इस संग्रह की कविता ‘नन्ही चप्पल’ का एक अंश :

‘नमक के खेतों के पार / भायन्दर के यार्ड की थी / रुपहली रात / खाड़ी से लहराती आती हवाओं का उल्लास / झांक झांक लोकल के डिब्बों में / देख रहा था चांद / दिनभर खटती रही / आयी बारह बीस पर यार्ड में / सुबह निकलना होगा उसे चार पचास में / ज्यों ही करने चली आराम, थकान के बाद की / गाढ़ी नींद का ज्यों ही आया स्वाद, दिख गयी / एक पांव की नन्ही सी चप्पल / महिला डब्बे में / आंखों में नाच गया / पांच साल की बच्ची का चेहरा, आज ही खरीदा था / मम्मी पापा ने जाकर, चली भी थी डिब्बे में तीन-चार क़दम / बजता था चों चों हंसती थी ताली पीट / लगा अब ज़रूर होगी उदास, क्या पता रो रही हो अब तक / और उचट गयी आंखों से नींद / झांक झांक देखता रहा चांद / झांक झांक देखती रही हवा / एक पांव की नन्ही चप्पल / लिए गोद में, अभी अभी सोयी है लोकल’


कविता संग्रह : मुम्बई की लोकल

लेखक : निलय उपाध्याय

प्रकाशक : वाणी

कीमत : 150 रुपये


यह बारंबार कही-सुनी गई बात है, फिर भी इसे दोहराय बिना यहां बात आगे नहीं बढ़ेगी कि मुम्बई की लोकल वहां की ‘लाइफ लाइन’ है. वहां की इस जीवन रेखा का जिक्र समाचार चैनलों की किसी न किसी खबर में अक्सर ही देखने-सुनने को मिलता रहता है. मुम्बई की लोकल ट्रेन यातायात का साधनभर नहीं है और यह मानना कुछ ज्यादा नहीं है कि मुम्बई की लोकल असंख्य लोगों के सपनों को पूरा करने का एक हसीन जरिया है. निलय उपाध्याय का यह पूरा कविता संग्रह सिर्फ मुम्बई की लोकल ट्रेन को समर्पित है, जो बिना लोकल में बैठे भी पाठकों को उसकी यात्रा का बेहद जीवंत अनुभव कराने में सफल होता है.

यूं तो यातायात के सभी साधन हर किसी को उसकी मंजिल के करीब ले जाने का माध्यम बनते हैं. लेकिन जैसा गहरा रिश्ता मुम्बईवासियों का वहां की लोकल ट्रेन से है, वे शायद ही यातायात के दूसरे साधनों से वैसी करीबी महसूस करते हों. लोकल ट्रेन और मुम्बईवासी, दोनों एक-दूसरे के अनकहे भावों को समझते हैं. ऐसे ही भावों की एक कविता है ‘जाना कहां है’, इसी कविता की कुछ पंक्तियां -

‘रुकी भी नहीं कि / डैनों की तरह हाथ फैलाए / किसी ने दरवाज़ा पकड़ा / किसी ने दरवाज़े के बीच का खम्भा / किसी ने खिड़की का सरिया ...तब भी नहीं रुकी तो / आंधी के झोंके की तरह / उछल उछल सवार होने लगे / सीट की मची लूट / सांस भी सीधा नहीं कर पायी / और डिब्बों में इस तरह शुरू हुई / धम धम / कि मारे भय के / घबराकर रुक गयी लोकल / धीरज / बहुत कम है मुम्बई में / बेताबी बेसब्री से बहुत अधिक, / होड़ स्वभाव है इसका / वे भी / बहुत तेज़ चलते हैं यहां / जिन्हें नहीं मालूम / जाना कहां है.’

मुम्बई की भीड़ का लोकल में चढ़ने का अपना एक अलग अंदाज है. ये तूफान का एक ऐसा झोंका है जो हरहरा के उठता है और पलक झपकते ही शांत हो जाता है. लोग ऐसे चढ़ते हैं लोकल में मानों फौज ने सेनापति के आक्रमण करने का संकेत पाकर दुश्मन पर चढ़ाई कर दी हो. निलय ने ट्रेन पर टूट पड़ी भीड़ और भीड़ के इस प्रहार से सहम गई लोकल का बड़ा ही जीवंत वर्णन किया है -

जैसे किसी टीन के छप्पर को / पंखों से पीट रहें हों बारिश के मेघ / जैसे किसी अदृश्य सेनापति ने / चीख कर कहा हो - / आक्रमण / जैसे अकाल के मारे और महीनों के भूखे लोग एक साथ / टूट पड़े हों / राहत सामग्री पर / किसी भी भगदड़ से भारी / किसी भी गति से तेज़ / बारह डिब्बों के छत्तीस दरवाज़ों पर / टिड्डी दल की तरह आक्रामक / टूट पड़े हैं लोग / धम धम धांय / पद प्रहारों से थर थर / कांप रही है / लोहे के बारह डिब्बों की देह.’

