विदेश यात्रा पर लिखी मेरी पिछली दो किस्तें पढ़कर लोगों ने दो तरह की प्रतिक्रियाएं दीं. बल्कि तीन तरह की, कि आपने तो हमें विदेश यात्रा से एकदम डरा ही दिया डाक्टर साहब, मानों विदेश यात्रा पर न जाना हो, किसी युद्ध पर निकलना हो... कि हमें तो वहां बस एक-दो सप्ताह के लिये ही जाना है. उसके लिए ऐसी तैयारी?... कि यार वहां हमारे साथ ऐसा क्या हो जाने वाला है भैया कि उसके लिये इतनी प्लानिंग करके जाने की कह रहे हो?... हम अपना पूरा इंश्योरेंस करवा के तो जा रहे हैं. अपना तो सब कुछ पालिसी में कवर है. फिर किस बात का डर?

तो इस आखिरी किस्त में यह भी बता देते हैं कि विदेश यात्रा में अचानक ही क्या-क्या स्वास्थ्य समस्याएं आपका टूर प्रोग्राम बर्बाद कर सकती हैं. वैसे हम साथ ही यह भी बताने की कोशिश करेंगे कि अगर ऐसा हो ही जाए तो फिर आप वहां क्या करें.

विदेश प्रवास के दौरान आपको ये समस्याएं आ सकती हैं -

(1) पेट खराब होना :

विदेशी धरती पर पैर रखने के दो-तीन दिन में ही ज्यादातर यात्रियों का पेट थोड़ा-बहुत खराब हो ही जाता है. प्रायः उन्हें दस्त लग जाते हैं. विकसित देशों की यात्रा मैं तो ऐसा कम होता है परंतु विकासशील देशों की यात्रा में यह बड़ी आम-सी परेशानी है और ऐसा भी नहीं है कि हमसे वहां हमारे भोजन में कुछ गड़बड़ हो जाये, तभी हमें दस्त लगेंगे. नहीं, सारी सावधानियों के बावजूद हमें वहां दस्त लग सकते हैं. इसे हम ट्रैवलर्स डायरिया कहते हैं. लगभग 20% यात्रियों को तो इतने ज्यादा दस्त लग सकते हैं कि उन्हें फिर शेष टूर के दौरान बिस्तर से ही लग जाना पड़ सकता है. ऐसे में आपका पूरा टूर ही खराब हो जाता है. अतः यह बहुत आवश्यक है कि हम पेट खराब होने से बचें.

तो, कैसे बचें?

कुछ तो वहां अपने खान-पान में उचित एहतियात बरत के, और कुछ वे दवाइयां लेकर जिन्हें आप अपने मेडिकल किट में साथ लाये हैं.

एहतियात कौन से? और दवा कौन सी?

पहले एहतियात के बारे में.

वहां गर्म भोजन ही खाएं. फ्रिज के ठंडे भोजन को भी गर्म करके ही खाएं क्योंकि गर्म करने से बैक्टीरिया मर जाते है. स्ट्रीट फूड न खाएं. कच्ची सब्जी और खुले कटे हुये फल कतई न खाएं. आइस क्यूब कतई इस्तेमाल न करें. अधपके भोजन से बचें. ऐसा करेंगे तो वहां दस्त से बच सकेंगे.

परंतु आपको यदि दस्त लग ही जाएं तो फिर अपनी मेडिकल किट से लिवोफ़्लॉक्सासिन या उसी तरह की कोई जो दवाई ले गए हों उसकी प्रतिदिन एक गोली, दो-तीन दिन तक ले लें. याद रहे कि थाईलैंड की यात्रा में अगर दस्त लगे तो वहां फिर यह लिवोफ़्लॉक्सासिन काम नहीं देगी. उस देश में अब यह दवा काम करनी बंद कर चुकी है. वहां आपको नित्य एक गोली एजिथ्रोमाइसिन की लेनी होगी. बस, तीन दिन का कोर्स पर्याप्त है.

जो लोग पेट खराब होने की प्रतीक्षा नहीं करना चाहते, वे पूरे प्रवास के दौरान प्रतिदिन एक लिवोफ़्लॉक्सासिन ले सकते हैं.

पेट गड़बड़ होने की समस्या तो यहां तक है कि यात्रा से लौटने के बाद भी महीनों तक पेट गड़बड़ रह सकता है. इसे चिकित्सा की भाषा में इरिटेबल बॉवेल सिंड्रोम कहते हैं. कभी वैसा कुछ हुआ तो आपको विशिष्ट दवाइयों और विशेषज्ञ की सलाह की आवश्यकता पड़ सकती है.

