यह 2013 की बात है. उस वक़्त मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव थे और भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी बुंदेलखंड के सागर, छतरपुर जैसे इलाकों में चुनाव रैलियां संबोधित करने आए थे. उन रैलियों में वे ख़ास ज़ोर देकर लोगों को बता रहे थे कि बुंदेलखंड पैकेज़ के तहत केंद्र सरकार से मिले पैसे का मध्य प्रदेश की शिवराज सरकार ने बेहतर इस्तेमाल किया है. इतना कि प्रधानमंत्री (उस वक़्त मनमोहन सिंह) भी उसकी तारीफ़ कर रहे हैं. तब नरेंद्र मोदी का कहना था, ‘लेकिन इसी पैकेज़ का पैसा उत्तर प्रदेश में कहां-कैसे ख़र्च हुआ कोई नहीं जानता.’

इसके बाद आया 2017. अब तक नरेंद्र मोदी को ख़ुद प्रधानमंत्री बने तीन साल होने वाले थे. अबकी उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव था. लेकिन वहां भी बुंदेलखंड को लेकर प्रधानमंत्री मोदी की टोन 2013 वाली ही थी. उत्तर प्रदेश की तरफ़ के बुंदेलखंड में हुई अपनी चुनावी रैलियों में वे शिवराज सरकार की ही पीठ थपथपा रहे थे. वहीं दूसरी तरफ वे प्रदेश की समाजवादी पार्टी सरकार पर लानतें भेज रहे थे कि वह बुंदेलखंड पैकेज़ का पैसा ठीक तरह से ख़र्च नहीं कर पाई.

ऐसे में स्वाभाविक तौर पर किसी की भी जिज्ञासा हो सकती है कि मध्य प्रदेश में हुए ‘तारीफ़ के काबिल’ इस काम को एक बार नज़दीक से देखना चाहिए. इसी जिज्ञासा ने ‘सत्याग्रह’ को प्रेरित किया और बुंदेलखंड की सूखती-दरकती ज़मीन और तपते पत्थरों के बीच शुरू हुई ज़मीनी पड़ताल. चार दिन और मध्य प्रदेश के हिस्से वाले बुंदेलखंड के छह में से पांच जिलों (दतिया को छोड़कर टीकमगढ़, छतरपुर, पन्ना, दमोह और सागर) के तमाम गांवों, कस्बों, शहरों से गुजरते हुए क़रीब 800 किलोमीटर का सफ़्रर. और इस मशक्कत भरी ज़मीनी पड़ताल से जो हक़ीक़त सामने आई वह आंखें खोलने वाली नहीं, डरा देने वाली थी - सरकारी तारीफ़ों से कोसों दूर.

इस पड़ताल पर आगे बढ़ने से पहले एक बार संक्षेप में बुंदेलखंड पैकेज़ से जुड़े कुछ जरूरी तथ्यों पर नज़र डाल लेते हैं. लगातार सूखा, पलायन, पेयजल संकट जैसी समस्याओं से जूझते बुंदेलखंड के लिए 2008-09 में केंद्र की तत्कालीन यूपीए (संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन) सरकार ने 7,600 करोड़ रुपए का पैकेज़ मंज़ूर किया था. इस पैसे में से 3,860 करोड़ रुपए मध्य प्रदेश के हिस्से में आए. इसके जरिए छह जिलों- सागर, छतरपुर, दमोह, पन्ना, टीकमगढ़ और दतिया में विभिन्न योजनाएं चलाई जानी थीं. इनके तहत स्थानीय ज़रूरतों के हिसाब से जल संरक्षण, फसलों की सिंचाई, रिहायशी बस्तियों में पेयजल, अनाज मंडियाें में विभिन्न सुविधाओं का बंदोबस्त किया जाना आदि तय हुआ.

लेकिन इस पैकेज़ का अधिकांश पैसा कुप्रबंधन, अनियमितता और बंदरबांट का शिकार हो गया. और इसका नतीज़ा यह रहा कि पैकेज़ मंजूर होने के नौ साल बाद भी बुंदेलखंड के हालात में कोई ख़ास अंतर नहीं आया है.

मध्य प्रदेश में हश्र क्या हुआ इसके तीन उदाहरण ही शायद काफ़ी हों

1. टीकमगढ़ जिले की हरपुरा नहर परियोजना एक मिसाल है. यह परियोजना दिसंबर 2012 में बनी. लागत थी 41.33 करोड़ रुपए. फिर बढ़कर हो गई 60.91 करोड़ रुपए. देश में संभवत: पहली बार ऐसी किसी परियोजना में नदी (जामुनी) के पानी को नहर के जरिए जिले के 11 तालाबों तक पहुंचाना था. लगभग 48 किलोमीटर लंबी नहर बननी थी. इसमें आधी पक्की बननी थी और बाकी कच्ची. लेकिन आज हालात ये हैं कि नहर पक्की हो या कच्ची, हर जगह से उखड़ी, टूटी-फूटी और कई जगह तो धंसी हुई दिखती है. ज़ाहिर तौर पर परियोजना अधूरी है. अब तक सिर्फ़ चार तालाबों तक ही थोड़ा-बहुत पानी पहुंचा है.

मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ जिले की हरपुरा नहर परियोजना का यह हाल इसके अधिकांश हिस्से में दिखता है
मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ जिले की हरपुरा नहर परियोजना का यह हाल इसके अधिकांश हिस्से में दिखता है

2. छतरपुर जिले के बड़ामलेहरा कस्बे से दूसरी मिसाल. यहां सरकार ने बुंदेलखंड पैकेज की राशि से भंडारण एवं विपणन अधोसंरचना बनवाई . यानी वह जगह जहां किसान फसल लाकर बेच सकें. उसका भंडार कर सकें. यहां एक किसान सूचना केंद्र है और अन्य सुविधाएं भी लेकिन ये सुविधाएं ‘सुविधाजनक क़तई नहीं’ हैं. क्यों? इसका ज़वाब सत्याग्रह से बातचीत में बड़ामलेहरा के स्थानीय श्रमिक दिनेश असाटी देते हैं, ‘किसान सूचना केंद्र तो बंद ही रहता है साहब. पीने के पानी की भी बहुत दिक्कत है. वो तो यहीं पास में कुआं है तो उससे पानी खींचकर हम लोग प्यास बुझा लेते हैं.’ यहां यह भी बताते चलें कि प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके में बनी ऐसी अधिकांश अधोसंरचनाओं के यही हाल हैं.

छतरपुर जिले के बड़ामलेहरा कस्बे में भंडारण और विपणन अधोसंरचना के तहत बना किसान सूचना केंद्र.
छतरपुर जिले के बड़ामलेहरा कस्बे में भंडारण और विपणन अधोसंरचना के तहत बना किसान सूचना केंद्र.

3. पन्ना जिले के गुनौर जनपद के सिली गांव से तीसरा उदाहरण. पेयजल संकट से जूझ रहे इस इलाके के ऐसे तमाम गांवों की तरह यहां भी सरकार ने नल-जल योजना शुरू की. लेकिन आज हालत यह है कि यहां बीते कई साल से नल-जल सब बंद हैं. स्थानीय लोग पीपरटोला गांव के हैंडपंप से पीने का पानी लाते हैं. लगभग दो-तीन किलोमीटर दूर से. वहां भी एक हैंडपंप है जो इन दिनों हांफ रहा है. कब बंद पड़ जाए पता नहीं.

ऐसी ढेरों कहानियां सरकार की अपनी सतर्कता जांच रिपोर्ट में ही दर्ज़ हैं

बुंदेलखंड पैकेज़ की राशि ख़र्च करने में हुई अनियमिताओं के ये तो चंद उदाहरण हैं. इलाके के अंदरूनी हलकों में आप किसी भी दिशा में निकल जाइए, ऐसी ढेरों कहानियां मिल जाएंगी. मीडिया के विभिन्न माध्यमों के ज़रिए जब-तब सामने आती इन कहानियों ने टीकमगढ़ के सामाजिक कार्यकर्ता पवन घुवारा का ध्यान भी खींचा. उन्होंने बरसों की मेहनत के बाद मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के सहयोग और निर्देश से इस मामले की जांच शुरू कराने में सफलता हासिल की. प्रदेश के मुख्य तकनीकी परीक्षक (सतर्कता) ने 2015 में इसकी जांच की और पाया कि पैकेज़ के इस्तेमाल में राज्य के सात विभागों ने मिलकर बड़े पैमाने पर धांधली की है. इस जांच रिपोर्ट के कुछ अहम अंश सत्याग्रह के पास सुरक्षित हैं.

जांच रिपोर्ट के निष्कर्ष कुछ इस तरह थे...

ग्रामीण यांत्रिकी विभाग को पैकेज़ की राशि में से 210 करोड़ रुपए मिले थे. विभाग ने इस राशि से कथित तौर पर छह जिलों में 350 स्टॉप डैम बनाए. लेकिन जांच में पाया गया कि स्टॉप डैमों में खराब क्वालिटी के गेट लगाए गए. कहीं-कहीं तो लगाए ही नहीं गए. कट ऑफ वॉल नहीं बनाई गई. कम ऊंचाई के डैम बना दिए गए. समय पर इन संरचनाओं की मरम्मत नहीं कराई गई जिससे अधिकांश डैम अब तक ढह चुके हैं या जर्जर हालत में हैं.

