12 मार्च 2012 को खबर आई कि कश्मीर के अनंतनाग ज़िले में सुरक्षा बलों के साथ हुई एक मुड़भेड़ में तीन मिलिटेंट्स मारे गए हैं. इनमें दो कश्मीरी थे जबकि तीसरे के बारे में यह बताया गया कि वह विदेशी मूल का था. बाद में पता चला कि यह तीसरा मिलिटेंट विदेशी नहीं था. वह तेलंगाना का रहने वाला था.

शुरुआत में तो पुलिस यह बात नकारती रही, लेकिन तेलंगाना पुलिस की जांच पड़ताल के बाद यह साफ हो गया कि मारा गया मिलिटेंट वाक़ई हैदराबाद का रहने वाला 26 साल का मुहम्मद तौफ़ीक़ था. कश्मीर पुलिस के डायरेक्टर जनरल एसपी वैद ने बताया कि तौफीक इस्लामिक स्टेट यानी आएस की विचारधारा से प्रभावित था. उनका कहना था, ‘वह कश्मीर आईएस की आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने आया था.’

इस बयान ने कश्मीर में खलबली मचा दी. लोगों के इस डर की पुष्टि होती दिखी कि कश्मीर में आखिरकार इस्लामिक स्टेट ने पैर जमा लिए हैं. दूसरी तरफ सुरक्षा एजेंसियां भी इस बात से चिंतित थीं कि भारत के किसी अन्य राज्य से कोई युवक आकर कश्मीर के मिलिटेंट्स में शामिल हो गया था.

कश्मीर में किसी और राज्य के मिलिटेंट

सुनने में यह बात नयी लगती है क्योंकि पहले कभी ऐसा सुनने को मिला नहीं है कि किसी और राज्य के लोग कश्मीर आकर मिलिटेंट्स से जुड़ गए हों. लेकिन क्या यह सच है? वाक़ई ऐसा पहले कभी नहीं हुआ?

थोड़ी सी छानबीन के बाद यह पता चलता है कि यह पहला ऐसा वाकया नहीं है. इससे पहले भी दक्षिण भारत के ही चार लोग कश्मीर घाटी में सुरक्षा बलों के साथ हुई दो मुडभेड़ों में मारे जा चुके हैं. बात 2008 अक्टूबर की है जब कश्मीर के कुपवाड़ा ज़िले में चार दिनों के अंदर हुई दो मुठभेड़ में केरल के चार मिलिटेंट मारे गए थे. इनमें कन्नूर के मुहम्मद फ़य्याज़ (23) और मुहम्मद फाहिज़ (24), एर्नाकुलम के मुहम्मद यासीन (28) और मलप्पुरम के अब्दुल रहीम (28) शामिल थे.

इस घटना ने केरल में सनसनी फैला दी थी. यहां तक कि तब के केरल के मुख्यमंत्री वीएस अच्युतानंदन ने इस पर गहरा शोक व्यक्त किया था. उन्होंने कहा था, ‘धर्म के नाम पर युवाओं को बुराई की तरफ बरगलाया जा रहा है. चौंका देने वाली बात यह है कि ऐसी शैतानी ताक़तें हमारे राज्य में सक्रिय हैं और हमारे पारंपरिक सांप्रदायिक सौहार्द को बर्बाद करने निकल पड़ी हैं.’ 2009 में इस ग्रुप के सरगना टी नज़ीर को 12 और लोगों के साथ गिरफ्तार किया गया. उन पर जवानों को लश्कर में भर्ती कराने का आरोप साबित हुआ. टी नज़ीर को आजीवन कारावास की सजा मिली.

अब जबकि यह घटना दोबारा घटी है तो सवाल पैदा होता है कि ये लोग कश्मीर क्यों आते हैं, जबकि यह कोई राज़ नहीं है कि भारत के अन्य राज्यों के मुसलमान कश्मीर में चल रहे संघर्ष और कश्मीरियों की अलगाववादी विचारधारा से अपने आप को नहीं जोड़ पाते. और अभी तो आईएस जैसे संगठनों को दोषी ठहराया जा रहा है, लेकिन 2008 में तो आईएस विश्व स्तर पर नहीं उभरा था.

