सलमान खान जितने चर्चित अभिनेता हैं, लगभग उतने ही विवादित भी हैं. कभी वे आपराधिक मामलों में फंसने के चलते विवादों में घिरते हैं तो कभी उन मामलों से बच निकलने के चलते. इस बार काला हिरण के शिकार के मामले में जोधपुर की एक अदालत ने उन्हें पांच साल जेल की सजा सुनाई है. उन पर 10 हजार रु का जुर्माना भी लगाया गया है. अदालत ने इस मामले से जुड़े अन्य आरोपितों - अभिनेता सैफ अली खान, अभिनेत्री तब्बू, सोनाली बेंद्र और नीलम - को बरी कर दिया है.

काले हिरण के शिकार का यह मामला अक्टूबर 1998 का है. तब ये फिल्मी सितारे फिल्म ‘हम साथ-साथ हैं’ की शूटिंग के लिए जोधपुर आए हुए थे. उस दौरान सलमान खान पर काले हिरण और चिंकाराओं का शिकार करने के आरोप लगे थे. इन आरोपों के चलते 1998 में सलमान खान के खिलाफ कुल चार मुकदमे दर्ज हुए थे. इनमें से दो मुकदमे भवाद और मथानिया नाम के गांवों में तीन चिंकाराओं का शिकार करने के थे. इन मामलों में निचली अदालत ने सलमान खान को कुल छह साल की सजा सुनाई थी. लेकिन 2016 में उच्च न्यायालय ने उन्हें इन दोनों मामलों में बरी कर दिया है.

इनके अलावा उन पर जो दो और मामले दर्ज हुए थे उनमें आरोप था कि सलमान खान ने 1-2 अक्टूबर 1998 की रात कांकाणी गांव में दो काले हिरणों (कृष्ण मृगों) का शिकार किया है. इसके लिए उन पर दो अलग-अलग मुक़दमे दर्ज हुए. एक मुकदमा वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत दर्ज हुआ जिसमें उन्हें अब पांच साल की सजा सुनाई गई है. सलमान खान के ऊपर इसी मामले में दूसरा मुकदमा एआरएम या आर्म्स एक्ट के तहत दर्ज हुआ था. इस दूसरे मामले में 18 जनवरी 2017 को सलमान खान को बरी कर दिया गया था. लेकिन अगर इस मामले में आए फैसले को विस्तार से देखें तो आसानी से समझ में आ जाता है कि इसमें न तो जांच ठीक से हुई थी और न अदालती कार्यवाही.

जांच के नाम पर मजाक

आर्म्स एक्ट के तहत दर्ज मामले में सीजेएम दलपतसिंह राजपुरोहित ने इसके लिए कुल 102 पन्नों का फैसला लिखवाया था. इस फैसले के पेज नंबर दो पर अभियोजन पक्ष के आरोपों का जिक्र मिलता है. इसके अनुसार 2 अक्टूबर, 1998 के दिन जोधपुर के कांकाणी गांव के रहने वाले दो लोगों ने एक लिखित शिकायत वन विभाग के कर्मचारियों को दी थी. छोगाराम और पूनमचंद नाम के इन ग्रामीणों ने शिकायत पत्र में लिखा था कि 1-2 अक्टूबर की रात सलमान खान और उनके साथियों ने दो कृष्ण मृगों (काले हिरणों) का शिकार किया और गांव वालों के जागने पर वे अपने साथियों के साथ ही वहां से भाग गए.

वन विभाग के अधिकारियों को जब यह शिकायत पत्र मिला तो उन्होंने कुछ प्राथमिक जांच की और फिर थाना लूणी के थानाधिकारी को इस संबंध में एक लिखित रिपोर्ट भेजी. इसी रिपोर्ट के आधार पर सलमान खान के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज हुआ और जांच शुरू हुई. इस जांच के दौरान सामने आया कि सलमान खान ने अपने लाइसेंसी हथियार कुछ साथियों के हाथ वापस मुंबई भिजवा दिए थे. अधिकारियों के कहने पर ये हथियार मुंबई से वापस जोधपुर मंगवाए गए. इस दौरान सलमान खान जोधपुर पुलिस की हिरासत में ही थे.