छतरपुर जिले में बड़ामलेहरा तहसील के बन्न-बरेला गांव में जर्जर हालत में पड़ा स्टॉप डैम.
छतरपुर जिले में बड़ामलेहरा तहसील के बन्न-बरेला गांव में जर्जर हालत में पड़ा स्टॉप डैम.

पशुपालन विभाग ने 81 करोड़ रुपए खर्च किए. इसके तहत ग्रामीणों की इकाइयां बनाकर (कुछ लोगों का समूह) उन्हें दुधारू पशु वितरित किए जाने थे. साथ में उन्हें 1,277 रुपए प्रति इकाई के हिसाब से आर्थिक मदद दी जानी थी. ताकि वे पशुओं के चारे आदि का इंतज़ाम कर सकें. कुछ समय बाद इन हितग्राही इकाइयों से सरकार को 1,141 रुपए प्रति इकाई के हिसाब से वापस लेने थे. लेकिन यहां दो तरह की गड़बड़ी हुई. अव्वल तो कई जगह इकाइयां बनी ही नहीं. उनके नाम पर दी जाने वाली रकम पशु चिकित्सा सहायकों के खाते में पहुंच गई. अब चूंकि इकाइयां थीं नहीं इसलिए जो पैसा वापस मिलना था वह भी नहीं मिला. इस तरह लगभग चार-सवा चार करोड़ रुपए का घोटाला हुआ. इसके अलावा जहां इकाइयां बनीं वहां उन्हें दूसरे प्रदेशों से लाकर बकरियां और भैसें आदि वितरित की गईं जो नए वातावरण में ढल नहीं सकीं और अधिकांश मर गईं. इसलिए उन इकाइयों से भी सरकार को कोई पैसा वापस नहीं मिला. मामला पूरी तरह ख़ुर्द-बुर्द हो गया.

वन विभाग ने भी बुंदेलखंड पैकेज के तहत जंगली पशुओं के लिए तालाब और कुछ वाटर शेड आदि बनवाने के नाम पर 107 करोड़ रुपए लिए. जांच में पाया गया कि ये संरचनाएं कहीं बनी ही नहीं हैं. सिर्फ़ कागज़ों पर इनके नंबर ज़रूर हैं. मसलन- 443 क्रमांक तालाब, 445 क्रमांक तालाब आदि. और दिलचस्प यह कि इन कथित ‘क्रमांक तालाबों’ के लिए जो निर्माण सामग्री आदि ढोई गई वह भी स्कूटर, स्कूटी, ऑटो रिक्शा, इंडिगो टैक्सी, जीप आदि से. जांच दल ने भुगतान वाउचरों में दर्ज़ माल ढुलाई वाले वाहनों का नंबर जब आरटीओ से क्रॉस चैक किया तो ये वाहन इसी तरह के निकले. निर्माण सामग्री की ख़रीद प्रक्रिया में भी ख़ामियां पाई गईं.

वन विभाग की जांच रिपोर्ट का एक अहम हिस्सा.
वन विभाग की जांच रिपोर्ट का एक अहम हिस्सा.

जल संसाधन विभाग को ज़िम्मेदारी दी गई थी कि वह विभिन्न जलाशयों-बांधों आदि से नहरें बनाकर पानी को प्रभावित इलाकों में पहुंचाए ताकि सिंचाई और पेयजल संकट से राहत मिल सके. विभाग ने लगभग 1,340 करोड़ रुपए खर्च कर यह ज़िम्मेदारी निभाई भी. लेकिन कुछ इस तरह कि उन नहरों से पानी ने ही बहने से इंकार कर दिया. उसके लिए जो रास्ता बनाया गया था वह हद दर्ज़े का ऊबढ़-खाबड़ और गुणवत्ताहीन था.

लोकस्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग को प्रभावित इलाकों में नल-जल योजनाएं शुरू करनी थीं. इसके लिए उसे 100 करोड़ रुपए की राशि मिली थी. इसके जरिए 1,287 नल-जल योजनाएं शुरू की जानी थीं. इनमें से 997 तो शुरू ही नहीं हो पाईं. जो हुईं उनके तहत हर इलाके में किसी एक जगह ट्यूबवैल खोदा जाना था. वहां टंकी रखी जानी थी. फिर उससे पूरे इलाके में नल लाइन के जरिए पीने के पानी की आपूर्ति होनी थी. इसका संचालन संबंधित ग्राम पंचायतों को सौंपे जाने का प्रावधान था. लेकिन जांच में सामने आया कि ट्यूबवैल 300-350 फीट के बजाय 100-125 फीट तक ही खोदे गए. टंकियों की जगह कोई अस्थायी ढांचा बनाकर पानी भरने का इंतज़ाम किया गया. सड़कों-गलियों में कम खुदाई करके पाइपलाइनें बिछा दी गई. इसका नतीज़ा ये हुआ कि ट्यूबवैल सूख गए. अस्थाई ढांचे ढह गए. पाइपलाइनें टूट-फूट गईं और विभाग ने इसका दोष पंचायतों पर मढ़कर पल्ला झाड़ लिया.

