धारवाड़, एक ऐसा शहर जहां संगीत है, साहित्य है, संस्कृति है, राजनीति है, परंपरा है और उतना ही समृद्ध इतिहास भी है. इससे ज़्यादा एक शहर में और क्या हो सकता है! इस हज़ारों साल पुराने शहर का नाम भी कम से कम हज़ार साल पुराना है. शहर के प्राचीन दुर्गा मंदिर में मिले 1117 ईसवी के शिलालेख में इस नाम का उल्लेख मिलता है. शहर का यह नाम भी इसका इतिहास बताता है. धार-वाड़ा यानी द्वार-बाड़ा यानी एक ऐसा शहर जो द्वार हो. बेलवोला के मैदानी इलाके और मलंड के पहाड़ी इलाके के बीच का द्वार.

मौर्य, कंदंब और चालुक्य राजवंशों, बीजापुर के सुल्तानों, मराठों और मुगलों का शासन देख चुका यह शहर अंग्रेजों के समय में बॉम्बे प्रेसिडेंसी का हिस्सा रहा. और यह भी एक बुनियादी वजह है जिसने इस शहर को कर्नाटक के इतिहास में सबसे खास जगह दिलाई. 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में जब कन्नड़ बोलने वाली आबादी कई रियासतों और प्रेसिडेंसियों में बंटी हुई थी, तब कर्नाटक राज्य का स्वप्न इसी शहर में पहली बार देखा गया. 1890 में आरएच देशपांडे ने कर्नाटक विद्यावर्धक संघ की स्थापना कर इस सपने की नींव रखी थी.

20 मार्च की सुबह जब मैं चेनम्मा एक्सप्रेस से धारवाड़ पहुंचती हूं तो पता चलता है कि आज आरएच देशपांडे का जन्मदिन है और इस मौके पर कर्नाटक विद्यावर्धक संघ की इमारत में छोटा-सा जलसा है. शाम को वहां पहुंच कर महसूस होता है जैसे मैं कर्नाटक की आत्मा से रूबरू हो रही हूं. सफेद धोती-कुर्ता और गांधी टोपी में तमाम बुज़ुर्ग वहां मौजूद हैं. कर्नाटक के प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी, पत्रकार, साहित्यकार और दो बार राज्यसभा सदस्य रह चुके 99 वर्षीय पाटिल पुटप्पा मुख्य अतिथि हैं. लोकप्रिय कर्नाटक गीत ‘भाग्यदा लक्ष्मी’ के गायन के साथ कार्यक्रम शुरू होता है. आगे कार्यक्रम में दो महिलाएं कर्नाटक राज्यगीत ‘जय भारत जननिय तनुजाते जय हे कर्नाटक माते’ गाती हैं. कन्नड़ कवि कुवेम्पु द्वारा लिखी गई यह कविता अपने आप में कन्नड़ भाषियों के कर्नाटक प्रेम की बानगी है. हालिया सालों में मध्य प्रदेश जैसे उत्तर भारत के कुछ राज्यों ने भी अपने राज्यगीत बनाए हैं, पर शायद ही इनको लेकर यहां की आबादी में वैसा गर्व का बोध दिखता हो जैसा कर्नाटक वासियों में है.

यहां डॉक्टर शशिधर नरेंद्र से मुलाकात होती है. वे ऑल इंडिया रेडियो में अनाउंसर रहे हैं. डॉ शशिधर लंबे समय तक थियेटर से भी जुड़े रहे हैं और इन दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘मन की बात’ का कन्नड़ में अनुवाद करते हैं. ‘आपको जानकर ताज्जुब होगा कि कन्नड़ भाषा में कुल आठ ज्ञानपीठ दिए गए हैं, जिनमें से चार धारवाड़ के नाम हैं - धारा बेंद्रे, चंद्रशेखर कंबार, विनायक कृष्ण गोकाक और डॉ गिरीश कर्नाड. इसके अलावा कर्नाटक और हिंदुस्तानी संगीत के प्रमुख नाम, पंडित भीमसेन जोशी, गंगूबाई हंगल, मल्लिकार्जुन मंसूर आदि भी यहीं से हैं.’ डॉ शशिधर पूरे उत्साह के साथ यह जानकारी साझा करते हैं.