मुंबई से वापस जोधपुर लाए गए इन हथियारों में एक .22 बोर की राइफल थी और एक .32 बोर की रिवाल्वर. इन दोनों हथियारों का लाइसेंस सलमान खान के नाम पर ही था लेकिन उसे रिन्यू नहीं किया गया था जिसकी अंतिम तिथि 22 सितंबर 1998 को ही समाप्त हो चुकी थी. सलमान खान जब जोधपुर आए थे तो ये हथियार उनके पास थे और शिकार का मामला चर्चित होने के बाद उन्होंने इन्हें वापस मुंबई भिजवा दिया था, यह साबित करने के लिए अभियोजन पक्ष ने एक किस्से का जिक्र आरोपपत्र में किया है.

आरोपपत्र के अनुसार शिकार की घटना से कुछ दिन पहले सलमान खान की रिवाल्वर गुम हो गई थी. यह 29 सितंबर की बात है. उस दिन सलमान खान लूणी हवेली में फिल्म की शूटिंग कर रहे थे. सलमान खान ने रिवाल्वर गुम होने की जानकारी सबसे पहले पुलिस निरीक्षक सत्यमणि तिवारी को दी जो फिल्म की यूनिट के साथ ही पिछले कुछ दिनों से ड्यूटी पर थे. सत्यमणि तिवारी ने इस बारे में जोधपुर पुलिस अधीक्षक को बताया जिन्होंने उन्हें शिकायत दर्ज करने के आदेश दिए.

आरोपपत्र में आगे लिखा है कि रिवाल्वर गुम हो जाने संबंधी मुकदमा दर्ज करने से पहले सत्यमणि तिवारी ने तसल्ली के लिए उम्मेद भवन के कमरा नंबर 508 की तलाशी लेना उचित समझा. इसी कमरे में सलमान खान ठहरे थे. यह तलाशी होटल के मेनेजर, सिक्यूरिटी ऑफिसर और रूम असिस्टेंट के सामने ली गई. तलाशी के दौरान इस कमरे से एक राइफल और एक एयरगन मिली. रिवाल्वर इस कमरे में नहीं थी लेकिन सत्यमणि तिवारी जब कमरे से ही सटे बाथरूम में पहुंचे तो वहां उन्हें एक बेडकवर रखा दिखा जिसे खोलने पर उसके अंदर से रिवाल्वर निकल आई.

इस घटना को आधार बनाते हुए पुलिस ने आरोपपत्र में लिखा कि सलमान खान हथियार लेकर जोधपुर आए थे. सलमान खान ने इन हथियारों का प्रयोग करते हुए 1-2 अक्टूबर की रात काले हिरण का शिकार किया था, यह साबित करने के लिए अभियोजन पक्ष ने कुल 20 लोगों को गवाह बनाया और कुल 61 दस्तावेज बतौर साक्ष्य अदालत में जमा किये. लेकिन जब इस मामले में जिरह शुरू हुई तो अभियोजन के आरोप पल भर को भी ठहर नहीं पाए और पूरा मामला सलमान खान के पक्ष में चला गया. ऐसा क्यों हुआ, इसे उन भारी कमियों और लापरवाहियों से समझा जा सकता है जो अभियोजन ने जांच और जिरह के दौरान की थी.

पुलिस का आरोप था कि सलमान खान ने शिकार के बाद हथियारों को अपने साथियों द्वारा मुंबई भिजवा दिया था. लेकिन वे साथी कौन थे, इस बारे में पुलिस ने कोई जांच ही नहीं की. वे साथी कभी पेश ही नहीं किये गए. साथ ही जिन ग्रामीणों को एफआईआर में घटना का प्रत्यक्षदर्शी बताया गया है, उन लोगों को कभी न्यायालय में पेश ही नहीं किया गया. ऐसे में अभियोजन की तरफ से सिर्फ सत्यमणि तिवारी ही एक मात्र ऐसे गवाह थे जिन्होंने यह गवाही दी कि जोधपुर में सलमान खान के पास ये हथियार थे और उन्होंने खुद इन हथियारों को देखा था. लेकिन सत्यमणि की गवाही भी न्यायालय में टिक नहीं सकी क्योंकि जिन तीन लोगों के सामने उन्होंने सलमान खान के कमरे की तलाशी ली थी, उनमें से कोई भी अभियोजन की तरफ से गवाही के लिए पेश नहीं हुआ. उल्टा उन तीन में से एक होटल कर्मचारी सलमान खान की तरफ से ही गवाही देने के लिए न्यायालय पहुंचा और उसने अदालत को बताया कि सलमान खान के कमरे की कभी कोई तलाशी ही नहीं हुई थी.