ज़्यादातर जानकार इसका एक आसान सा जवाब देते हैं और वह है कट्टरपंथ का बढ़ता दायरा. लेखक और काउंटर-टेररिज्म एक्सपर्ट अजय साहनी सत्याग्रह से बातचीत में कहते हैं, ‘इस प्रक्रिया की मुख्य वजह निजी और सामुदायिक स्तर बढ़ी कट्टरता है.’ साहनी आगे कहते हैं, ‘केरल में इस्लाम पैगंबर मुहम्मद के समय ही आ गया था, लेकिन अब से 20 साल पहले तक केरल के मुसलमान सब से ज़्यादा धर्मनिरपेक्ष और उदार लोग हुआ करते थे. आलम यह था कि आप मुसलमान, हिंदू और ईसाई में कोई फ़र्क़ नहीं कर पाते थे. लेकिन पिछले 10-20 साल से जहां गल्फ से पैसा आया वहां वहाबी इस्लाम भी आता चला गया और कट्टरपंथ बढ़ता चला गया.’

अजय साहनी के मुताबिक अब यह हाल है कि कोच्चिकोडे (कालीकट) में एक जगह चार किलोमीटर के दायरे में क़रीब 31 मस्जिदें हैं. ये अलग अलग संप्रदायों और उप उपसंप्रदायों के मुसलमानों ने बनवाई हैं. यही हाल स्कूलों का है जो इन्हीं संप्रदायों की विचारधारा के आधार पर पिछले कुछ सालों के दौरान बनाये गए हैं. साहनी कहते हैं, ‘किसी और धर्म को छोड़ें, जब बच्चे अपने धर्म के लोगों से भी सांप्रदायिक कारणों के चलते अलग-थलग रखे जा रहे हों तो नतीजा हमेशा कट्टरपंथ ही होता है.’

कश्मीर में काम कर रहे एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी इन बातों से इत्तेफ़ाक़ रखते हैं. वे कहते हैं, ‘कट्टरपंथ सबसे बड़ी वजह है इस प्रतिक्रिया की. लेकिन अभी गिने-चुने लोग ही हैं जो जो इस रास्ते पर चल पड़े हैं. इसको एक ट्रेंड मान लेना भी गलत होगा.’ उनके मुताबिक सावधानी की जरूरत तो है ही, कट्टरपंथ की जड़ तक जाकर इसके पर भी काटने होंगे.’

दूसरी तरफ कुछ लोगों का यह भी मानना है कि सिर्फ कट्टरपंथ ही इकलौती वजह नहीं है. कश्मीर के ही एक और वरिष्ठ पुलिस अधिकारी कहते हैं कि पैसा और शोहरत भी एक वजह है. वे बताते हैं, ‘अभी हाल ही में आपने सुना होगा कि हमने
उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फरनगर के रहने वाले संदीप कुमार को गिरफ्तार किया है जो लश्कर का मिलिटेंट था.’ संदीप को पिछले साल जून में मिलिटेंट्स और सुरक्षा बलों के बीच हुई एक झड़प के दौरान पुलिस ने धर लिया था. ये पुलिस अधिकारी कहते हैं, ‘कट्टरपंथ की तो बात ही नहीं है क्योंकि यह बंदा हिंदू है. फिर भी ये मिलिटेंट बना. और इसकी प्रेरणा पैसा, शोहरत और कुछ और चीज़ें थीं.’

अजय साहनी भी यह बात मानते हैं. इसमें वे एक और बात जोड़ते हैं. वे कहते हैं, ‘मानसिकता भी एक बहुत अहम रोल अदा करती है. जैसे पिछले साल पकड़े गए केरल के एक नौजवान की ही बात करते हैं जो इस्लामिक स्टेट में शामिल होने सीरिया जा रहा था और पकड़ा गया. उसका इस्लाम और कट्टरपंथ के साथ दूर-दूर तक का कोई वास्ता नहीं था. पूछताछ से पता चला कि उस पर किसी का गला काटने का फितूर सवार था, जिसकी वजह से वो सीरिया चल पड़ा था.’ साहनी भी मानते हैं कि इन गिनी-चुनी घटनाओं को आईएस या अल-क़ाएदा से जोड़ लेना ठीक नहीं होगा.

कश्मीर, आईएस और अल-क़ाएदा

पिछले साल नवंबर में गृह मंत्री राजनाथ सिंह आईएस की कश्मीर में मौजूदगी को नकारते हुए कहा था कि हिंदुस्तानी मुसलमान आईएस जैसे आतंवादी गुटों को यहां पैर नहीं जमाने देंगे. लेकिन 12 मार्च को कश्मीर में तौफ़ीक़ के साथ मारे गए मिलिटेंट ईसा फ़ाज़ली, के जनाज़े पर जो हुआ वह अभूतपूर्व था. कुछ नकाबपोश लोग आईएस के झंडे फहराते हुए हुए और परिवारवालों और शोक व्यक्त करने आये लोगों से फाज़ली की लाश यह कहते हुए छीनकर ले गए कि उन्हें इस्लाम के बारे में कुछ नहीं पता. पाकिस्तानी झंडे, जो ऐसे जनाज़ों में सालों से फहराये जाते हैं, फहराने से इन नकाबपोश लोगों ने मना किया और आईएस के झंडे फहराए.

