छत्रपति शिवाजी भारतीय इतिहास के सबसे बडे गौरव पुरुषों में से हैं. महाराष्ट्र के तो वे सबसे बड़े नायक हैं. शिवाजी हिंदुत्ववादियों के भी अतिप्रिय हैं जो उन्हें मुस्लिम सत्ता के ख़िलाफ़ हिंदूराष्ट्र स्थापित करने की मुहिम का नायक मानते हैं. शिवाजी के योद्धा स्वरूप को लोग जानते हैं और उसी का गुणगान किया जाता है क्योंकि वही लोगों को रास आता है. लेकिन क्या शिवाजी सचमुच हिंदुत्ववादी, मुस्लिम विरोधी राजा थे? या शिवाजी के व्यक्तित्व के और भी पहलू हैं जिन्हें इसलिए नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है कि वे उनका गुणगान करने वाले लोगों के लिए असुविधाजनक हैं?

शिवाजी के इन पहलुओं के बारे में गोविंद पानसरे ने अपनी विख्यात किताब ‘शिवाजी कोण होता’ (शिवाजी कौन थे ) में बहुत सुंदर ढंग से लिखा है. हम जानते हैं कि गोविंद पानसरे की हत्या कट्टरवादी तत्वों ने कर दी थी. उन्होंने लिखा है कि शिवाजी महत्वाकांक्षी और साहसी व्यक्ति थे और बहुत थोड़े से सहयोगियों के साथ उन्होंने एक साम्राज्य खड़ा करने का सपना देखा था. जब उन्होंने पहला क़िला जीता तो उनके साथ 100 लोग भी नहीं थे. लेकिन शिवाजी की महत्वाकांक्षा सिर्फ़ सम्राट बनने की नहीं थी. वे एक आदर्श प्रजापालक सम्राट बनना चाहते थे. अपना अभियान शुरू करने के पहले ही उन्होंने इसकी तैयारी की थी.

शिवाजी के पिता के पास कर्नाटक के अलावा पुणे की जागीर भी थी जहां शिवाजी अपनी माता जीजाबाई और दादाजी कोंडदेव की देखरेख में बढ़े पले. गोविंद पानसरे ऐतिहासिक दस्तावेज़ों के हवाले से बताते हैं कि यह इलाक़ा मुग़लों और आदिलशाह हुकूमत के बीच युद्धों का मैदान बन गया था, इसलिए यहां गांव उजड़ गए थे, खेतों की जगह जंगल उग आए थे और जंगली जानवर घूमते थे. शिवाजी ने गांव वालों को फिर बसाया, उन्हें बीज और पालतू जानवर दिए, क़र्ज़ दिए जिनकी वसूली दो तीन साल बाद शुरु होती थी.

शिवाजी की सेना आम किसान, चरवाहों और निचली जाति के लोगों से बनी हुई थी. उस वक्त आम चलन ज़मींदारी का था जिसमें शासक इलाक़े के ज़मींदार से निश्चित मात्रा में कर उगाहते थे जो आम जनता से नक़दी या फ़सल के रूप में मनमाना लगान वसूलते थे. शिवाजी ने अपने राज में ज़मीन की पैमाइश और किसान की देने की क्षमता का आकलन करके लगान निश्चित किया और ज़मींदारों से उगाही का अधिकार छीन लिया. अब सरकारी कर्मचारी लगान लेते थे और ज़मींदार को उसका हिस्सा देने के बाद बाक़ी सरकारी ख़ज़ाने में जमा करते थे. शिवाजी ने कई अत्याचारी ज़मींदारों की हवेलियां और महल तुड़वा दिए और उन्हे किसानों की तरह सादे घरों मे रहने का आदेश दिया. फ़सल ख़राब होने की स्थिति में लगान माफ़ कर दिया जाता था और उन्हें क़र्ज़ भी दिया जाता था जिसे चार-पांच साल में चुकाना होता था.

