुरू में मिल गए तो पहले आप से ही - अभिनय क्या है?

इसके उत्तर में ही पूरा इंटरव्यू खत्म हो जाएगा. साधारण शब्दों में कहूं तो मेरे लिए अभिनय का मतलब है - अभी और नया. जो अभी घटित हुआ हो और जिसमें कुछ नयापन हो.

एक दिन मैं बरेली की बर्फी की स्क्रिप्ट पढ़ रहा था. जितना ज्यादा पढ़ रहा था उतना गहरा समझ आ रहा था कि लिखे हुए सीन्स को आप अनोखे ही स्तर पर पहुंचा देते हैं. लिखाई में जो ठहराव बिलकुल नहीं होता, उससे आप किरदार को लबालब भर देते हैं. न्यूटन को लेकर भी यह बात कही जा सकती है और निल बटे सन्नाटा को लेकर भी. तो ये जो ठहराव वाला अभिनय है न, जो आपके शुरुआती काम में नजर नहीं आता, यह कब-कैसे आपकी सिग्नेचर स्टाइल बना?

यह कभी तय नहीं किया कि ठहराव वाला अभिनय ही करुंगा. किरदार मांगते हैं ठहराव. मैं नहीं लाता हूं. ‘बरेली की बर्फी’ जब शूट कर रहा था, जिसके पिता वाले किरदार के ठहराव की आप बात कर रहे हैं, तभी ‘मुन्ना माइकल’ भी कर रहा था. उसमें मैं गुंडा बना हूं, हीरोइन छेड़ने वाला. तो उसमें ठहराव नहीं है.

और ये क्राफ्ट जो आज आप देख रहे हैं वो 10-20 साल पहले भी मेरे पास थी. अनुभव के साथ बतौर अभिनेता जरूर ग्रो किया है, लेकिन जब मैं पटना में रंगमंच करता था, तब भी मैंने यह ठहराव वाला अभिनय किया है. 1996 की बात है और श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास राग दरबारी पर हुए एक नाटक में वैद्य जी का किरदार करते वक्त मैंने ये ठहराव रखा है.

आज के निर्देशक आपको इजाजत देते भी हैं ठहराव वाला यह अभिनय करने की...नहीं तो वो कह सकते हैं – तुम पर कैमरा इतनी देर क्यों ठहरे!

बिलकुल. आजकल तो फास्ट एडिटिंग का दौर है. होल्ड नहीं हो रहा है...हर कोई बोलता है कि जब तक ऑडियन्स समझे तब तक आगे बढ़ जाओ. क्यों आगे बढ़ जाओ, आपको ऑडियन्स को समझाने में क्या दिक्कत है. बस पेस...पेस...पेस!

ये अमेरिकी फिल्मों से ज्यादा आया है, और दक्षिण भारतीय फिल्मों से. स्पीड वाला सिनेमा!

हां! हम रेसिंग थोड़े ही कर रहे हैं...सिनेमा एक दुनिया क्रिएट करता है और उसमें वक्त लगता है. ‘बरेली की बर्फी’ के दौरान उसकी निर्देशिका अश्विनी अय्यर तिवारी काफी प्रेशर में थीं. बोल रही थीं कि पेस बढ़ा दो आप. डबिंग में ही बढ़ा दो. मैंने बोला कि आप ट्रस्ट करो. मैं पेस बढ़ा के भी डब करता हूं और इत्मिनान से भी, जैसी कि परफॉर्मेंस है. फिर आप आराम से फैसला करना. रिजल्ट अब आप लोगों के सामने है!

एक सीन में हालांकि, मैंने पेस बढ़ाई है. पंखे वाला एक सीन है जिसमें परफॉर्मेंस में उतनी पेस नहीं है जितनी डबिंग में लानी पड़ी. वही मार्केट का प्रेशर!

