हम कहते जरूर हैं कि ‘आंखें हैं तो जहान है, वरना दुनिया वीरान है’. लेकिन रुटीन में शायद ही कोई आंखों की जांच करवाता हो. हम तो तभी जाते हैं जब आखें दर्द करें, लाल हों या नजर एकदम ही जवाब देने लग जाए. बहुत सारे भ्रम हैं नजर को लेकर. इस बार हम दो शिक्षाप्रद कथाओं से आपके कुछ ऐसे ही भ्रम दूर करने की कोशिश करेंगे.

पहली कथा -

लड़के की आंखें बचपन से ही भेंगी थीं. स्थानीय डॉक्टर ने कभी स्क्विंट विशेषज्ञ को दिखाने को कहा भी था, लेकिन दिखाया नहीं. ऐसे ही बड़ा होता गया लड़का. ‘तिरछी नजर’ के साथ, ‘तिरपट’ कहलाते जब वो जवान हुआ तो पिता चेता. शादी की मार्केट में भेंगा लड़का लेकर उतरे तो लड़के को उतना दहेज भी नहीं मिलना जो बिरादरी के नालायक दूल्हे तक खींच ले जाते हैं.

पिता ने तय किया कि भेंगापन ठीक करा लें. विशेषज्ञ ने जांचकर बताया कि भेंगापन ठीक करके तिरछी आंखें तो ठीक कर दूंगा पर ये इलाज बचपन में ही करा लेना चाहिए था क्योंकि सालों तक भेंगापन बने रहने से इसकी एक आंख की नजर बेहद कमजोर हो चुकी है, जो ठीक नहीं की जा सकती.

ऐसा क्यों? पूछा गया तो जो विशेषज्ञ ने बताया वह सबके लिए जानना जरूरी है. दरअसल स्वस्थ आंखों से कोई भी वस्तु देखने पर उस वस्तु की एक-एक तस्वीर दोनों आखों में परदे (रेटिना) पर एक ही कोण से बनती है और यह सूचना दिमाग में चली जाती है. एक ही कोण पर बनी दो तस्वीरें सुपरइंपोज़ होकर हम दिमाग द्वारा वह देखते हैं जिसे विज्ञान की भाषा में ‘बाइनोकुलर विज़न’ कहते हैं – एक ही चीज को, दो आंखों द्वारा, एक ही देखना.

भेंगापन हो तो दोनों आंखें दो अलग-अलग कोणों से एक ही चीज को देखती हैं. तब दोनों आंखों के रेटिना पर दो अलग-अलग कोणों से तस्वीरें बनती हैं. ऐसे में दिमाग दोनों को मिलाकर एक नहीं कर पाता. दिमाग में एक ही चीज की दो तस्वीरें बनती हैं जो देखने वाले को भ्रमित करती हैं. इससे बचने के लिए दिमाग तिरछी आंख को तस्वीर बनाने से ही रोकने की कोशिश करता है. धीरे-धीरे पैदायशी भेंगे व्यक्ति में कुछ सालों के बाद उस आंख की तस्वीर बनाने की शक्ति (न्यूरो सेंसिविटी) खत्म हो जाती है. तब वह आंख बेहद धुंधली तस्वीर ही बनाती है ताकि दूसरी आंख की बनी तस्वीर से काम चले.

तो इस कथा से यह शिक्षा मिलती है कि अगर भेंगापन बचपन से है तो कम उम्र में ही इलाज करा लें वरना एक आंख की नजर खराब हो सकती है. बड़ा होने पर भी आंख के तिरछेपन का तो इलाज हो जाएगा पर गई नजर वापस नहीं मिलेगी. भेंगेपन का इलाज किसी भेंगापन विशेषज्ञता वाले नेत्र विशेषज्ञ से ही कराएं. यह इलाज ऑपरेशन से भी होता है, और दवाइयों से भी. इलाज केस के ऊपर निर्भर करता है.