शिवाजी के राज में सेना को यह सख़्त ताक़ीद थी कि सैन्य अभियान पर जाते हुए किसी भी किसान की फ़सल को नुक़सान न पहुंचे. शिवाजी का यह भी आदेश था कि सेना किसी से भी अनाज आदि की ज़बरन वसूली नहीं करेगी और जिस चीज़ की ज़रूरत हो उसे उचित दाम देकर ख़रीदा जाए. उन्होने एक चिट्ठी में लिखा है कि ‘किसानों को एक तिनके का भी नुक़सान नहीं होना चाहिए.’

शासन प्रणाली में शिवाजी ने पुराने ग्रंथों से प्राप्त ज्ञान का इस्तेमाल किया. कुछ मुग़ल राज्यप्रणाली से भी लिया, ख़ासकर अकबर के शासन प्रबंध से. अकबर से वे काफी प्रभावित थे. जज़िया कर के विरोध में औरंगज़ेब को लिखी उनकी एक चिट्ठी से भी यह ज़ाहिर होता है. इसमें वे औरंगज़ेब को याद दिलाते है कि उनके पूर्वज अकबर ने 52 साल राज किया जिसमें उन्होंने सभी धर्म के लोगों का ख़्याल रखा, इसलिए उनकी ख्याति जगदगुरु की तरह हुई. उसके बाद जहांगीर ने भी न्याय के साथ राज किया और उसी परंपरा को शाहजहां ने भी निभाया. इसलिए इन बादशाहों को जीते जी यश और मरने के बाद भी कीर्ति हासिल हुई. वे औरंगज़ेब को याद दिलाते हैं कि वे अपने इन महान पुरखों की राह पर नहीं चल रहे हैं.

इतिहासकार बीएन लूनिया अपने ग्रंथ ‘मराठा प्रभुत्व’ में लिखते हैं कि शिवाजी ने मज़दूरों के लिए एक लाख रुपये का स्थायी कोष बनाया था, ताकि मज़दूरों को मज़दूरी का भुगतान हर हाल में सुनिश्चित हो सके. शिवाजी के इस तरह के जनकल्याणकारी शासन प्रबंध की वजह से आम लोगों को यह लगता था कि शिवाजी का राज उनका अपना राज है. महाराष्ट्र में इस तरह की कई कहानियां प्रचलित हैं कि किस तरह आम लोग खुद को शिवाजी की सेना का सिपाही मान कर उनकी ख़ातिर मरने को भी तैयार रहते थे.

शिवाजी बहुत धार्मिक व्यक्ति थे. समर्थ रामदास उनके गुरु थे और रामदास के कई पद शिवाजी को संबोधित हैं. इतिहास की किताबों में ज़िक्र आता है कि जब शिवाजी रामदास के मठ में जाते थे तो आम शिष्यों की तरह ही रहते थे. उनके शिष्यों के साथ वे भिक्षा मांगने भी जाते थे. रामदास के मठ में नियम था कि रोज़ एक शिष्य को कीर्तन करना होता था और उसमें एक स्वरचित पद भी सुनाना होता था. शिवाजी ने भी इसी तरह कीर्तन किया था और एक स्वरचित पद सुनाया था.

शिवाजी धार्मिक थे, लेकिन वे संकीर्ण नहीं थे. न ही अंधविश्वासी थे. वे सभी धर्मों का आदर करते थे. जिन समकालीन संतों को वे गुरुवत मानते थे उनमें सूफ़ी संत बाबा याकूत भी थे. शिवाजी धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करते थे. उनके राज्य में बड़े पदों पर मुस्लिम धर्मावलंबी भी थे. जब वे अफ़ज़ल खान से मिलने प्रतापगढ़ जा रहे थे तो उनके दस क़रीबी अंगरक्षकों में तीन मुस्लिम थे. उनके आठ मंत्रियों में परराष्ट्रसचिव मुल्लाहैदर थे जिन पर दूसरे राज्यों से रिश्तों की ज़िम्मेदारी थी.