(थोड़ा सोचकर) मेरा मानना है कि अगर परफॉर्मेंस में ट्रुथ है न, तो किसी प्रकार के पेस की, किसी प्रकार के भागने की जरूरत नहीं है. आपके पास ट्रुथ नहीं है, तो आप बैकग्राउंड में स्कोर ढूंढ़ते हो, शार्प एडिटिंग ढूंढ़ते हो. समाज में भी जब ट्रुथ नहीं है तो आप प्रोपेगेंडा ढूंढ़ते हैं, नकली इमारत खड़ी करते हैं. जहां ट्रुथ है वहां कुछ करने की जरूरत नहीं. ट्रुथ असर करता है, बस वक्त लगता है.

किरदारों को जो मानवीय टच देने का आपका तरीका है, वो भी काफी निराला है. न्यूटन में आपने अपने आर्मी अफसर वाले किरदार को खुद अपनी समझ से थोड़ा मानवीय बनाया, जबकि ये ब्रीफ निर्देशक का था ही नहीं. बरेली की बर्फी, निल बटे सन्नाटा, मसान में भी ये दुर्लभ टच आसानी से नजर आता है. तो इस तरह की एप्रोच कहां से आती है?

आपने ‘न्यूटन’ की स्क्रिप्ट पढ़ी है? (इस पर हमने न में सर झुका दिया). आ गई है ऑनलाइन, पढ़िएगा, तब पता चलेगा. स्क्रिप्ट में किरदार टिपिकल विलेन था. आर्मी या पुलिस वाले का रोल आते ही न, राइटर और डायरेक्टर तुरंत कड़क मोड में आ जाते हैं. कश्मीर और नक्सल प्रभावित इलाके का हो तो और ज्यादा. या तो घूसखोर होगा, लीचड़ होगा, या तो फिर बहुत ही कड़क होगा. मैं हर किरदार के अंदर पहले ‘ह्यूमन’ खोजता हूं. उसकी ब्रूटेलिटी, उसकी कड़कनेस (!) तो स्क्रिप्ट में लिखी मिल जाएगी, लेकिन ह्यूमेनिटी नहीं लिख पाते कई लोग.

इसलिए मैं हर विलेन में पहले आदमी ढूंढ़ता हूं. ये आदमी है और ये ऐसा काम क्यूं कर रहा है, इसके पीछे कई वजहें होंगी. या तो दबाव में कर रहा है या फिर ऐसा करने में उसे मजा आता है. लेकिन अपने बीवी-बच्चों के सामने तो विलेन भी हीरो ही होता है न! मोगेम्बो या गब्बर सिंह की बेटी होती तो वो भी उन्हें हीरो ही समझती. तो मैं उन बेटियों के नजरिए से हर रोल को देखता हूं!

इस तरह किरदार को देखना एनएसडी ने सिखाया, या जीवन ने?

जीवन ने सिखाया. ऑफकोर्स.

ऐसा कोई रोल जिसमें आपने पूरी तरह डायरेक्टर की सुनी हो? जैसे मैं कहीं पढ़ रहा था कि गुड़गांव में आपने जिस सटल और मिनिमलिस्ट तरीके से अपने किरदार केजी सिंह को निभाया था, ठीक ऐसा ही फिल्म के निर्देशक शंकर रमन चाहते थे और उनका ब्रीफ था कि सिंगल स्क्रीन दर्शकों के लिए नहीं, मैं अपने लिए ये फिल्म बना रहा हूं.

बहुत सारे रोल. अमूमन सारे ही रोल निर्देशक के विजन भरोसे किए हैं. शंकर रमन भी बहुत उम्दा डायरेक्टर हैं, अच्छे सिनेमेटोग्राफर हैं. ऐसा कुछ नहीं था जैसा आपने कहा, बल्कि शंकर ने मुझे पूरी छूट दी थी. इनफैक्ट, अब तक सबसे ज्यादा छूट किसी परफॉर्मेंस में मिली है तो ‘गुड़गांव’ में मिली है.

