दुनिया के महान नेताओं में शायद ही कोई होगा जिसने मैग्ना कार्टा न पढ़ा हो. महात्मा गांधी ने 1914 में इंडियन ओपीनियन में प्रकाशित अपने एक लेख में दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों को रियायत देने वाले एक कानून की तुलना मैग्ना कार्टा से की थी. इस कानून के तहत भारतीयों को दक्षिण अफ्रीकी सरकार द्वारा उनकी तर्कसंगत इच्छाओं के सम्मान का अधिकार दिया गया था. वहीं 1963-64 में नेल्सन मंडेला ने भी अदालत में रंगभेद के खिलाफ अपना पक्ष रखते हुए मैग्ना कार्टा में मौ़जूद मानवाधिकारों का जिक्र किया था.

आज इस ऐतिहासिक दस्तावेज को 802 साल पूरे हो गए हैं. 15 जून, 1215 को पश्चिमी लंदन में थेम्स नदी के किनारे रनीमीड नामक जगह पर ब्रिटेन के तत्कालीन राजा किंग जॉन और उनके सामंतों (राजा के प्रतिनिधि जिन्हें ब्रिटेन में बैरन कहा जाता था.) के बीच इस पर सहमति बनी थी. हालांकि यह दस्तावेज मूल रूप से सामंतों को ज्यादा अधिकार देने के उद्देश्य से तैयार किया गया था लेकिन इसमें पहली बार औपचारिक तौर पर तय हुआ कि कानून ही सर्वोच्च है और राजा को भी उसके अंदर रहकर काम करना पड़ेगा.

जब मैग्ना कार्टा ब्रिटेन में लागू हुआ तो कोई भी यह मानकर नहीं चल रहा था कि यह ऐतिहासिक दस्तावेज साबित होने जा रहा है. किंग जॉन ने एक महीने बाद ही इसे खारिज कर दिया

मैग्ना कार्टा ब्रिटेन में जिन परिस्थितियों में अस्तित्व में आया वे भी काफी दिलचस्प है. किंग जॉन ने अपने कार्यकाल के दौरान राजा के अधिकारों का इतना दुरुपयोग कर रहे थे कि वहां सामंत से लेकर पोप तक उनसे बेहाल हो गए थे. किंग जॉन को 1199 ईसवी में ब्रिटेन की सत्ता मिली थी लेकिन इसके तीन-चार साल बाद ब्रिटेन और फ्रांस के बीच लड़ाई छिड़ गई. इससे देश की आर्थिक दशा बिगड़ने लगी जिसकी वजह से किंग जॉन ने करों में भारी वृद्धि कर दी. सामंतों ने जब इसके खिलाफ आवाज उठाई तो बर्बर तरीके से उनका दमन किया जाने लगा. इन कदमों से जनता में राजा के प्रति नाराजगी बढ़ने लगी. लेकिन अभी-भी ऐसा नहीं हुआ था कि जनता विद्रोह कर दे. जल्दी ही किंग जॉन के एक कदम से ऐसा भी हो गया. उन्होंने पोप के सुझाए प्रतिनिधि को कैंटबरी का आर्कबिशप बनाने से मना कर दिया. अब धार्मिक समाज भी राजा के खिलाफ हो गया. इसके बाद सामंतो ने किंग जॉन के खिलाफ विद्रोह कर दिया.

ब्रिटेन के राजा के पास इसके सिवाय कोई चारा नहीं था कि वह संधिपत्र पर हस्ताक्षर करे और सामंतों की बात मान ले. यही संधि पत्र मैग्ना कार्टा कहलाता है. 4000 शब्दों के इस दस्तावेज में पहली बार औपचारिक रूप से कहा गया कि राजा को भी देश के कानून के दायरे में रहना पड़ेगा. मैग्ना कार्टा की सबसे चर्चित धारा के मुताबिक राजा के पास न्याय को प्रभावित करने का अधिकार नहीं होगा और वह किसी भी ‘स्वतंत्र व्यक्ति’ को गैरकानूनी सजा से बचाएगा. इसके प्रावधानों ने सुनिश्चित किया कि किसी भी व्यक्ति को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में नहीं किया जा सकता और उसे निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार है.

इस समय 1215 ईसवी वाले मैग्ना कार्टा की कुल चार मूल प्रतियां सुरक्षित हैं. इनमें दो ब्रिटिश लायब्रेरी में रखी गई हैं और एक-एक लिंकन और सॉल्ज़ब्रे कथीड्रल में

जब मैग्ना कार्टा ब्रिटेन में लागू हुआ तो कोई भी यह मानकर नहीं चल रहा था कि यह ऐतिहासिक दस्तावेज साबित होने जा रहा है. किंग जॉन ने ही एक महीने बाद इसे खारिज कर दिया था. इसके बाद सामंतों के आग्रह पर फ्रांस के प्रिंस लुई ने ब्रिटेन पर हमला बोल दिया. कुछ महीनों बाद ही किंग जॉन की मृत्यु हो गई और उनके नौ साल के बेटे हेनरी (तृतीय) को राजगद्दी सौंपी गई. इस सत्ता हस्तांतरण के साथ ही मैग्ना कार्टा दोबारा लागू हो गया. इसके बाद बने ब्रिटेन के हर एक राजा ने मैग्नाकार्टा के प्रावधानों को लागू किया. इसके साथ ही इनमें संशोधन भी होते रहे. इस समय 1215 ईसवी वाले मैग्ना कार्टा की कुल चार मूल प्रतियां सुरक्षित हैं. इनमें दो ब्रिटिश लायब्रेरी में रखी गई हैं और एक-एक लिंकन और साल्ज़ब्रे कथीड्रल में.

विभिन्न देशों के संविधान निर्माण में मैग्ना कार्टा के प्रावधानों को बुनियादी सिद्धांतों की तरह इस्तेमाल किया गया है. माना जाता है कि अमेरिकी संविधान पर भी मैग्नाकार्टा का खासा प्रभाव है. वहीं पूरे विश्व में मानवाधिकारों को सुनिश्चित करने वाली संयुक्त राष्ट्र की यूनिवर्सल डेक्लेरेशन ऑफ ह्यूमन राइट्स की प्रेरणा भी मैग्नाकार्टा ही है.