सत्यमणि तिवारी की गवाही को न्यायालय ने इसलिए भी संदेह से देखा क्योंकि उनकी गवाही के अनुसार उन्होंने 29 सितंबर को सलमान खान के लाइसेंस को देखा था. यानी उन्हें तभी यह भी मालूम चल गया था कि सलमान खान के हथियारों के लाइसेंस की वैधता 22 सितंबर को समाप्त हो चुकी है. ऐसी स्थिति में एक पुलिस अधिकारी होने के नाते उन्हें सलमान खान के खिलाफ तभी कार्रवाई करनी चाहिए थी. चूंकि उन्होंने कोई भी लिखित कार्रवाई नहीं की इसलिए न्यायालय ने माना कि उनकी गवाही को संदेह से परे नहीं माना जा सकता.

अभियोजन ने यह भी आरोप लगाया था कि सलमान खान ने इंडियन एयरलाइन्स के जरिये हथियार मुंबई भिजवाए थे. लेकिन यह साबित करने के लिए अभियोजन ने न तो कोई टिकट और न ही एयरलाइन्स से जुड़ा कोई अन्य दस्तावेज न्यायालय में पेश किया. साथ ही पूरी जांच के दौरान जांचकर्ताओं ने न तो कभी मौके का दौरा किया और न ही कभी घटनास्थल के निरीक्षण से जुडी कोई रिपोर्ट बनाकर न्यायालय में पेश की. मौके से किसी भी तरह के बन्दूक के छर्रे या गोलियां कभी बरामद ही नहीं की गई. इसके अलावा जिन 20 गवाहों को अभियोजन की ओर से न्यायालय में पेश किया गया, उनके बयानों को न्यायालय ने अधूरा और विरोधाभासी मानते हुए विश्वसनीय नहीं माना.

अदालत में मजाक

सिर्फ अभियोजन की बड़ी गलतियां ही सलमान खान के पक्ष में नहीं गई बल्कि उनकी कई छोटी-छोटी गलतियों का भी पूरा फायदा सलमान खान को बड़े अजीबोगरीब तरीके से अदालत में मिला. कहा तो यहां तक जा सकता है कि सलमान खान के बच निकलने के जो रास्ते अभियोजन पक्ष नहीं खोल पाया था वे न्यायालय ने उनके लिए स्वयं ही खोल दिए.

सीजेएम दलपतसिंह राजपुरोहित ने सलमान खान पर चले आर्म्स एक्ट से जुड़े मामले में फैसला देते हुए लिखा है कि इस मामले में अदालत के सामने तीन मुख्य सवाल थे:

1. क्या सलमान खान ने 1-2 अक्टूबर, 1998 की रात कांकाणी गांव में रिवाल्वर एस एंड डब्ल्यू .32 बोर नंबर (87011) और राइफल .22 बोर (नंबर 2118) को बिना वैध लाइसेंस के अपने कब्जे में रखकर आर्म्स एक्ट की धारा 3/25 का उल्लंघन किया है?

2. क्या सलमान खान ने बिना वैध लाइसेंस के कब्जे में रखे हथियारों को उस रात शिकार के लिए प्रयोग कर आर्म्स एक्ट की धारा 27 का उल्लंघन किया है?

3. यदि हां, तो इसका उचित दंड क्या हो?

इन तीन सवालों के जवाब तलाशते हुए जब न्यायालय ने ‘अभियोजन स्वीकृति’ पर चर्चा शुरू की, तो यह मामला बेहद दिलचस्प हो गया. जब भी किसी व्यक्ति के खिलाफ आर्म्स एक्ट की धारा 3 के अंतर्गत मुकदमा दर्ज किया जाता है तो उसके लिए ‘अभियोजन स्वीकृति’ लेना अनिवार्य होता है. यह अनुमति जिला मजिस्ट्रेट द्वारा दी जाती है. सलमान खान के खिलाफ भी आर्म्स एक्ट की धारा 3 लगाई गई थी. उस दौरान रजत कुमार मिश्रा जोधपुर के जिला कलेक्टर हुआ करते थे. उनके पास यह मामला अभियोजन स्वीकृति के लिए आया तो उन्होंने संबंधित पुलिस अधिकारियों से बात करने के बाद यह स्वीकृति जारी कर दी.

