पूर्वोत्तर के तीन राज्यों में जीत के बाद भाजपा के हौसले काफी बुलंद थे. गोरखपुर और फूलपुर की हार ने इन्हें थोड़ा सा नर्म किया. अब कर्नाटक की बारी है. यहां की राजनीति पर नज़र रखने वालों की मानें तो सिर्फ रणनीति के दम पर ही हर खेल नहीं जीता जा सकता, खासकर तब जब आपके राजा में ही खोट हो.

‘येदियुरप्पा जेल जाकर आए हैं, उन्हें तो मैं वोट नहीं दूंगा,’ बेंगलुरु में टैक्सी चलाने वाले ईश्वर अपने वोट के सवाल पर साफ कहते हैं. ईश्वर के इस जवाब का समर्थन एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स और दक्ष द्वारा सम्मिलित रूप से कराए गए कर्नाटक वोटर्स सर्वे के नतीजे भी करते हैं. सर्वे के मुताबिक 86 प्रतिशत लोगों ने माना कि वे प्रत्याशी के नाम पर मतदान करेंगे. यानी पार्टी बाद में प्रत्याशी पहले. हालांकि 67 फीसदी लोगों ने प्रत्याशी की पार्टी को भी महत्वपूर्ण माना है. उधर, स्थानीय उम्मीदवार की जीत में मुख्यमंत्री के चेहरे के तौर पर आगे किए गए व्यक्ति की भूमिका को भी 42 फीसदी लोगों ने स्वीकार किया.

ऐसे में येदियुरप्पा इस महत्वपूर्ण दक्षिणी राज्य में बीजेपी की जीत सुनिश्चित कर पाएंगे, कहना मुश्किल है. पार्टी 2014 के बाद से ही कर्नाटक में भ्रष्टाचार को मुख्य मुद्दे के तौर पर इस्तेमाल करती आई है. लेकिन राज्य में अपना कोई स्वतंत्र आधार न होने की वजह से अगले विधान सभा चुनाव में भाजपा के पास उन येदियुरप्पा पर निर्भर होने के अलावा कोई और चारा नहीं है, जिनकी छवि भ्रष्टाचार मुक्त नहीं है. सूबे के वर्तमान मुख्यमंत्री सिद्धारनैया ने कुछ समय पहले भाजपा के इस रुख पर चुटकी ली थी. उन्होंने एक ट्वीट कर कहा था कि वे खुश हैं कि प्रधानमंत्री मोदी भ्रष्टाचार के बारे में बात कर रहे हैं, पर उन्हें अपनी कथनी और करनी एक जैसी रखते हुए अपने मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर एक साफ-सुथरे चेहरे को सामने लाना चाहिए.

कर्नाटक में भाजपा द्वारा येदियुरप्पा पर एक बार फिर दांव लगाने का सबसे बड़ा कारण उनका परंपरागत लिंगायत वोटर है. लेकिन मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के एक मास्टरस्ट्रोक ने भाजपा को इस मोर्चे पर भी बड़ा झटका दे दिया है. लिंगायत समुदाय को एक अलग धार्मिक और अल्पसंख्यक वर्ग का दर्ज़ा देने की कांग्रेस मुख्यमंत्री की कवायद इस समय कर्नाटक की राजनीति का बहुत बड़ा मुद्दा बनी हुई है. कांग्रेस इससे कदम से कितना लाभ ले पाएगी, यह तो वक्त बताएगा, लेकिन फिलहाल यह साफ है कि उसने भाजपा के इस किले में सेंध लगा दी है.

कर्नाटक विश्वविद्यालय के सामाजिक विज्ञान विभाग के अध्यक्ष हरीश रामास्वामी इस बाबत कहते हैं, ‘लिंगायतों को खास दर्ज़ा देने का कांग्रेस का यह कदम उसे स्मॉल पॉकेट्स में थोड़ा बहुत नुकसान भी पहुंचाएगा. अब यह कांग्रेस पर निर्भर करता है कि वो इसे अपने वोटर्स के लिए कैसे पेश करते हैं. ज़मीन पर वोटर इस समय थोड़ा भ्रमित है कि इसे कैसे देखा जाय.’

