केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा ने देश की ऊपरी अदालतों में दलित, आदिवासी और पिछड़ी जातियों को उचित प्रतिनिधित्व न मिलने की शिकायत की है. टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक गुरुवार को उन्होंने कहा कि ऊपरी अदालतों में अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़ी जातियों के जज लगभग न के बराबर हैं. उपेंद्र कुशवाहा के मुताबिक एससी-एसटी एक्ट को लेकर सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के खिलाफ दलितों का विरोध स्वाभाविक है.

केंद्रीय मंत्री ने दलितों के भारत बंद को लेकर कहा कि देश के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ इस तरह का राष्ट्रव्यापी विरोध होना चिंता का विषय है. उनके मुताबिक इससे पता चलता है कि वे डरे हुए हैं. उपेंद्र कुशवाहा ने कहा, ‘सुप्रीम कोर्ट को सामने आना चाहिए और हमें बताना चाहिए कि गरीब परिवारों से निकले कितने लोग जज बने.’ मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक उनका यह भी कहना था कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्टों के अधिकांश पदों पर विशेष वर्ग के लोगों का ही कब्जा है और यह व्यवस्था बदलनी चाहिए. उन्होंने कहा कि न्यायपालिका में सभी वर्गों के उचित प्रतिनिधित्व के बिना परिवर्तन नहीं लाया जा सकता.

वहीं, उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (आरएलएसपी) ने भी गरीब और अल्पसंख्यकों के अलावा इन वंचित समुदायों को सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्टों में न्यायपूर्ण नेतृत्व देने के लिए दबाव बनाने की बात कही है. इसके लिए पार्टी 20 मई से ‘हल्ला बोल, दरवाजा खोल’ अभियान चलाएगी. केंद्र की एनडीए सरकार में भाजपा की साझेदार आरएलएसपी ने कहा कि न्यायपालिका लोकतंत्र का मजबूत स्तंभ है, लेकिन खुद उसके अंदर लोकतंत्र नहीं है.