शंकर बोलते थे कि ये जो स्क्रिप्ट मैंने दी है तुम्हें, ये मैप है. जर्नी तुम्हें करनी है. तुम तय करो कि कहां रुकोगे, कहां खाना खाओगे, ‘किस’ रास्ते से जाओगे. क्योंकि हर किरदार तक पहुंचने के अलग-अलग रास्ते होते हैं. और वहां पहुंचने के लिए हम एक्टर्स के पास कई टूल होते है...कभी हम आंखों से खेलते हैं, कभी डायलॉग डिलेवरी से, चेहरे के हाव-भावों से, रिंकल्स ला देते हैं, चिन ऊपर या नीचे कर लेते हैं. तो मैंने सोचा कि ‘गुडगांव’ के लिए मिनिमम टूल्स इस्तेमाल करता हूं. क्योंकि मैं देखना चाहता था कि बिना किसी क्राफ्ट और टूल्स को इस्तेमाल किए, मैं कितना परफॉर्मेंस ला पाता हूं.

इसलिए मुझे इंतजार भी है ‘गुडगांव’ का, कि वो नेटफ्लिक्स और टीवी पर आए और लोग देखें. थियेटर में तो किसी ने नहीं देखी.

इसी तरह का मिनिमलिस्ट आपका पाउडर वाला डॉन का रोल भी था. (आज से आठ साल पहले 2010 में सोनी टीवी पर आई इस सीरीज में ड्रग माफिया और मुंबई पुलिस का टकराव दिखाया गया था. तब इसे बहुत कम लोगों ने देखा था. आज नेटफ्लिक्स इसे दोबारा दिखा रहा है और जिन्होंने भी देखा है तारीफ ही कर रहे हैं)

हां. (‘पाउडर’ का) नावेद अंसारी अगर 20 साल मैच्योर हो जाएगा तो (‘गुड़गांव’ का) केजी सिंह बन जाएगा. (पंकज त्रिपाठी ऐसे ही अपने निभाए हर किरदार को बेहद प्यार से नाम लेकर पुकारते हैं... ‘उस’ फिल्म का और ‘इस’ फिल्म का किरदार नहीं कहते!).

पाउडर आपके शुरुआती वक्त का है. उस वक्त आपको नहीं लगा कि लाउड होने की संभावनाओं से भरे डॉन जैसे किरदार को बेहद कम एक्सप्रेशन देकर मिनिमलिस्टिक तरीके से निभाने पर उसे स्वीकार नहीं किया जाएगा? वो भी टीवी पर?

अब अलग नहीं करूंगा तो नोटिस कैसे किया जाउंगा! जो दूसरे नहीं करते हैं वो मैं करूंगा तभी तो मेरी पहचान बनेगी. (थोड़ा रुककर) हर एक्टर को किरदार पढ़ते वक्त एक थॉट आता है. कैरेक्टर ऐसा होगा, वैसा होगा. मुझे भी आता है. मैं फौरन उस पहले खयाल को साइड में रख देता हूं. और उसके अलावा जो-जो थॉट आते हैं, उन पर काम करने की कोशिश करता हूं. अमूमन हमारा पहला थॉट कहीं न कहीं से प्रभावित होता है, उधारी का होता है. डॉन के रोल में भी पहले थॉट वहीं आएंगे...सिनेमा का रेफरेंस, नॉवेल का, किसी एक्टर का रेफरेंस. इनको साइड में रखने की जरूरत होती है.

हमेशा ऐसा होता है कि अच्छे-अच्छे अभिनेता बाजार के दबाव में आकर गुणवत्ता से विमुख काम करने लगते हैं. सफलता जब उनकी ओर भागते हुए आती है तो वो भी भागकर बैंक बैलेंस बढ़ाने लगते हैं, कार-व्यापार, समंदर किनारे के बड़े मकानों के फेर में पड़ जाते हैं. आपने कुछ सोचा है कि अब जब आप सफल और स्थापित हो चुके हैं, इन सारे भौतिकवादी आकर्षणों से कैसे बचेंगे?