कर्नाटक यूनिवर्सिटी में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम के बाद फुर्सत के पल बिताती कुछ छात्राएं
कर्नाटक यूनिवर्सिटी में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम के बाद फुर्सत के पल बिताती कुछ छात्राएं

भारतीय शास्त्रीय संगीत में कर्नाटक संगीत का अपना महत्वपूर्ण स्थान है. कर्नाटक के इस शहर में हिंदुस्तानी संगीत ने कैसे ज़मीन पकड़ी इसकी भी अपनी एक दिलचस्प कहानी है. मुगल काल में जब हिंदुस्तानी संगीतकार आगरा के मुगल घरानों और ग्वालियर के सिंधियाओं के यहां से मैसूर के महाराजाओं के यहां कार्यक्रम के लिए जाते थे तो वे धारवाड़ में ही रुका करते थे. उनके यहां रुकने और यहां के लोगों की साहित्य और संगीत में रुचि का नतीजा था कि धारवाड़ धीरे-धीरे कर्नाटक में हिंदुस्तानी संगीत का केंद्र बनकर उभरा.

आखिर धारवाड़ साहित्यिक और सांस्कृतिक रूप से इतना अमीर क्यों है? इसके जवाब में डॉक्टर शशिधर बताते हैं, ‘1818 में जब अंग्रेज मराठाओं को हराकर यहां आए तो उन्हें ये जगह काफी अच्छी लगी. मौसम और तापमान यहां बस जाने के लिए अनुकूल था. तब उन्होंने यहां शैक्षणिक संस्थान शुरू किए.’ ज़िले के गजेटियर के मुताबिक शुरुआत में इस इलाके को ‘सदर्न मराठा कंट्री’ कहा जाता था और यहां शिक्षा का माध्यम भी कन्नड़ न होकर मराठी था. 1850 के आसपास अंग्रेज़ों ने अपनी शिक्षा नीति बदलते हुए न सिर्फ अंग्रेज़ी पर ज़ोर देना शुरू किया, साथ ही वे प्रतिष्ठित कन्नड़ भाषी शिक्षाविदों, जैसे चेन्नबसप्पा, वेंकटरंगोकट्टी और शेषगिरि राव चूड़ामणी आदि को यहां ले आए. मराठी भाषियों के दंभ और घमंड से परेशान कन्नड़ भाषियों को अंग्रेजी में अपना भविष्य बेहतर लगा साथ ही कन्नड़ में शिक्षा का उपलब्ध होना भी उनके लिए वरदान की तरह था. धारवाड़ के एक बड़े शिक्षा केंद्र के रूप में उभरने का फायदा यह हुआ कि आसपास के कन्नड़ भाषी शिक्षार्थी पूना और बंबई जाने के बजाय धारवाड़ आने लगे. यह एक मुख्य कारण है कि यह शहर शिक्षा, साहित्य और संस्कृति के केंद्र के रूप में समृद्ध होने लगा.

‘इस समृद्धि का दूसरा श्रेय ऑल इंडिया रेडियो को दिया जा सकता है’ डॉक्टर शशिधर बताते हैं, ‘यहां आकाशवाणी का स्टेशन 1950 में शुरू हो गया था जबकि बैंगलोर में पांच साल बाद 1955 में शुरू हुआ. रेडियो के यहां आने से संगीत, साहित्य, शिक्षा और कृषि, सभी क्षेत्रों में लोगों की दिलचस्पी और जानकारी बढ़ी.’

पत्रकार और कर्नाटक विद्यावर्धक संघ के पदाधिकारी मनोज पाटिल भी डॉ शशिधर की बात से सहमति जताते हुए कहते हैं, ‘यहां की सर्दियां और गर्मियां आसानी से बर्दाश्त की जा सकती हैं. बरसात भी ठीक-ठाक होती थी, हालांकि अब कम हो गई है. कर्नाटक यूनिवर्सिटी भी यहीं है इसीलिए यहां कई क्षेत्रों के दिग्गज आकर बस गए और यहां की ज़मीन और उपजाऊ होती चली गई. 1917 में इसी इमारत में हुई एक सभा में तमाम कन्नड़ भाषी तालुकों और इलाकों को मिलाकर कर्नाटक राज्य बनाने के लिए तत्कालीन भारत सरकार से अपील करने का प्रस्ताव पास किया गया था. इसके अलावा अन्य कई प्रगतिशील आंदोलन धारवाड़ से निकले हैं. आज भी कन्नड़ भाषी और अन्य विद्वान इस शहर में बसने के लिए आते हैं.’

