हाल ही में हरियाणा में 12 साल या उससे छोटी उम्र की बच्चियों से बलात्कार करने वाले को मौत की सजा देने का कानून बना है. छोटी बच्चियों के साथ बलात्कार की सजा मौत घोषित करने वाला हरियाणा तीसरा राज्य बन गया है. इससे पहले मध्य प्रदेश और राजस्थान भी ऐसे कानून बना चुके हैं.

हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर का कहना है यह कानून बच्चियों की सुरक्षा में मील का पत्थर साबित होगा. लेकिन आंकड़ों के हिसाब से बात करें तो पता चलता है कि तमाम तरह के कानून बनने के बाद भी भारत में बच्चियों के साथ बलात्कार की घटनाएं लगातार बढ़ती ही जा रही हैं. नेशनल क्राइम रिकाॅर्ड ब्यूरो के अनुसार 2015 में बच्चियों से बलात्कार के जहां लगभग 11 हजार केस दर्ज हुए थे वहीं 2016 में यह आंकड़ा 82 प्रतिशत बढ़कर लगभग 20 हजार हो गया था.

बच्चियों के साथ बलात्कार के दोषियों को मौत की सजा देने पर समाज में दो तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आती हैं. कुछ लोगों का कहना है कि ऐसे कानून के बाद इस बात की संभावना काफी बढ़ जाएगी कि बलात्कारी बच्ची की हत्या ही कर दे. जबकि कुछ अन्य का मानना है कि बच्चियों के साथ ऐसा जघन्य अपराध करने वाले को ऐसी ही कठोर सजा दी जानी चाहिए. बलात्कार की सजा मौत हो या नहीं, इससे जुड़े तीन मुख्य सवाल हैं - एक बलात्कारी को मौत की सजा के पीछे की असली वजह क्या है? दूसरा, यह सजा कितनी व्यावहारिक है? तीसरा, बलात्कार के केस में क्या बलात्कारी ही एकमात्र अपराधी होता है?

बच्चियों के बलात्कारी को मौत की सजा देने की मांग करने वाले ऊपर से यह स्थापित करने की कोशिश करते हैं,कि वे लोग बच्चियों के प्रति हद दर्जे के संवेदनशील हैं और उनकी सुरक्षा के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं. पर असल में यह बेटियों की जिंदगी के प्रति समाज और सरकारों का सबसे बड़ा ढ़ोंग है. ऐसा कहने के पीछे ठोस कारण है. बच्चियों की जिदंगी बलात्कार की बजाय भ्रूण हत्या और बालिका वध से खतरे में होती है. भ्रूण हत्या और बालिका वध तो सीधे-सीधे बच्चियों के जीवन का खात्मा है, जबकि बलात्कार के बाद तो जीवन की कोई भी संभावना खत्म ही नहीं होती!

लेकिन इन संवेदनशील लोगों और सरकारों ने आज तक भ्रूण हत्या और बालिका हत्या करने वालों के लिए मौत की सजा की मांग कभी नहीं की. क्यों? सवाल यह भी है कि क्या सच में बलात्कार (जिसमें शरीर के किसी अन्य हिस्से के साथ कोई क्रूरता नहीं की गई है), शरीर के किसी अंग के हमेशा के लिये कट जाने, टूट जाने, अक्षम हो जाने या चेहरे को एसिड से जलाए जाने से ज्यादा बुरा और टीस पैदा करने वाला है? कतई नहीं. असल में हमारी यौन शुचिता की सोच है जो बलात्कार को बाकी दुर्घटनाओं से ज्यादा बुरा ठहराती है. यही कारण है कि इसके लिए मृत्युदंड की सजा निर्धारित की जा रही है, या ऐसी मांगें जब-तब उठती रहती हैं. बलात्कार के लिए मौत की सजा की मांग इस सोच को और भी पुख्ता करती है कि समाज में लड़कियों की यौन शुचिता उनकी जिंदगी से कहीं बड़ी है.

यदि बलात्कारी के लिए मौत की सजा तय कर भी दी जाती है तो भी यह सजा किसी भी दृष्टि से बहुत व्यावहारिक नहीं लगती. ऐसा कहने के पीछे मुख्यतः दो ठोस कारण हैं. एक तो दर्ज हुए मामलों में बहुत कम में ही अपराध साबित होे पाते हैं. इस कारण अपराधियों का सजा के उस स्तर तक पहुंचने का प्रतिशत न के बराबर ही होगा. दूसरा, एनसीआरबी का कहना है कि बलात्कार के लगभग 95 फीसदी मामलों में बलात्कारी परिचित, रिश्तेदार या परिवार के ही सदस्य ही होते हैं. जिन मामलों में परिचित और रिश्तेदार शामिल होंगे, क्या उनमें भी पीड़िता के घर वाले बलात्कारी को मौत की सजा दिलवाने के ईमानदार प्रयास करेंगे?