देखो दोस्त, इंडिपेंडेंट सिनेमा जैसे जिस सिनेमा में आपको मजा आता है न, चाहे ‘न्यूटन’ हो, ‘बरेली की बर्फी’ हो, ‘गुड़गांव’ हो, वहां बहुत कम पैसे होते हैं. पैसे ‘दिलवाले’ में ही ज्यादा होते हैं (शाहरुख खान की पिक्चर, जिसमें पंकज त्रिपाठी ने अदना-सा रोल किया था)! और हम एक्टर हैं तो क्या हुआ, हम भी चाहेंगे कि हमारे बीवी-बच्चे एक अच्छे से घर में रहें. बेटी ठीक स्कूल में पढ़े. कभी मन हो तो उन्हें हॉलीडे पर यूरोप ले जा सकें. और मैं तो यात्री हूं, मुझे घूमना बेहद पसंद है.

लेकिन एक संतुलन बना रहना चाहिए. जैसे इस साल मैं अभी तक बेचैन हूं कि ‘न्यूटन’ और ‘गुड़गांव’ जैसी कोई स्क्रिप्ट आई नहीं है मेरे पास. मैं खोज रहा हूं. कमर्शियल चल रहा है और पिछले साल के बनिस्बत पैसे ज्यादा कमा लिए हैं, दो महीनों में ही. लेकिन जिस स्क्रिप्ट की मुझे खोज है 2018 में, वो अभी तक नहीं आई. दो महीने बीत गए हैं, हम मार्च में मिल रहे हैं.

(थोड़ा सोचकर) और ये संतुलन तो बनाना ही पड़ेगा. ‘दिलवाले’ सिर्फ मुंबई में 500 प्लस स्क्रीन में रिलीज होती है. ‘गुड़गांव’ सिर्फ 100 में. आप कितने दिन ‘गुड़गांव’ जैसी फिल्म करोगे. आपकी सोसाइटी में लोगों को पता नहीं लगता कि आप एक्टर हैं. एक ‘दिलवाले’ कर लो, एक ‘जुड़वां 2’ कर लो, आपकी बिल्डिंग में सब आपको पहचानने लगते हैं. (जैसे खुद से ही कह रहे हों) सब कमर्शियल खेल है!

लेकिन कमर्शियल सिनेमा से मुझे चिढ़ नहीं है. किसी को भी नहीं होनी चाहिए. अगर ‘जुड़वां 2’ या ‘दिलवाले’ जैसा कमर्शियल सिनेमा बनता है तो उनकी वजह से हमारे देश के थियेटर जीवित हैं. अगर कमर्शियल सिनेमा नहीं बने तो आपके भोपाल के आधे थियेटर बैंक्विट हॉल बन जाएंगे. शादियां होंगीं और रेस्टोरेंट खुलेगा वहां. ‘न्यूटन’ और ‘गुड़गांव’ जैसी फिल्में तभी चलेंगी जब उन्हें थियेटर मिलेंगे और थियेटर तब मिलेंगे जब कमर्शियल सिनेमा चलेगा और बिजनेस होगा. आप इस सच को नकार नहीं सकते.

विकीपीडिया कहता है कि एक जमाने में आप अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े रहे थे? (जब 1993 के आसपास पटना में रहते थे तब इस संगठन के छात्र नेता थे). गांव में भी आरएसएस की शाखा में शामिल होते थे. आज भी उसकी राजनीति और विचारधारा से सहमति है आपकी?

विकीपीडिया क्या, मैं भी कहता हूं! उस वक्त मैं सहमत था तो उनके साथ था, अब मैंने व्यवसाय ही बदल दिया है, तो सहमति-असहमति मायने ही नहीं रखती. अब मेरे विचार सिनेमा में मेरे किरदारों के थ्रू दिखेंगे. मैं राजनेता हूं नहीं कि मेरे राजनीतिक विचार हों. और अगर हैं तो ये बहुत नितांत, निजी मामला है. जैसे मतदान गुप्तदान होता है, आप अकेले में करते हैं.

आजकल तो फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े कलाकार, निर्देशक सब खुलकर अपने राजनीतिक झुकाव जगजाहिर कर रहे हैं.

