जीसैट-6ए, भारत का नवीनतम संचार उपग्रह. आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा से इसे 29 मार्च को अंतरिक्ष में छोड़ा गया. लेकिन महज़ दो दिन बाद ही भारतीय अंतरिक्ष अनुंसाधन संगठन (इसरो) से इसका संपर्क टूट गया. इसरो ने ख़ुद इसकी पुष्टि की है. हालांकि संगठन के वैज्ञानिक यह दावा भी कर रहे हैं कि वे इस उपग्रह से फिर संपर्क स्थापित करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं. लेकिन सवाल उठता है कि क्या उपग्रह से फिर संपर्क स्थापित कर पाना संभव है?

इस सवाल का जवाब जानने के लिए डेक्कन क्रॉनिकल ने कुछ वरिष्ठ वैज्ञानिकों से बात की. इन वैज्ञानिकों ने अख़बार को अपनी राय तो दी लेकिन नाम न छापने की शर्त पर. और इनकी राय ये रही कि जीसैट-6ए से संपर्क स्थापित कर पाना अब क़रीब-क़रीब नामुमकिन है. उनके मुताबिक तमाम उपग्रहों पर नज़र रखने वाली दुनिया की सबसे शक्तिशाली संस्था- नॉर्थ अमेरिकन एयरोस्पेस डिफेंस कमांड (नोआर्ड) भी अब तक जीसैट-6ए को ढूंढ नहीं पाई है. इसका मतलब यही है कि उपग्रह अंतरिक्ष में कहीं गुम हो गया है.

ये वैज्ञानिक इस घटनाक्रम को सरल शब्दों में कुछ यूं समझाते हैं कि जैसे ‘किसी फोन की बैटरी डैड हो जाए तो फिर उससे संपर्क स्थापित नहीं किया जा सकता. ठीक ऐसे ही जीसैट-6ए के मामले में हुआ है क्योंकि वह धरती से भेजे जा रहे कमांड पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रहा है. वह ‘स्विच ऑफ़ मोड’ पर चला गया है. लगता है जैसे उपग्रह के इलेक्ट्रॉनिक्स तंत्र का बैटरियाें या सोलर पैनल से संपर्क पूरी तरह टूट चुका है. इसीलिए कहा जा सकता है कि मिशन को असफल घोषित करने में अब सिर्फ़ औपचारिकता बाकी रह गई है.’

इसके साथ ही ये वैज्ञानिक तीन दशक पहले इनसैट-1सी की असफलता का वाक़या भी याद दिलाते हैं. उनके मुताबिक उस वक़्त भी इसी तरह की स्थिति बनी थी और मिशन नाक़ामयाब हो गया था. हालांकि वे यह भी जोड़ते हैं कि इस असफलता का मतलब यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि इसरो के भविष्य के प्रक्षेपण अभियानों पर कोई बड़ा असर पड़ेगा अलबत्ता इससे संगठन की प्रतिष्ठा को धक्का ज़रूर लगा है.