इस बात की संभावना न के बराबर ही है. क्योंकि घर के भीतर होने वाले बलात्कार या यौन हिंसा के ज्यादातर मामलों की तो रिपोर्ट तक ही इसलिये दर्ज नहीं होती क्योंकि उनमें करीबी लोग शामिल होते हैं. जहां परिवारों में परिचित अपराधियों को न्यूनतम सजा दिलवाने का ही साहस नहीं, वहां उनके लिये मौत की सजा की मांग का सच समझा जा सकता है.

बलात्कार के किसी भी केस में सिर्फ बलात्कारी ही एकमात्र दोषी नहीं होता, बल्कि समाज की दो इकाईयां अपराधी होेेती हैं. इनमें प्रत्यक्ष अपराधी बलात्कारी और अप्रत्यक्ष अपराधी समाज है. बल्कि समाज लंबे समय तक बलात्कार पीड़िता के प्रति कई किस्म के अपराध करने का दोषी है. इस बात को कई उदाहरणों से समझा जा सकता है. कैसा भी एक्सीडेंट होने पर पीड़ित व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक देखभाल में पूरा परिवार जुट जाता है और समाज के लोग भी यथासंभव अपनी सहानुभूति और सहयोग देते हैं. लेकिन बलात्कार के केस में ठीक इसके उल्टा होता है.

इस यौन दुर्घटना के बाद परिवार, रिश्तेदार, आस-पड़ोस और सार्वजनिक संस्थाएं (स्कूल, काॅलेज, आॅफिस आदि) पीड़िता के साथ कुछ अछूत का सा व्यवहार करने लगती हैं. या तो पीड़िता को ही दोषी की तरह देखा जाता है या फिर उसे जब-तब यह अहसास दिलाया जाता है कि उसके साथ कुछ बहुत गलत हो गया और अब वह सामान्य जीवन नहीं जी सकती. जाहिर है समाज और सार्वजनिक संस्थाओं से मिला यह व्यवहार पीड़िता को ज्यादा लंबे समय तक पीड़ा में रखता है.

दूसरा, किसी भी बलात्कारी को इतनी आत्मग्लानि कभी नहीं होती कि वह आत्महत्या करने की सोचे भी. लेकिन पीड़िता अक्सर ही बिना किसी गलती के लंबे समय तक इस तरह की मनोदशा में रहती है. जाहिर है, दोषी और पीड़ित की ऐसी विरोधी मनोस्थिति के लिए समाज की सोच और व्यवहार ही जिम्मेदार है. तीसरा, इस पूरे घटनाक्रम में समाज असली दोषी को कभी भी बेइज्जत महसूस नहीं कराता, लेकिन पीड़िता को अक्सर ही अपने लिए ‘इज्जत लुट गई’ सुनते रहना पड़ता है.

साफ है कि बलात्कार के केस में बलात्कारी के साथ-साथ समाज भी कम दोषी नहीं है. लेकिन हमारे यहां सिर्फ प्रत्यक्ष अपराधी को कठोरतम सजा देने की बात ही चलती है. जबकि अप्रत्यक्ष अपराधी को हमेशा ही चर्चा और बहस से दूर रखा जाता है. इस प्रक्रिया में सभी का सारा ध्यान सिर्फ बलात्कारी को मौत की सजा दिलवाने में ही उलझ जाता है. परिवार, रिशतेदार और अन्य सभी सामाजिक संस्थाएं बलात्कार की पीड़िता के प्रति अपनी बेहद जरूरी बुनियादी जिम्मेदारियों को निबाहने के कर्तव्य से साफ बच जाती हैं. ऐसा करके समाज अपने दोषों को पूरी तरह से ढकने की घिनौनी कोशिश करता है. ऐसे में एक दोषी को मृत्युदंड और दूसरे को पूरी तरह बरी रखना न्याय की परिभाषा को पूरा नहीं करता.

यौन हिंसा के ज्यादातर अपराधियों का पीड़िता का जानकार होना इस बात का सबूत है कि समाज में संवेदनशीलता खतरनाक तरीके से घट रही है. समाजशास्त्रियों का मानना है कि मौत की सजा जैसे कड़े कानून भी बच्चियों से बलात्कार या कैसी भी यौन हिंसा की घटनाओं को रोकना तो क्या, कम करने में भी अक्षम हैं. सिर्फ संवेदनशीलता बढ़ाकर और यौन कुंठा का जन्म देने वाले कारणों पर सख्ती से काम करके ही बच्चियों के प्रति यौन अपराधों को कम किया जा सकता है.