सबके पॉलिटिकल मोटिव हैं, कोई न कोई एजेंडा है. अगर सिनेमा का आदमी राजनीतिक बातें करता है तो उसके पीछे उसका कोई हित जरूर निहित है. कलाकार, लेखक, पेंटर, कार्टूनिस्ट की तो ये जिम्मेदारी है कि वो सिस्टम की आलोचना करे. हम पार्टी की नहीं, कांग्रेस हो या बीजेपी, तंत्र की, सिस्टम की आलोचना करें. जिस दिन हम तंत्र की तारीफ करने लगेंगे उस दिन राजाओं के जमाने के दरबारी कवियों जैसे हो जाएंगे. जो या तो राजा का गुणगान कर रहा होता है या तंत्र की तारीफें. आलोचना करने से एक कलाकार की धार बची रहती है.

और कला न, कभी भी जन विरोधी नहीं हो सकती. आप हिंदुस्तान के किसी भी कमर्शियल सिनेमा में नहीं देखेंगे उन्हें बोलते हुए, भले ही वो कैसे भी बना हो, नॉनसेंस हो बेसिरपैर का हो, कि समाज में दरार होनी चाहिए, प्रेमी-प्रेमिका को मार डालना चाहिए, हिंदू-मुस्लिम दंगे होने चाहिए. हर हिंदी सिनेमा विलेन को अंत में मारता है.

आपने एक इंटरव्यू में कहा था कि आप किसान के बेटे हैं और आज भी फ्रिज में रखा पुराना खाना नहीं खाते. सुना भी है कि आपके गांव वाले घर के आसपास चारों तरफ खेत हैं और लगी हुई एक नदी कल-कल बहती है. सफलता के करीब बैठे पंकज त्रिपाठी के अंदर आज कितना गांव बचा हुआ है?

मैं गांव से निकल गया हूं, गांव मेरे अंदर से नहीं निकला है. पूरा बचा हुआ है. जब मैं कोई किरदार भी कर रहा होता हूं तो सीधे गांव पहुंच जाता हूं. वहीं से किरदारों के लिए रेफरेंस लेता हूं. मेरा रेफरेंस सिनेमा नहीं है. बाकी के एक्टर बोलते हैं कि उस हॉलीवुड के एक्टर की परफॉर्मेंस उस पिक्चर में देखो. संजीव कुमार को इसमें देखो. बलराज साहनी को उसमें देखो. मेरे पास रेफरेंस के तौर पर सिनेमा करने के लिए सिनेमा नहीं है.

फिल्में नहीं देखते?

नहीं देखता. अभी तक की जिंदगी में मुश्किल से 50 फिल्में देखी होंगी.

हॉलीवुड फिल्में भी नहीं?

एक भी नहीं.

सही में (भौचक्क होकर पूछते हुए)?

अब आप मानोगे नहीं! रुको...रुको बता रहा हूं (यह कहकर पंकज त्रिपाठी चंद देखी हुई अंग्रेजी फिल्मों के नाम याद करने की कोशिश में लग गए!)...‘शेप ऑफ वॉटर’ अभी देखी दिसम्बर में. मैं लॉस एंजलिस में था तो उसकी स्क्रीनिंग हो रही थी. पूरी कास्ट आई थी, डायरेक्टर सहित. मुझे बुलाया तो चला गया. देखकर मैं तो डिसअपॉइंट हुआ. अरे! इससे बढ़िया तो न्यूटन है हमारी! (‘शेप ऑफ वॉटर’ को हाल ही में सर्वश्रेष्ठ फिल्म के ऑस्कर से नवाजा गया है)

इसके अलावा (फिर थोड़ा सोचकर), मैंने 20-25 मिनट की ‘गॉडफादर’ देखी है. वो भी इसलिए कि ‘पाउडर’ के बाद कई लोगों ने बोला कि उसमें मैंने मार्लिन ब्रैंडो की नकल की है. एक प्रबुद्ध लेखक ने ये बात कही मेरे दोस्त से. उसने मुझसे कही तो मैंने सोचा कौन है ये ब्रैंडो, देखें तो जरा! तो मैंने जाकर हाउस...क्या नाम है उसका...’गॉडफादर’, वो देखी. ब्रैंडो के दो-तीन सीन देखे. देखकर लगा कि मेरी जॉ-लाइन थोड़ी चौड़ी है और मैंने भी ब्रैंडो जैसा ठहराव ‘पाउडर’ में रखा है. शायद इसलिए लोगों को लगा हो.