जब यह मामला न्यायालय पहुंचा तो सलमान खान के वकील ने तर्क दिया कि यह ‘अभियोजन स्वीकृति’ अवैध है क्योंकि इसे बिना सोचे-समझे जारी किया गया है. इस तर्क का जो आधार उनके वकील ने लिया और जिसे न्यायालय ने भी सही माना, वह बेहद दिलचस्प है. चूंकि यह मामला थाना लूणी, जोधपुर का था, तो इस स्वीकृति पत्र में सलमान और उनके पिता के नाम और पते के बाद यह थाना क्षेत्र भी दर्ज किया गया था. लेकिन न्यायालय ने माना कि, ‘उक्त अभियोजन स्वीकृति का अध्ययन करने से यह स्पष्ट प्रकट होता है कि यह अभियुक्त श्री सलमान खान पुत्र सलीम खान निवासी मुंबई, थाना लूणी, जिला जोधपुर के विरुद्ध जारी की गई. जबकि इस प्रकरण में जो अभियुक्त - सलमान खान – है, वह गैलेक्सी अपार्टमेंट, बांद्रा, मुंबई, महाराष्ट्र का निवासी है.’

इस कारण न्यायालय ने अपने फैसले में लिखा है कि अभियोजन स्वीकृति मुंबई, महाराष्ट्र के रहने वाले सलमान खान के विरुद्ध नहीं बल्कि किसी ‘मुंबई, पीएस लूणी, जिला जोधपुर के निवासी सलमान खान पुत्र सलीम खान के विरुद्ध जारी हुई.’ इस मामले की जांच करने वाले अधिकारी अशोक पाटनी - जो कि सरकारी गवाह भी थे - उन्होंने इस संबंध में अपनी मुख्य परीक्षा में कहा कि जिस व्यक्ति के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति जारी की गई थी वह थाना लूणी, जिला जोधपुर का ही निवासी था.

फैसले में यह भी लिखा गया है कि जब यह अभियोजन स्वीकृति जारी करने वाले तत्कालीन जिला कलेक्टर रजत कुमार मिश्रा से जिरह की गई तो उन्होंने ‘स्वीकार किया कि एक ही नाम के गांव कई राज्यों में हो सकते हैं. जैसे भटिंडा नाम की एक जगह थाना लूणी में भी है और पंजाब में भी.’ इसलिए न्यायालय ने माना कि ‘ऐसी स्थिति में अभियोजन स्वीकृति में अंकित ‘मुंबई’ थाना लूणी, जिला जोधपुर का कोई गांव नहीं हो, और महाराष्ट्र का ही हो, ऐसा कयास नहीं लगाया जा सकता.’ इन बातों के चलते न्यायालय ने माना कि मुंबई (महाराष्ट्र) वाले मशहूर एक्टर सलमान खान के खिलाफ तो अभियोजन स्वीकृति कभी जारी ही नहीं हुई थी.

इसी अभियोजन स्वीकृति से जुड़े कुछ और तथ्य भी बेहद दिलचस्प हैं. यह स्वीकृति दो हथियारों के लिए जारी की गई थी. रिवाल्वर 32 बोर और राइफल 22 बोर. ऐसे में न्यायालय ने माना कि यह सलमान खान से जुड़े हथियारों के लिए जारी नहीं हुई है क्योंकि सलमान खान के हथियार तो ‘रिवाल्वर .32 बोर और राइफल .22 बोर हैं, न कि 32 बोर और 22 बोर.’ यानी अभियोजन स्वीकृति में 32 और 22 के आगे बिंदी नहीं लगी थी. जब स्वीकृति जारी करने वाले रजत कुमार मिश्र से इस बारे में पूछा गया तो उनका कहना था कि वे ‘.22 बोर और 22 बोर में अंतर नहीं जानते.’ इसलिए न्यायालय ने माना कि ऐसे में यह विश्वास करना मुश्किल है कि यह स्वीकृति सलमान खान वाले हथियारों के लिए ही जारी हुई हो.

अदालत में जो हुआ उसका सारांश किया जाए तो वह कुछ इस तरह होगा : जब अधिकारियों ने सलमान खान के नाम, वल्दियत और पते के साथ ही घटना के थाना क्षेत्र का उल्लेख कर दिया तो न्यायालय को संदेह हो गया कि मुंबई नाम का कोई गांव जोधपुर के लूणी थाना क्षेत्र में भी हो सकता है. यह भी संदेह हुआ कि उस मुंबई गांव में कोई ऐसा सलमान खान रहता हो जिसके पिता का नाम भी सलीम खान ही हो. साथ ही जब हथियारों के बोर लिखने के दौरान अधिकारियों ने 32 और 22 से पहले बिंदी नहीं लगाई तो न्यायालय को संदेह हुआ कि ऐसे हथियार तो मुंबई वाले सलमान खान के पास हैं ही नहीं और ये किसी और के हथियार होंगे.