भाजपा की रणनीति के बारे में वे कहते हैं, ‘ये या तो भ्रष्टाचार की बात कर रहे हैं या फिर अपने हिंदुत्व कार्ड पर भरोसा करके बैठे हैं. पानी की कमी, इन्फ्रास्ट्रक्चर और रोजगार जैसे मुद्दे बीजेपी की रणनीति से गायब हैं. इसलिए वोटर उनसे बहुत उम्मीद नहीं रख सकता. और फिर केंद्र सरकार का अपने तमाम वादों को पूरा न कर पाना भी उसके खिलाफ जा सकता है. इसके उलट कांग्रेस अपनी अन्न भाग्य, क्षीर भाग्य, साइकिल भाग्य और इंदिरा कैंटीन जैसी योजनाओं और अन्य सफलता की कहानियों का पूरा फायदा उठाने की कोशिश करेगी.’

लेकिन क्या कांग्रेस को सत्ता विरोध लहर यानी एंटी-इनकंबेंसी का नुकसान नहीं होगा? ‘ये फैक्टर इस बार उतना प्रभावी नहीं लग रहा है. मुख्यमंत्री के निर्वाचन क्षेत्र ओल्ड मैसूर, तटीय क्षेत्रों और बेंगलौर के कुछ हिस्सों में इसका हलका असर देखने को मिल सकता है, पर इससे कांग्रेस को बहुत ज़्यादा नुकसान होने की संभावना कम ही दिखती है’ प्रोफेसर रामास्वामी कहते हैं.

आने वाले चुनावों में मोदी लहर के असर के सवाल पर कर्नाटक के धारवाड़ में रह रहे पद्म श्री गणेश देवी कहते हैं, ‘कर्नाटक भारत का हिस्सा है, लेकिन ये पूरी तरह बाकी भारत जैसा नहीं है. अपनी दार्शनिक परंपराओं के चलते इसे अपने कर्नाटक होने का पूरा ज्ञान है. यहां उत्तर से आने वाला चाहे हिंदी में बोले या अंग्रेज़ी में, उसके वादों और भाषणों का वैसा प्रभाव नहीं होगा जैसा मध्य प्रदेश या गुजरात में हो सकता है. यहां के वोटरों के दिल पर असर करने के लिए मोदी और राहुल को कन्नड़ में बात करनी होगी.’ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कन्नड़ में किए गए हालिया ट्वीट्स को देखकर लगता है कि गणेश देवी की इस बात को वे भी अच्छे से समझते हैं.

डॉक्टर देवी कहते हैं, ‘दिल्ली से आने वाले वादे, चाहे नरेंद्र मोदी से आएं या राहुल गांधी से, कर्नाटक में उनका असर सीमित रहता है. जहां तक चुनावों की बात है, दक्षिण के राज्य अपने हिसाब से वोट करते हैं. और फिर कर्नाटक के लोग किसी लहर में बहने वाले लोग नहीं हैं. इनकी निगाहें दिल्ली से ज़्यादा अपनी ज़मीन की तरफ रहती हैं.’

इसके अलावा माना जा रहा है कि कर्नाटक में भी भाजपा का प्रभाव शहरी इलाकों तक ही सीमित रहेगा और ग्रामीण मतदाता को लुभाने के लिए उसे काफी मेहनत की ज़रूरत होगी. प्रोफेसर रामास्वामी की मानें तो जेडी (एस) कांग्रेस के दलित वोट का कुछ हिस्सा तोड़ने में सफल हो सकती है, लेकिन उत्तरी कर्नाटक परंपरागत रूप से कांग्रेस को वोट देगा, जबकि मेंगलौर क्षेत्र में भाजपा का वर्चस्व बना रहेगा.