दिन में शहर के खास लोगों से मिलते वक्त मैं मनोज पाटिल की आखिरी बात बड़ी बारीकी से महसूस कर चुकी हूं. ऐसे ही लोगों में पद्मश्री गणेश देवी भी शामिल हैं. महाराष्ट्र में जन्मे प्रोफेसर देवी यूनाइटेड किंगडम के लीड्स और अमेरिका के येल जैसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में पढ़ चुके हैं. इन्हें भारत की 780 भाषाएं खोजने का श्रेय जाता है. भारतीय भाषाओं पर अपने काम के लिए ही प्रोफेसर देवी को पद्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. वे इस शहर में आने और यहां बसने का अनुभव साझा करते हुए कहते हैं, ‘मैं और सुरेखा पूरा भारत घूमने के बाद असम के तेजपुर में बसने का फैसला कर चुके थे. फिर हमें धारवाड़ याद आया. पिछले एक साल से हम यहीं रह रहे हैं.’ सुरेखा प्रोफेसर देवी की पत्नी और सहकर्मी हैं. इस दंपति के सफेद रंग के खूबसरत से घर में खूब धूप और हवा आती है. भीतर घुसते ही ढेर सारी किताबें मिलती हैं, और आप एक सुकून महसूस करते हैं. वो सुकून जो पढ़ने-पढ़ाने वाले माहौल में होता है.

धारवाड़ के अपने घर में प्रोफेसर गणेश देवी
धारवाड़ के अपने घर में प्रोफेसर गणेश देवी

मेरे वहां जाने पर वे रेखा शेट्टार को मुझसे मिलने के लिए बुलाते हैं. ‘अ यंग फ्रेंड फ्रॉम डेल्ही इज़ हियर टू सी अस’ वे उन्हें फोन पर कहते हैं. कुछ देर में रेखा भी आ जाती हैं. रेखा ने भी यूनाइटेड किंगडम से पढ़ाई की है. उनके बेटे और बहू सिडनी में रहते हैं, लेकिन वे धारवाड़ में ही रहना चाहती हैं. उन्होंने धारवाड़ की इमारतों पर काम किया है. ‘धारवाड़’ नाम से ही तस्वीरों वाली एक किताब भी लिखी है, जिसमें शहर की नई पुरानी सब तरह की इमारतों के बारे में तफसील से लिखा गया है.

आपको इस शहर में सबसे खास क्या लगता है? ‘इसका अपनापन’ रेखा हंसते हुए कहती हैं, ‘यहां हर शाम कुछ न कुछ हो रहा होता है. कहीं संगीत का कार्यक्रम, कहीं साहित्य गोष्ठी, कहीं कवितापाठ तो कहीं कला प्रदर्शनी. और ये सब बिना किसी टिकट के. सब के लिए सब कुछ फ्री. इसीलिए उत्तरी कर्नाटक के सुसंस्कृत लोग एक उम्र के बाद यहीं आकर बस जाना चाहते हैं. जबकि इसका जुड़वां शहर हुबली, युवाओं के व्यवसाय और नौकरियों के लिए उतनी ही मुफीद जगह है.’

