अगले साल आम चुनाव से पहले मोदी सरकार के लिए मानसून को लेकर राहत भरी खबर है. मौसम की जानकारी देने वाली निजी संस्था स्काईमेट के बाद मौसम विभाग ने भी कहा है कि इस साल मानसून सामान्य रहेगा. औसतन 96 से 104 फीसदी बारिश को सामान्य मानसून कहा जाता है. इससे ज्यादा या कम बारिश होने पर मानसून को सामान्य से अधिक या कम रिकॉर्ड किया जाता है.

आम तौर पर मानसून के अच्छा होने को किसान और देश की अर्थव्यवस्था के लिए बेहतर माना जाता है. यह भी कहा जाता है कि चुनावी साल में अच्छा या खराब मानसून सत्ता पक्ष और विपक्ष की नियति को भी बना या बिगाड़ सकता है. हालांकि, साल 2016 से सरकार और किसानों के साथ मानसून की यह खबर फसल बीमा करने वाली कंपनियों के लिए भी अच्छी मानी जा रही है. इस साल सरकार और किसान अच्छे मानसून में भीगने के बाद बेहतर महसूस कर सकेंगे या नहीं, यह तो पक्के तौर पर कहा नहीं जा सकता, लेकिन, फसल बीमा कंपनियों की बैलेंस शीट पर हरियाली छानी तय मानी जा रही है.

2016 में खेतों में खरीफ की फसल की रोपाई के साथ ही मोदी सरकार ने प्रधानमंत्री कृषि फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) की शुरुआत की थी. इस योजना को पहले से चल रही राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना की जगह लाया गया था. इसके तहत उन आपदाओं के दायरे में विस्तार किया गया जिनसे फसल को नुकसान पहुंचता है. साथ ही, खरीफ की फसलों के मामले में किसानों के लिए बीमाकृत राशि की दो फीसदी जबकि रबी फसलों के लिए डेढ़ फीसदी प्रीमियम की दर रखी गई. इनके अलावा बागवानी वाली फसलों के लिए यह दर पांच फीसदी तय की गई. बचे प्रीमियम में केंद्र और राज्यों को भी 50-50 फीसदी अपना हिस्सा देना होता है.

लेकिन 2017 में चर्चित संस्था सेंटर फॉर साइंस एंड एनवॉयरमेंट (सीएसई) द्वारा प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना पर जारी रिपोर्ट की मानें तो इस योजना में किसानों का भरोसा टूटता दिखता है. इस रिपोर्ट में कहा गया था कि योजना में बैंकों की सक्रियता और किसानों की संख्या तो बढ़ी है पर किसानों को फायदा मिल पाना दूर की कौड़ी रहा है. इस साल के आंकड़े भी इस योजना में किसानों के कम होते भरोसे की पुष्टि करते दिखते हैं. साल 2017-18 में इस योजना के तहत आने वाले रकबे में कमी दर्ज की गई. बीते वित्तीय वर्ष के लिए कुल 40 फीसदी खेतों को इसके दायरे में लाने का लक्ष्य तय किया गया था, लेकिन जमीन पर यह आंकड़ा 24 फीसदी रहा. इससे पहले साल 2016-17 में यह 30 फीसदी रहा था. सरकार ने चालू वित्तीय वर्ष के लिए इस आंकड़े को 50 फीसदी तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है.

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत बैंक से कर्ज लेने वाले किसानों के लिए फसल बीमा योजना लेना अनिवार्य है. इसके खिलाफ बीते पखवाड़े राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से संबंधित संगठन भारतीय किसान संघ (बीकेएस) ने गुजरात हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की है. इसमें संघ ने मीडिया रिपोर्ट्स का हवाला देकर कहा है कि अब तक सरकार बीमा कंपनियों को 10,000 करोड़ रुपये से अधिक दे चुकी है, इसके बावजूद किसानों द्वारा फसल नुकसान को लेकर किए गए दावों का निपटारा नहीं किया जाता. इस याचिका में यह भी कहा गया है कि बीते साल देश के कई इलाकों में आई बाढ़ के बाद कंपनियां खेती को हुए नुकसान के आकलन के लिए प्रभावित इलाके में नहीं पहुंची थीं. इस पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने राज्य सरकार से तीन हफ्ते में जवाब मांगा है.

बजट में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के लिए आवंटित रकम | साभार : सीजीबीए
बजट में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के लिए आवंटित रकम | साभार : सीजीबीए

केंद्र सरकार ने चालू वित्तीय वर्ष (2018-19) के बजट में इस योजना के लिए 44 फीसदी बढ़ोतरी कर 13,000 करोड़ रुपये आवंटित करने की बात कही है. 2017-18 में यह आंकड़ा 9,000 करोड़ रुपये था. इससे पहले साल 2016-17 में इसके लिए 5500 करोड़ रुपये रखे गए थे. सीएसई रिपोर्ट की मानें तो इस योजना के चलते सरकारों की तिजोरी से पैसे भी निकले हैं और किसानों की जेब भी ढीली हुई. लेकिन, इससे किसानों को राहत मिलने की जगह निजी बीमा कंपनियों के खातों में ही हरियाली छाई हुई दिखती है. इस बार मानसून अच्छा रहे और बाढ़ न आए तो बीमा क्लेम न आने के चलते इस हरियाली का रंग और भी गहरा हो सकता है.