लोगों के पास न, सिनेमा देखते हुए दूसरे सिनेमा का रेफरेंस होता है. लेकिन मेरे पास सिनेमा का रेफरेंस नहीं है (नहीं पर दोबारा जोर डालते हुए).

जानबूझकर दूर रखा खुद को सिनेमा से?

नहीं. सिनेमा के प्रति आपका मोह-सम्मोहन जो होता है, वो अमूमन 8वीं-9वीं क्लास से लेकर ग्रेजुएशन तक होता है. 8वीं से 10वीं तक न मेरे घर में टीवी था, न गांव में सिनेमाहॉल. मुझे सिनेमा की कोई जानकारी नहीं थी. जब 10वीं पढ़ रहा था, उस दौरान मैं एक शादी में गया जहां ‘अंधा कानून’ वीएचएस कैसेट पर दिखाई जा रही थी. अंधा मतलब ब्लाइंड, का मतलब का और नून हमारे यहां नमक को भोजपुरी में बोलते हैं. तो मुझे लगा कि ब्लाइंड आदमी की नमक की कहानी चल रही है. लेकिन पूरी पिक्चर में न कोई अंधा था, न नमक! मैं तो परेशान हो गया. आखिर तीन दिन बाद मुझे समझ आया कि कानून एक साथ है, और ये ब्लाइंड जस्टिस वाली बात है!

तो सिनेमा से दूरी मैंने जानकर नहीं रखी. जिस उम्र में आप सिनेमा से जुड़ते हो, उस उम्र में मेरे पास मीडियम नहीं था.

आपके पास नाटक था, जो आप गांव में छठ पूजा के अगले दिन किया करते थे?

एक प्ले बस...सालभर में सिर्फ एक प्ले.

पटना में जब पढ़ाई के लिए आए तब भी थियेटर से ही जुड़े. बाद में एनएसडी गए. मतलब शुद्ध रूप से आपकी पृष्ठभूमि थियेटर है?

हां. केवल थियेटर.

(पंकज त्रिपाठी का जन्म बिहार के बेलसंड गांव में हुआ. बचपन में वे छठ पूजा के अगले दिन होने वाली नौटंकी में भाग लिया करते थे और वहीं अभिनय से पहली मुलाकात हुई. फिर पिताजी की ख्वाहिशें जेब में सहेजे डॉक्टर बनने पटना आ गए लेकिन वहां थियेटर के प्रेम में पड़ गए. इस इश्क ने कुछ साल बाद दिल्ली का रुख करवाया लेकिन एनएसडी ने दो बार रिजेक्ट कर दिया. तीसरी बार में सफलता हाथ लगी तो फूट-फूट के रोए. काफी बाद में पत्नी सहित मुंबई आए और 2004 में आई ‘रन’ से शुरू हुए संघर्ष ने 2012 में पहला फल दिया, जब अनुराग कश्यप की ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’रिलीज हुई और उनका सुल्तान कसाई वाला रोल बेहद चर्चित हुआ.)

आपको यह भी कतई नहीं पसंद कि कोई आपको साइड एक्टर या कैरेक्टर एक्टर बुलाए?

बहुत चिढ़ मचती है. एक्टर एक्टर होता है. सपोर्टिंग एक्टर काहे का! आपके घर में जो पिलर्स होते हैं, आप उनके लिए थोड़े बोलते हो कि ये मेन पिलर है ये सपोर्टिंग. एक पिलर कमजोर निकला तो इमारत गिर जाएगी.