प्रोफेसर देवी बताते हैं, ‘मुझे इस शहर के बारे में एसके देसाई ने बताया था. वे शिमोगा यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर थे. फिर मैं यहां के जे शाह से मिला, जो जाने-माने मॉडर्न इंडियन फिलॉसफर थे. इसके बाद के कृष्णमूर्ति (संस्कृत के विद्वान) आदि कई अन्य विद्वानों से इसी शहर में मिला. मेरी नज़र में ये शहर विद्वानों का शहर रहा है. मैं कुछ साल बाद फिर एक वर्कशॉप के सिलसिले में धारवाड़ आया. एक महीने तक यहां रहा. तब मुझे प्रसिद्ध संगीतज्ञ मल्लिकार्जुन मंसूर के बेटे से मिलने का मौका मिला. वे मुझे मल्लिकार्जुन साहब से मिलाने ले गए. उन्हीं दिनों मैं कवि और सामाजिक कार्यकर्ता चंद्रशेखर पाटिल से मिला. उनकी कुछ पब्लिक मीटिंग्स में हिस्सा लेने का मौका मिला. मैं मनोहर ग्रंथमाला भी गया. यह एक पुराना पब्लिशिंग हाउस है जहां एके रामानुजन और गिरीश कर्नाड सहित कर्नाटक और कन्नड़ भाषा के लगभग सभी प्रतिष्ठित साहित्यकार छपे हैं. यहां आज भी सुबह 10 से 11 बजे के बीच लगभग तमाम लेखक, साहित्यकार इकट्ठा होते हैं. यहीं मैं और भी कई लेखकों से मिला. तब इस शहर की एक छवि मेरे दिमाग बनी - धारवाड़ यानी एक ऐसा शहर जहां जो कुछ भी होता है, पूरी गुणवत्ता के साथ होता है. उसके बाद मैं न जाने कितनी बार इस शहर में आया हूं. लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया के लिए भी आता रहा हूं.’

‘दिस इज़ अ सिटी सस्पेंडेड इन टाइम’ प्रोफेसर देवी की ये बात मुझे याद रह जाती है. बिलकुल यही अहसास मुझे तब होता रहा है जब-जब मैं बनारस गई हूं. यह शहर मुझे कर्नाटक के बनारस जैसा लगता है. मुझे कर्नाटक विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में मिले एक विद्यार्थी की बात याद आती है, ‘इस शहर को हम कन्नड़ में विद्याकाशी कहते हैं.’ यानी वाकई ये शहर कर्नाटक का काशी है! एक पुराना शहर जहां सबकुछ अपनी ही धीमी गति पर हो रहा है. पर क्योंकि यहां समय ही अधर में लटका हुआ सा है तो फिर न गति का महत्व है, न चाल का.

इस मुलाकात के बाद मुंडगोड जाना होता है. धारवाड़ से कोई 65 किलोमीटर दूर है मुंडगोड. इसकी खासियत है यहां की तिब्बती बसाहट. हालांकि यह धारवाड़ ज़िले का हिस्सा नहीं है पर रेखा शेट्टार कहती हैं कि धारवाड़ आकर मुंडगोड नहीं देखा तो धारवाड़ यात्रा अधूरी ही रहेगी. मैं धारवाड़ यात्रा को अधूरा नहीं छोड़ना चाहती. मुंडगोड़ यात्रा के बहाने कर्नाटक के गांवों से भी परिचय होता है. मुझे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गांव और कर्नाटक के गांव बहुत अलग नहीं लगते. औरतें यहां भी साड़ी पहनती हैं और मर्द कुर्ता-धोती और गांधी टोपी. मार्च के दिनों में भी यहां ठीक-ठाक गर्मी पड़ना शुरू हो चुकी है. घरों के बाहर नई फसल की मूंगफलियां और लाल मिर्चें सूख रही हैं. पानी की कमी यहां साफ दिखती है. हाथ गाड़ियों पर प्लास्टिक के बर्तनों में पानी रखकर लाते बच्चे और वयस्क जहां-तहां दिख जाते हैं.

लेकिन मुंडगोड़ इन गांवों से बिलकुल अलग है. यहां न पानी की समस्या दिखती है, न गरीबी. यहां आकर सिर्फ नारियल के पेड़ ही बता सकते हैं कि आप कर्नाटक में हैं. वरना लाल पोशाकों में घूमते बौद्ध-भिक्षु और दुपहिया गाड़ियों पर घूमते, फैशनेबल कपड़े पहने तिब्बती युवा जोड़ों को देखकर धर्मशाला या सिक्किम में होने का भान होता है. और फिर अब तक सिर्फ पहाड़ों में ही दिखाई दिए तिब्बती और बौद्ध झंडों को नारियल के पेड़ों के साथ देखना अलग ही अनुभव है. यहां चार बौद्ध मठ और कई कैंप हैं. इस बसाहट के पुस्तकालय में 23 साल की कर्मा से मुलाकात होती है. कर्मा यहीं पैदा हुई हैं, कभी तिब्बत नहीं गईं. लेकिन तिब्बत की कहानियां ऐसे सुनाती हैं जैसे वर्तमान दलाई लामा को यह उपाधि मिलने का घटनाक्रम उन्होंने अपनी आंखों से देखा हो. वे बताती हैं कि तिब्बती युवाओं को किताबें पढ़ने का खास शौक नहीं है और यह बात उन्हें अच्छी नहीं लगती.