(2) बुखार चढ़ना

विदेश यात्रा में अचानक बुखार आ जाए तो उसके कई कारण हो सकते है. यदि आप ऐसी जगह की यात्रा पर हैं जहां मलेरिया होना एक कॉमन सी बात हो तो यात्रा के पहले दिन से ही वे सारे एहतियात बरतें जो मलेरिया से बचने के लिए हम पहले ही बता चुके हैं. मच्छरदानी इस्तेमाल करें. मच्छरों को भगाने की क्रीम लायें. अपने डॉक्टर से मलेरिया रोकने की जो दवाइयां लेकर गए हैं उन्हें भी यदि वहां रहने के दौरान लगातार लेते रहें तो मलेरिया होगा ही नहीं.

फिर भी यदि मलेरिया जैसा बुखार हो ही जाए तो मलेरिया की दवाई का जो कोर्स आप अपने डॉक्टर से सलाह करके साथ लाये हों उसे तुरंत सलाह अनुसार ले लें.

वैसे सबसे अच्छी बात यह होगी कि आप यदि अफ्रीका, बांग्लादेश, पाकिस्तान या साउथ ईस्ट एशिया के किसी देश में गए हुये हैं तो बेहतर है कि अपने डॉक्टर से मलेरिया को रोकने की जो भी दवाइयां (मलेरिया कीमोप्रोफाइलेक्सिस) होती हैं वे यहीं से साथ लेकर जाएं. वहां प्रवास के दौरान नियमित रूप से ये दवाइयां लेते रहें.

हां, गला खराब होने, और जुखाम इत्यादि के कारण भी आपको बुखार आ सकता है. यदि ऐसा गला खराब हो तो वही लिवोफ़्लॉक्सासिन या एजिथ्रोमाइसिन ले लें परंतु पूरे छह दिन तक ले लें.

वैसे पेट के इनफेक्शन के कारण भी दस्त और बुखार हो सकता है. तब दस्त की दवा लेने से बुखार भी अपने आप ठीक हो जायेगा.

इनके अलावा टाइफॉयड, इन्फ्लूएंजा, वायरल बुखार आदि भी बुखार साथ-साथ हो सकते हैं. यहां कहा जाना चाहिए कि बचाव ही उपाय है. इनके टीकों के बारे में हम पहले ही बता चुके हैं.

(3) हिपेटाइटिस ए तथा बी :

यदि आप इन दोनों की वैक्सीन लेकर यात्रा पर निकले हैं तब तो कोई डर नहीं.

(4) दुर्घटना तथा चोट :

वहां जाकर जब हम अपनी बढ़ी उम्र और जीवनभर खटिया पर प्रायः आराम में मुब्तिला रहने की बुनियादी आदत को विस्मृत करके, उत्साह में आकर वे सारे खेल, जंप, चढ़ाइयां, वोटिंग, तैराकी, अंडर वॉटर गतिविधियां आदि करना चाहते हैं जो हमने कभी जीवनभर की ही नहीं हैं तो चोट का डर तो रहेगा ही. इसीलिए यात्रा में मांसपेशियों के खिंचने, या टखने या घुटने का स्प्रेन आम सी बात है. फिर बाकी का टूर लंगड़ाते-कूदते निकालना पड़ सकता है.

इसीलिए ऐसी सारी गतिविधियों को करने के दौरान हमेशा उचित सावधानी बरतें और अति उत्साहित न हों. यदि किसी गतिविधि को करने में आपको ठीक न लगे तो उसे तुरंत छोड़ दें. फालतू की शेखी में न पड़ें.

(5) रेबीज होने की आशंका :

श्रीलंका, फिलीपींस, थाईलैंड, वियतनाम, मेक्सिको आदि में कुत्तों के काटने से होने वाली बीमारी रेबीज बड़ी आम बात है. यहां जाना हो तो रेबीज वैक्सीन के तीन टीके लगवाकर ही इन देशों में जायें. इसके बाद भी, वहां यदि कोई आवारा कुत्ता कभी काट ही ले तो वहीं के वहीं तुरंत दो और टीके लगवा लें. यह आपको रेबीज जैसी जानलेवा बीमारी होने से बचायेगा.

(6) एचआईवी तथा असुरक्षित सेक्स द्वारा होने वाली अन्य बीमारियों का खतरा :

आजकल कुछ देशों के भ्रमण का एक बड़ा उद्देश्य यहां उपलब्ध सहज सेक्स है. यहां लोग मूलतः सेक्स के लिए ही जाते हैं. वे यह भ्रम पालते हैं कि यहां जब सेक्स यूं आसानी से उपलब्ध है तो यहां उपलब्ध लड़कियां यौन रोगों से सुरक्षित होंगी. तभी कई लोग इनके साथ बिना कॉन्डोम आदि के ही असुरक्षित सेक्स करने का रिस्क उठाते हैं. यह सब करना बेहद ही खतरनाक है. इस तरह की हरकत से बचकर रहें.