लोगों ने उनका विरोध किया, लेकिन साथ ही साथ वे इस घटना को लेकर बेचैन भी हो गए. लोगों की बेचैनी तब बढ़ी जब वैद ने यह एलान कर दिया कि तौफ़ीक़ हैदराबाद से कश्मीर आईएस की आतंकवादी गतिविधियों के सिलसिले में आया था. जो रही सही कसर थी वह अंसार ग़ज़वातुल हिंद के एक बुलेटिन ने पूरी कर दी जिसमें उसने यह दावा किया था कि तौफ़ीक़ उसके लिए काम करता था.

अंसार ग़ज़वातुल हिंद कथित तौर पर अल-क़ाएदा की ही शाखा है

बाद में थोड़ा सा कोहरा छंटा तो तो चीज़ें सामान्य होती दिखाई दे रही हैं. पहली चीज़ जो लोगों को सुकून दे रही है वह यह है कि अल-क़ायदा और आईएस एक दूसरे से कोसों दूर है और किसी एक गुट का दूसरे गुट के आदमी को अपना बताना अटपटा है. राहत की दूसरी बात यह है कि कश्मीर के राजनेताओं (इनमें अलगाववादी भी शामिल हैं), मौलवियों और आम जनता ने एकजुट होकर आईएस और अल-क़ायदा को नकारा है.

कश्मीर के वरिष्ठ पत्रकार और राजनैतिक विश्लेषक गौहर गिलानी के मुताबिक आईएस और अल क़ायदा को सिर्फ हिंसा और तबाही से मतलब है. उनका यह भी मानना है कि ये लोग सिर्फ राजनीतिक इस्लाम की गलत छवि दिखा कर मुसलमानों और अन्य धर्म के लोगों को मारना जानते हैं. गिलानी कहते हैं, ‘कश्मीर में यह लोग पैर नहीं जमा सकते क्यूंकि कश्मीरियों का संघर्ष राजनीतिक है. इस्लाम के अलावा हमारी कई और पहचानें हैं जिनसे हम हिम्मत लेते आये हैं, जिनमें सबसे ऊपर हमारी कश्मीरी पहचान है.’

अलगायवादी संगठन हुर्रियत कांफ्रेंस में सैय्यद अली गिलानी के हाल ही में चुने गए उत्तराधिकारी, मुहम्मद अशरफ खान उर्फ़ सेहराई ने भी आईएस और अल-क़ायदा की कड़े शब्दों में निंदा की है. एक हालिया साक्षात्कार में उनका कहना था, ‘आईएस और अल-क़ायदा की ज़हरीली विचारधारा से कश्मीर को कोई लेना-देना नहीं है. हम उन्हें कभी स्वीकार नहीं कर सकते.’ सेहराई के मुताबिक कुछ शरारती तत्व आईएस के झंडे फहराकर कश्मीर में उलझन फैला रहे हैं. उनका कहना था, ‘हम उन पर कड़ी नज़र रखे हुए हैं.’

लोग भी सोशल मीडिया पर आईएस और अल-क़ायदा के कश्मीरी समर्थकों को खूब लताड़ते दिखते हैं. आम लोगों के सोशल मीडिया पोस्ट्स भी यही दिखाते हैं कि इन गुटों के लिए कश्मीर में समर्थन न के बराबर है. जहां आम बाशिंदों के मन में इसके चलते कुछ शांति आ गई है वहीं सुरक्षा एजेंसियां अभी भी बेचैन हैं.

एक वरिष्ठ पुलिस अफसर सत्याग्रह को बताते हैं कि वे हालात को बहुत बारीकी से देख रहे हैं. उनका कहना है, ‘आईएस और अल-क़ायदा जैसे गुट विचारधारा पर पनपते हैं. हां, माना कश्मीर में उनके लिए जगह नहीं है, लेकिन विचारधारा का आना भी एक बड़ा खतरा साबित हो सकता है.’ जानकार कहते हैं कि आने वाले समय में कश्मीर में जो भी हो. चाहे अल कायदा और आईएस पैर जमाएं या नहीं, अनिश्चितता निश्चित तौर पर रहने वाली है.