दूसरी कथा –

पचास वर्षीय एक अधेड़ व्यक्ति को कभी सात-आठ साल पहले किसी नेत्र विशेषज्ञ ने मामूली-सी किसी तकलीफ के लिए जांच करके बताया था कि आपकी आंख का प्रेशर तनिक ज्यादा लगाता है. दवाइयां डालें और दिखाते रहें. अब हुआ ये कि डॉक्टर ने ठीक से समझाया नहीं या इन्होंने ही ठीक से समझा नहीं. आंखों में न दर्द, न लालिमा. बढ़िया दिखता भी था. सो दोबारा उसके पास गए ही नहीं. भूल ही गए इस बात को. अब छह-सात महीने से लग रहा है कि ठीक से दिखता नहीं. चश्मे की दुकान पर जाकर कोई नंबर भी ले आए परंतु पाया कि चश्मे से भी नजर ठीक नहीं हुई.

नेत्र विशेषज्ञ को दिखाया तो उसने पुतली फैलाकर ऑप्थेल्मोस्कोप से जांच की. बताया कि ग्लॉकोमा नाम की बीमारी है जिसमें आंख का प्रेशर बढ़ा रहता है, जिसको नियमित दवाएं डालकर कंट्रोल में न रखो तो आंख के परदे (रेटिना) की नसें और आंख की मुख्य नस (ऑप्टिक नर्व/मेक्युला) ही सूख जाती हैं... तो क्या अब यह नजर ठीक न होगी?... जी हां, अब यह नजर ठीक न होगी. हां, लेकिन अभी-भी नियमित दवा डालोगे तो पूरा अंधा होने से बच जाओगे... तो दस साल पहले जो डॉक्टर ने बताया था, दवाएं तभी से नियमित डालने से नजर बच गई होती?... हां, दवाएं डाली होतीं तो ऐसा न होता. हुआ यह कि आंखों में लगातार दबाव बढ़ा रहा. परंतु न तो आंखों में दर्द था, न कोई दूसरी कोई तकलीफ तो उन्होंने दवाएं लेना जरूरी नहीं समझा. और फिर अंत में चेते. लेकिन अब चेतने का कोई मतलब नहीं बचा क्योंकि अब चिड़िया चुग गई खेत.

तो इस कथा की शिक्षा क्या है?
शिक्षाएं कई हैं.
1. ग्लॉकोमा जैसी आंख की कुछ बीमारियां नियमित जांच से ही पकड़ी जाएंगी इसलिए 35 साल की ऊपर की उम्र हो जाने पर नियमित नेत्र जांच करवाएं. परिवार में किसी रक्त-संबंधी को ग्लॉकोमा रहा हो तब तो और भी कम उम्र से जांच कराएं.
2. अगर किसी विशेषज्ञ ने आपको ग्लॉकोमा बताया है तो आंख में जीवनभर दवाइयां डालनी होंगी. दुर्भाग्य की बात है कि अस्सी प्रतिशत मरीज दवाइयां ठीक से नहीं डालते, या कभी-कभी ही, या बंद ही कर देते हैं. यह अंधत्व को खुला निमंत्रण है.
3. नेत्र विशेषज्ञ अगर कोई छोटा या बड़ा ऑपरेशन बताएं जिससे आंख का प्रेशर कंट्रोल होगा तो करा लें. ये जरूरी होते हैं और आसानी से हो भी जाते हैं.
4. तीस प्रतिशत भारतीयों की आंख का कोण ‘नैरो एंगल’ होता है जो भविष्य में ग्लॉकोमा होने की निशानी है. इसको ठीक करने के लिए पांच मिनट में आउटडोर में ही छोटा-सा ऑपरेशन (आइरिक्टमी) किया जाता है जो करा ही लिया जाना चाहिए.

कुल मिलाकर कहना यह है कि दूसरों पर नजर रखने के अलावा अपनी नजर पर भी नजर रखे रहे तो नजर इस काबिल बनी रहेगी कि दूसरों पर भी रखी जा सके.