(7) यदि आप दिल के मरीज हैं :

अगर ऐसा है तो अपना लेटेस्ट ईसीजी तथा डॉक्टरी प्रिस्क्रिप्शन साथ रखें. कभी यह चीज आपके बहुत काम आयेगी. यदि आपके दिल में पेसमेकर लगा हुआ है तो डरिये मत. एयरपोर्ट पर लगे सिक्योरिटी सिस्टम से आपके पेसमेकर पर कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ेगा. हां, यदि आपके दिल में ऑटोमेटिक डीफिबरिलेटर लगा हुआ है तो जरूर ही आप एयरपोर्ट सिक्योरिटी वालों को कहें कि वे आपकी हैंड स्क्रीनिंग ही करें क्योंकि नॉर्मल एयरपोर्ट सिक्योरिटी सिस्टम से आपके डीफिबरिलेटर को नुकसान पहुंच सकता है.

दिल के मरीजों के लिये बेहतर होगा कि वे हवाई जहाज में आइल सीट मांगें. इससे उनको बीच-बीच में उठकर विमान में घूमना आसान होगा. विमान में बार-बार उठकर चक्कर मारते रहें. बैठे-बैठे भी अपने पांवों को हिलाते डुलाते रहें. इससे पांवों में खून जमने और पल्मोनरी इम्बोलिज्म होने का खतरा कम हो जाता है.

(8) स्किन (चमड़ी) की बीमारियां :

अपने साथ एक छाता जरूर ले जायें. वहां धूप में घूमने से आपको सन बर्न हो सकता है. एक अच्छी किस्म की सन प्रोटेक्शन क्रीम भी ऐसी धूप में हमेशा अपने चेहरे तथा शरीर के खुले हिस्सों पर लगाकर रखें. चमड़ी में अन्य समस्याएं भी आ सकती हैं. कीड़े काट सकते हैं. पसीने और नमी के कारण फंगल इंफेक्शन हो सकता है. फोड़े-फुंसी हो सकते हैं. अपनी मेडिकल किट में, डॉक्टर से पूछकर कोई एन्टीबायोटिक तथा एन्टीफंगल क्रीम जरूर ले जायें. ये बड़े काम आयेंगे.

(9) यदि आप गर्भवती हैं :

सलाह दी जाती है कि गर्भवती महिलाओं को यदि कहीं यात्रा करनी ही है तो उसका सबसे सुरक्षित समय गर्भ के अठारह से चौबीस सप्ताह के बीच का है. वैसे एक विचार यह भी है कि यदि आपको पहले कभी एबॉर्शन नहीं हुआ है या पहले के गर्भ के दौरान सब ठीक रहा है, और अभी के गर्भ में भी डाक्टर सब ठीक बता रहे हैं तो ऐसी पूरी तरह स्वस्थ गर्भवती महिला कभी-भी यात्रा कर सकती है. परंतु बेहतर है कि आपका डॉक्टर आपसे जो कहे आप वही मानें.

(8) यदि आप डायबिटीज के रोगी हैं :

अपनी सारी दवायें साथ लेकर चलें. हो सकता है कि वे दवायें आपको बाहर न मिलें. इंसुलिन रुम टेम्परेचर पर भी तीन महीने तक इस्तेमाल की जा सकती है सो उसकी चिंता नहीं करें. इंसुलिन अपने सामान में रखें. खराब नहीं होगी.

अपनी डायबिटीज के बारे में एक छोटा सा कार्ड बनाकर अपने पर्स में रखें. इस कार्ड में यह दर्ज करें कि आपको डायबिटीज कब से है? कौन-सी दवायें किस डोज में ले रहे हैं? आपके नियमित डॉक्टर का फोन नंबर क्या है?

ग्लूकोज का एक डिब्बा, तथा कोई मीठा भी साथ रखें. दौड़ भाग में रक्त की शुगर अचानक ही कम होने पर यही काम आयेंगे.

विषय बहुत बड़ा है. फिर हर शख्स का शरीर और स्वास्थ्य समस्याओं का पैटर्न भी एकदम अलग हो सकता है. बेहतर होगा कि इस लेख और इसी स्तंभ के पहले के दो आलेखों में दी गई सलाहों और सूचनाओं को पहले अपने नियमित डॉक्टर से साझा करें तभी विदेश यात्रा पर निकलें.