सपोर्टिंग एक्टर को उतनी इज्जत भी नहीं मिलती, जो लीड एक्टर को मिलती...

(आवेश में, बहुत थोड़े-से) लीड एक्टर को तो बना-बनाया रोल दिया जाता है, जबकि हम घर से चावल-दाल लेकर आते हैं और सेट पर रोल को बनाते हैं!

आपके जो संघर्ष के दिन थे, पटना वाले और एनएसडी वाले, तब की कोई घटनाएं हैं जिनकी यादें आज भी पीछा नहीं छोड़तीं? जैसे नवाजुद्दीन सिद्दीकी की आत्मकथा में उन्होंने लिखा है कि मुंबई में संघर्ष के दिनों में वे एक लंबे अरसे तक सुबह, शाम और रात खाने में सिर्फ चाय और बिस्कुट लेने को मजबूर थे. तो आज स्थिति ये है कि इस सफल दौर में भी वे पारले-जी बिस्कुट का रैपर देखकर सिहर उठते हैं.

नहीं, जीवन में कभी मैं भूखा नहीं रहा हूं. स्ट्रगल वाले दिनों में भी, हमेशा मुझे जिस दिन जो खाने का मन हुआ है वो खाया है! विलासिता वाला जीवन नहीं था, किराए के घर में रहते थे और मुश्किल होता था कि किराया कैसे आएगा. लेकिन आ जाता था. मेरी पत्नी थीं संघर्ष के दिनों में मेरे साथ मुंबई में. वो पढ़ाती थीं और उन्हें 10 हजार रुपए मिलते थे महीने के. आराम से गुजारा होता था हमारा!

सच कहूं तो उस समय मैं आज से ज्यादा खुश था. बाइक थी और रोज शाम को मैं पत्नी को लेकर अक्सा बीच घूमने जाता था. भूजा भेलपुरी खाके मजा आ जाता था! एक बीयर में आनंद आ जाता था. अब तो सिंगल मॉल्ट भी उतना आनंद नहीं दे पाती.

तो ये संघर्ष, जिजीविषा बड़ा इंटरनल मसला है. एक अभिनेता का संघर्ष एक्सटर्नल जितना होता है न, सर्वाइवल का, खाने, सोने का, बिस्किट का, चाय का, उससे ज्यादा बड़ी उसकी लड़ाई इंटरनल होती है. वो लड़ाई जीत पाना मुश्किल है. एक्टिंग तो मैंने सीख ली है, लेकिन इस काम का सदुपयोग कब होगा. आखिर इतनी भीड़ है. भेड़चाल में मेरी जगह बनेगी कि नहीं. वो ज्यादा कठिन है. सर्वाइवल तो हो जाता है...ईंट भी उठा लोगे मुंबई में तो 500 रुपए कमा लोगे.

आपकी पहले कही एक बात बहुत पसंद आती है,मैं वो सब्जी हूं, जो उगता है गांव में, लेकिन बिकता शहर में है.

इसका संदर्भ वही है कि मेरे किरदार सिनेमा से नहीं, गांव से आते हैं. 10 साल तक मैं लिटरली खेतों में काम किया आदमी हूं. मैंने पिता को देखा है खेतों में पसीना बहाते हुए. आज भी पक्की सड़क नहीं है मेरे गांव में. ये सहानुभूति की बात नहीं है. चाहिए भी नहीं. ठीक जीवन चल रहा है. यहां से बेहतर लाइफ है वहां.