शिवाजी के एक फ़रमान में लिखा हुआ है - हर किसी को अपना धर्म पालन करने की आज़ादी है. इसके बारे में कोई बखेड़ा न किया जाए. शिवाजी का सख़्त आदेश था कि किसी भी सैनिक मुहिम में किसी भी धर्म के धर्मस्थल या धार्मिक पुस्तक को क्षति नहीं पहुंचनी चाहिए. अगर किसी सैनिक को कोई धार्मिक पुस्तक मिलती है तो उसे सम्मान उस धर्म के किसी व्यक्ति के पास पहुंचा दिया जाए. लूनिया लिखते हैं - प्रसिद्ध मुस्लिम इतिहासकार खाफी खान ने भी जो शिवाजी का प्रमुख आलोचक था, उनकी धार्मिक उदारता, सहिष्णुता और धर्मनिरपेक्षता की प्रशंसा की है. उसने अपने ग्रंथ ‘मुन्तखब उल लुवाब’ में लिखा है कि ‘उसका (शिवाजी का) यह नियम था कि जहां भी उसके अनुयायी लूट करने जाते थे तो वे किसी मस्जिद को क्षति नहीं पहुंचाते थे, क़ुरान का अपमान नहीं करते थे और किसी भी स्त्री का अपमान नहीं करते थे.’ युद्ध भूमि में मृत मुसलमानों का उनके धर्म और समाज के अनुसार अंतिम संस्कार किया जाता था. औरंगज़ेब को लिखी चिट्ठी में शिवाजी याद दिलाते हैं कि क़ुरान जिस ईश्वर ने दी वह सिर्फ़ मुसलमानों का नहीं बल्कि सारी दुनिया का ईश्वर है, इसलिए धर्म के आधार पर भेदभाव करना ईश्वर की वाणी के ख़िलाफ़ जाना है.

इतिहासकार ग्रैंट डफ़ और जदुनाथ सरकार ने भी इस बात का ज़िक्र किया है कि शिवाजी धर्म के मामले में बहुत उदार थे. मुस्लिम शासकों द्वारा मुस्लिम धर्मस्थलों को जो अनुदान दिया गया था उसे उन्होंने अपने राज में भी जारी रखा. वे अपने अभियानों के दौरान हिंदू धर्मस्थलों के साथ साथ मुस्लिम धर्मस्थलों को भी धर्मादा देते थे.

शिवाजी के राज की एक प्रमुख विशेषता थी स्त्रियों का सम्मान. यह ज़िक्र पहले भी हो चुका है कि शिवाजी के सैनिक किसी सैनिक अभियान में किसी स्त्री का अपमान नहीं करते थे. दुश्मन की स्त्रियों को भी सम्मान उनके किसी संबंधी के पास पहुंचा दिया जाता था. जब तक कोई संबंधी नहीं मिलता तब तक स्त्रियों की देखभाल करना भी कर्तव्य में शामिल था. ऐसी कई कहानियां हैं कि शिवाजी ने किसी बड़े जागीरदार या सेनानायक को किसी ग़रीब किसान की बहू-बेटी के साथ बलात्कार करने के लिए अत्यंत कठोर सज़ा दी.यह कहानी तो अत्यंत प्रसिद्ध है कि कल्याण पर विजय के बाद कल्याण के सूबेदार की बहू को पकड़ कर शिवाजी के दरबार में लाया गया. बताया जाता था कि उसकी सुंदरता के बहुत चर्चे थे. शिवाजी ने उससे कहा - हमारी माता ऐसी सुंदर होती तो हम भी सुंदर होते. और सम्मान स्वरूप उसे वस्त्राभूषण देकर वापस अपने परिजनों के पास भेज दिया.

अब शायद हम समझ सकते हैं कि क्या शिवाजी के नाम पर शोर मचाने वाले लोग क्या शिवाजी की परंपरा के हक़दार हैं?