निलय की कविताओं में लोहे से बनी निर्जीव लोकल ट्रेन इंसानी जज्बातों को महसूस करती दिखती है, तो सजीव इंसान कई जगह मशीन जैसा व्यवहार करते हुए मिलते हैं. यह कुछ-कुछ कबीर की उलटबासियों जैसा है. कवि की बिलकुल नई उपमाएं इन कविताओं को और भी ज्यादा जानदार बना देती हैं. एक उदाहरण -

‘देखते देखते / इस तरह खाली हो गया / प्लेटफ़ार्म / जैसे कोई था ही नहीं / बोरे में / अनाज के दानों की तरह / डिब्बे में ख़ुद ही कस गये लोग / सबके चेहरे पर है / जगह मिलने का सन्तोष / जिन्हें जगह नहीं मिली / मधुमक्खी के छत्ते की तरह / टंग गये हैं / दरवाज़ों पर / कुछ डिब्बों के जोड़ पर खड़े है / कुछ छत पर बैठे हैं और बिजली के / नंगे तार के ख़तरे से बेख़बर / ले रहे हैं राहत की सांस / विरार से चर्च गेट के बीच / हर स्टेशन पर / हर सुबह हर शाम होती है यह जंग / कई बार छूट जाता है जीवन / नहीं छूटती लोकल.’

मुम्बई की लोकल ट्रेन में सफर करते हुए बहुत से लोग अपने जीवन का अंतिम सफर भी इसी में खत्म कर देते हैं. इसीलिए लोकल में कभी-कभी इंसानों के साथ शव भी सफर करते हुए मिल जाते हैं. कई बार दूसरे राज्यों से आजीविका कमाने आए परदेसी अपने परिचित के शव को सिर्फ इसलिए लोकल ट्रेन में छोड़कर चले जाते हैं, क्योंकि उनके पास शव के दाह संस्कार तक के पैसे नहीं होते! फिर ऐसे शवों का अंतिम संस्कार लोकल से जुड़ी अथॉरिटी कर देती हैं. ऐसे ही एक शव के साथ जुड़े किस्से की बेहद मार्मिक कविता में कवि लिखता है -

‘यही कहते थे घटना के सारे गवाह / दोनों भाई करते थे नौकरी / सिक्यूरिटी कम्पनी में / ड्यूटी थी बारह घण्टे की / कम था वेतन / छोटे को हुआ बुखार / लगा कि ठीक हो जायेगा यूंही / नहीं हुआ तो बड़े ने दुकान से लाकर दी टिकिया / बेअसर हुई तो दिखाया बड़े डॉक्टर से / हुई ख़ून की जांच / खर्च हो गयी दोनों की तनख़्वाह / और मर गया उसी रात / शव को गांव ले जाने की बात दूर थी / नहीं मिले पैसे कि कर सके शवदाह और लाकर / छोड़ गया / उसे मालूम था कि विधान के साथ करती है लोकल / अपने मृतकों का अन्तिम संस्कार.’

संभवतः यह पहला ही कविता संग्रह है जो सिर्फ और सिर्फ मुम्बई की लोकल ट्रेन पर लिखा गया है. निलय उपाध्याय मुम्बई की लोकल ट्रेन के प्रति अपने आभार को व्यक्त करने का जरिया अपनी कविताओं को बनाते हैं. असल में लोकल के प्रति यह आभार उन सभी मुम्बईवासियों की तरफ से है जो उसमें सफर करते हैं. लेखक ने लोकल ट्रेन का मानवीयकरण करके उसकी संवेदनाओं को महसूस करने की बेहद सूक्ष्म कोशिश की है. लोकल में चढ़ने वाले भीड़ के रेले, उसकी घुटन, उसमें होने वाली मारामारी, पस्त कर देने वाली थकान, अनवरत चलते रहने की प्रतिबद्धता को कवि ने इतनी शिद्दत से बयान किया है कि पाठकों को भी मुम्बई की लोकल से प्यार और सहानुभूति हो जाएगी.

सभी कविताएं मुम्बई की लोकल का हर संभव नये कोण से चित्र खींचती हैं. हर एक चित्र दूसरे से बिलकुल जुदा है. ये सारे शब्द चित्र मिलकर मुम्बई की लोकल का बेहद खूबसूरत काव्यात्मक कोलाज बनाते हैं. जो मुम्बई की लोकल के प्रति अपना आभार जताना चाहते हैं, और जो उस लोकल के रोमांचक और चुनौतीपूर्ण सफर को महसूस करना चाहते हैं, उन सभी के लिए यह एक पठनीय कविता संग्रह है.