असल बात है कि रूट्स पता होने चाहिए. हम कहां से हैं. एक पत्ता पेड़ से पतझड़ में गिर जाए और उड़ के हिंद महासागर के पार भी चला जाए, उस पत्ते को अहसास होना चाहिए कि मैं किस पेड़ से गिरा हूं. ऐसा होने से जीवन में परेशानियां कम हो जाती हैं. आज लोग मॉल में, एयरपोर्ट में साथ में सेल्फी खिंचाते हैं, लेकिन मुझे पता है कि दो साल पहले नहीं खिंचाते थे. शायद दो साल बाद भी नहीं खिचाएंगे. अगर आपको पता होता है कि मैं वो सब्जी हूं जो गांव में उगा हूं लेकिन बिक यहां रहा हूं तो सफलता में आपको घमंड नहीं होगा और असफलता में परेशानी नहीं होगी. यही उस कोट के पीछे का संदर्भ है. बस सुखी बने रहिए. सब मिथ्या है. कुछ टिकने वाला नहीं है. न सफलता, न असफलता. (और ऐसा कहते ही पकंज त्रिपाठी वह भाव चेहरे पे ले आते हैं जो उनका सबसे प्यारा एक्सप्रेशन है – आंखें मूंदकर सर थोड़ा टेढ़ा करना और हाथ खोलकर मुस्कुरा देना. अहा!)

वर्तमान समय के किन अभिनेताओं का कमाल काम देखकर उनसे ईर्ष्या होती है?

किसी अभिनेता का अभिनय देखकर ईर्ष्या नहीं होती. मैं काम पकड़ लेता हूं. एक बढ़ई जब किसी दूसरे बढ़ई की बनी हुई शानदार कुर्सी देखता है, तो वो ईर्ष्या नहीं करता, काम पकड़ लेता है. कि उसने कौन सी कटिंग लगाई है. क्या दिमाग लगाया है. मुझे नवाजुद्दीन अच्छे लगते हैं, इरफान और पंकज कपूर अच्छे लगते हैं. तो मैं उनकी परफॉर्मेंस को देखते वक्त असल में उनका क्राफ्ट देख रहा होता हूं, कि कौन-सा सुर लगाया है.

हां, तब ईर्ष्या जरूर होती है जब आप जो डिजर्व करते हैं वो आपको नहीं मिले. जिस किस्म के किरदार मैं डिजर्व करता हूं वो न मिलें तो गुस्सा भी आता है, *** लगते हैं इंडस्ट्री के लोग कि प्रतिभा का कोई मूल्य नहीं है क्या. लेकिन फिर ध्यान आता है कि अरे हां, स्टारडम पूजक समाज है हमारा! क्रिकेट में भी स्टार चाहिए, राजनीति में भी चाहिए और फिल्मों में तो फिर चाहिए ही चाहिए.

किस मिजाज का अभिनेता खुद को मानते हैं. मैथड एक्टर, नैचुरल एक्टर....?

नहीं नहीं, मैथड़ एक्टिंग से मेरा कोई लेना-देना नहीं. कभी-कभी सेट पर जाते हुए भी सोच रहा होता हूं कि मैं करुंगा क्या, और ये सच बात है. रात भर जगने का सीन हो तो मैं बिलकुल नहीं जगता हूं रात भर. शूटिंग से पहले आठ घंटे की नींद चाहिए मुझे और पेट एकदम साफ होना चाहिए. कब्जियत हो तो मैं अभिनय नहीं कर सकता!

आखिरी सवाल. जो एक ऑब्जर्वेशन ज्यादा है. मर्द के अंदर की जो मुलायमियत होती है, उसके अंदर का सॉफ्ट, मुलायम स्वभाव, उसे परदे पर आजकल आप ही सबसे उम्दा तरीके से अभिव्यक्त कर रहे हैं. जैसे एक जमाने में अमोल पालेकर किया करते थे.

अगर ये आपने नोटिस किया है तो आप बधाई के पात्र हैं. मैं तो मानता हूं कि मैं अंदर से एक स्त्री ही हूं. लेकिन हम बहुत सारी दुनियावी वजहों से उस स्त्री को मारे रहते हैं, दबाए रहते हैं. मैं उस स्त्री को उभरने देता हूं. इसीलिए हर किरदार में ह्यूमेनिटी ढूंढ़ता हूं. कसाई है, ब्रूटल है, गैंगस्टर है, माफिया है...अरे यार ये आदमी भी है. औरत भी है इसके अंदर. और फिर वहीं से, मैं वो सुर खोजकर ला देता हूं जो किरदार को बनाता है.