मुंडगोड का तिब्बती शरणार्थियों की बसाहट
मुंडगोड का तिब्बती शरणार्थियों की बसाहट

शाम होने से पहले मैं धारवाड़ वापस लौट आती हूं. यहां की मुख्य भाषा कन्नड़ होने की वजह से सबसे बात करना उतना आसान नहीं है. फिर भी यहां हिंदी और अंग्रेजी बोली और समझी जाती है. पुराने मठों, मंदिरों, गिरजों और कॉलेजों वाले इस शहर में किसी को कहीं जाने की कोई जल्दी नहीं दिखती. कैंटीनों और सड़क किनारे की छोटी-छोटी दुकानों में लोग तसल्ली से गिरमिट, कांदा-पकौड़ा और फिल्टर कॉफी का स्वाद लेते दिख जाते हैं. गिरमिट, लाई या मुरमुरे से बना भेलपुरी जैसा व्यंजन है जिसे अक्सर यहां शाम की कॉफी के साथ ज़ायका लेकर खाया जाता है. इसे यहां की सांस्कृतिक समरसता के प्रतीक की तरह भी इस्तेमाल किया जाता है. यहां के खाने में नारियल का खूब इस्तेमाल होता है. चावल की रोटी जिसे स्थानीय लोग अक्की रोटी कहते हैं, और ज्वार की रोटी यहां खूब पसंद की जाती है. खाने में दालों का भी काफी इस्तेमाल होता है.

कन्नड़ संस्कृति के लिए प्रेम, संगीत और साहित्य यहां की लोक परंपरा का हिस्सा मालूम होता है. लोग यहां अपनी भाषा और इतिहास को लेकर न सिर्फ जागरूक हैं, बल्कि उन्हें इस पर गर्व है. यूनिवर्सिटी के लॉन में और लाइब्रेरी के रीडिंग हॉल में लड़के-लड़कियां कन्नड़ में छपे अखबार और किताबें पढ़ते देखे जा सकते हैं. इनमें भाषा को लेकर हिंदी पट्टी जैसी हीनता नहीं दिखती. लेकिन यहां के सार्वजनिक पुस्तकालय में युवाओं से बात करने पर पता चलता है कि यहां का युवा अपना अधिकतम समय सरकारी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में दे रहे हैं. ऐसे में मैं यह जानने के लिए उत्सुक हो जाती हूं कि क्या ये युवा इस शहर की समृद्ध साहित्यिक परंपरा को आगे ले जा सकेंगे. और अधिकतर विद्वान मुझे इस बारे में आश्वस्त ही करते रहे कि यह शहर पिछले कई सालों में न के बराबर बदला है, विद्वता की ये परंपरा दूर तक जाएगी.

गदग के पुट्टराज मठ में संगीत का अभ्यास करते विद्यार्थी
गदग के पुट्टराज मठ में संगीत का अभ्यास करते विद्यार्थी

अब शाम का झुटपुटा हो चला है. सड़कें लगभग खाली हैं. इक्का-दुक्का कार पास से निकल जाती है. घर जाने के लिए सामान समेट रही नारियल पानी वाली महिला को रोक कर नारियल पानी लेती हूं. वो दिन की आखिरी कमाई को माथे से लगाती है. मुझे सुबह-सुबह गदग के संगीत मठ में पुट्टराज की मूर्ति के सामने माथा टेकती हुई महिला याद आती है और प्रोफेसर देवी का यह कहना भी, ‘धारवाड़ एक प्रगतिशील शहर है जो कॉस्मोपॉलिटन नहीं है. यहां पब्लिक मीटिंग्स में महिलाएं आज भी पुरुषों से अलग बैठती हैं.’ किसी को प्रगतिशील होने के लिए कॉस्मोपॉलिटन होने की ज़रूरत नहीं, धारवाड़ यह बहुत सादगी से सिखाता लगता है.