सीएसई की रिपोर्ट बताती है कि साल 2016 में खरीफ की फसल (जून-नवंबर) के दौरान प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत अनुबंधित कंपनियों ने करीब 10,000 करोड़ रुपये का लाभ कमाया था. दूसरी ओर, बीमा कंपनियों द्वारा निपटाए गए दावों का आंकड़ा करीब 32 फीसदी ही रहा था. इसके अलावा अप्रैल, 2017 तक 21 में से 14 राज्यों में खरीफ की फसल को पहुंचे नुकसान के लिए किए गए दावों का पूरा निपटारा नहीं किया गया था. इस दौरान किसानों ने कुल 5,962 करोड़ रुपये का दावा किया था. दूसरी ओर, कंपनियों ने प्रीमियम के रूप में किसानों और सरकारों से कुल 15,891 करोड़ रुपये हासिल किए थे. बताया यह भी जाता है कि बीमा कंपनियों ने खरीफ की फसल के दौरान केंद्र और राज्य सरकारों के साथ-साथ किसानों से भी बीमा प्रीमियम की काफी ऊंची दरें वसूली हैं.

सीएसई के साथ नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (सीएजी) की एक रिपोर्ट भी इन बातों पर मुहर लगाती दिखती है. यह रिपोर्ट साल 2011 से 2016 के बीच फसल बीमा योजनाओं के ऑडिट के आधार पर तैयार की गई है. इसके मुताबिक सर्वे में शामिल 6,000 किसानों में से 67 फीसदी को सरकार द्वारा चलाई जा रही फसल बीमा योजनाओं के बारे में जानकारी नहीं है. साथ ही, इन योजनाओं में सीमांत और छोटे किसानों (जिनके पास पांच एकड़ से कम खेती हो) की हिस्सेदारी भी काफी कम है.

इस रिपोर्ट में सबसे बड़ी बात जो कही गई है वह यह है कि इस अवधि के दौरान एग्रीकल्चर इंश्योरेन्स कंपनी ऑफ इंडिया (एआईसी) ने प्रावधानों का पालन किए बिना ही 10 निजी बीमा कंपनियों को 3,622 करोड़ रुपये जारी कर दिए. साथ ही, कई बार न सिर्फ फसलों के रकबे और बीमा दावों के आंकड़ों में अंतर पाया गया बल्कि एक ही फसल के लिए दो से तीन बार दावे भी किए गए और फिर मुआवजे की उगाही की गई. इसके अलावा सीएजी ने सरकारों के साथ-साथ एआईसी के पास भी बीमा योजनाओं के दायरे में आने वाले किसानों के आंकड़े उपलब्ध नहीं होने, नियामक तंत्र के अभाव और शिकायत केंद्रों के न होने पर भी चिंता जाहिर की है.

इससे पहले बीते साल जब इस योजना की रूप-रेखा सामने आई थी तो उस वक्त सरकारी बीमा कंपनियों की जगह निजी क्षेत्र को वरीयता देने पर सवाल उठाए गए थे. शुरुआत में इस योजना के तहत जिन 11 कंपनियों को जोड़ा गया उनमें से सिर्फ एग्रीकल्चर इंश्योरेन्स कंपनी ऑफ इंडिया ही पूरी तरह से सरकारी थी. इसकी भूमिका भी सरकार और निजी बीमा कंपनियों के बीच की एक कड़ी के रूप में सीमित कर दी गई. इसका काम सरकार से एकमुश्त पैसे लेकर कंपनियों को देना होता है. हालांकि, अब सरकारी कंपनियों की संख्या बढ़कर पांच और निजी कंपनियों की संख्या 13 हो गई है. इसके अलावा केंद्र ने राज्यों को इस योजना के लिए अपनी ओर से कंपनी बनाने का अधिकार दे दिया है. इससे पहले केंद्रीय कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा राज्यों को जारी दिशा-निर्देशों में कहा गया था कि उन्हें योजना के लिए इन्हीं कंपनियों में से किसी का चयन करना होगा.

उधर, बीते साल मोदी सरकार ने इससे इनकार किया था कि इस योजना के तहत निजी बीमा कंपनियों को किसी तरह का अनुचित फायदा पहुंचाया गया है. सरकार का कहना है कि बीते खरीफ और रबी मौसम के सामान्य रहने की वजह से बीमा दावे के मामले कम संख्या में आए हैं. माना जा रहा है कि अगर इस साल भी मानसून सामान्य या अच्छा रहता है तो एक बार फिर निजी बीमा कंपनियों की पांचों उंगलियां घी में रहने वाली हैं.