कृषि विभाग को 980 करोड़ रुपए मिले थे. इसके जरिए विभाग की तीन संस्थाओं- मध्य प्रदेश राज्य कृषि विपणन बोर्ड, वेयर हाउसिंग एंड लॉजिस्टिक्स कॉर्पोरेशन और राज्य सहकारी विपणन संघ ने काम किया. सबने मिलकर अनाज रखने के लिए कहीं वेयर हाउस बनवाए. कहीं हाट बाजार. किसी जगह ट्रॉली शेड तो कहीं शौचालय, गार्ड रूम, किसान सूचना केंद्र आदि. लेकिन यहां भी दिलचस्प बात यह रही कि ज़्यादातर संरचनाएं बस बनाने के लिए बना दी गईं. यह नहीं देखा गया कि जिस जगह ये बनाई जा रही हैं वहां उनकी उपयोगिता भी है या नहीं. नतीज़ा करोड़ों के खर्च से बनी ये अधिकांश संरचनाएं अब बेकार पड़ी हैं. यह सतर्कता जांच रिपोर्ट में साफ़ स्वीकार किया गया है.

उद्यानिकी विभाग का ज़िम्मा था कि वह किसानों को डीजल पंप सैट और स्प्रिंकलर और ड्रिप सैट वग़ैरह बांटे. उसने बांटे भी. लेकिन डीलरों से मिलीभगत कर घटिया गुणवत्ता के. इस विभाग की जांच के निष्कर्ष अभी शुरूआती ही हैं. वह भी सिर्फ़ छतरपुर जिले के जहां 339 में से क़रीब 101 किसानों को सामान कम मिला और 40 के क़रीब को तो कुछ मिला ही नहीं. इस तरह क़रीब 65.24 लाख रुपए की रकम सिर्फ़ इस एक जिले में ही ठिकाने लगा दी गई. अंतिम रिपोर्ट तक कैसे हाल सामने आएंगे इसका अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है.

अब कार्रवाई का हाल

सरकारी जांच में ही इस व्यापक पैमाने पर अनियमितताएं सामने आने के बावज़ूद कार्रवाई के नाम पर अब तक खानापूर्ति भी नहीं हुई है. शुरू से ही इस मामले के पीछे लगे पवन घुवारा ने सूचना के अधिकार के तहत पहले सतर्कता विभाग की जांच रिपोर्ट हासिल कीं. फिर विधानसभा से जानना चाहा कि अब तक सतर्कता जांच रिपोर्ट के आधार पर कितने लोगों पर कार्रवाई की गई? यहां बता दें कि मध्य प्रदेश विधानसभा ने 2014 में जनसुनवाई की व्यवस्था शुरू की थी. इसके तहत जनहित के मसलों पर आम जन वैसे ही जानकारी ले सकते हैं जैसे विधायक हासिल करते हैं. पवन ने इसी नियम के तहत विधानसभा से जानकारी मांगी थी.

ज़वाब में विधानसभा की ओर से बताया गया कि सात विभागों के 200 अफसर-कर्मचारी कठघरे में हैं. इनके ख़िलाफ़ विभिन्न स्तरों पर जांच चल रही है. कुछ के खिलाफ़ आरोप पत्र भी पेश किए जा चुके हैं. अपनी पार्टी के ही विधायक लखन पटेल के प्रश्न के जवाब में राज्य के योजना एवं सांख्यिकी मंत्री गौरीशंकर शेजवार ने भी सदन में यह स्वीकार किया. मगर हक़ीक़त में यह सब पल्ला झाड़ने की क़वायद से ज़्यादा कुछ नज़र नहीं आता. क्यों? इसका ज़वाब भी सत्याग्रह की पड़ताल में सामने आया.

जांच रिपोर्ट के कागज़ों को खंगालने पर एक ऐसे ही मामले का पता चलता है. इसके मुताबिक 2010 में जल संसाधन विभाग के उपसंभाग जतारा (टीकमगढ़ जिला) में एक अनुविभागीय अधिकारी होते थे वीसी कोरी. विभागीय उपसंभाग पृथ्वीपुर का उनके पास अतिरिक्त प्रभार होता था. उसी दौरान बुंदेलखंड पैकेज़ के तहत करियापाठा तालाब योजना के क्रियान्वयन की उन्हें ज़िम्मेदारी दी गई थी. सतर्कता जांच में उन्हें इस योजना के क्रियान्वयन में लापरवाही और वित्तीय अनियमिताओं का दोषी पाया गया. इसके लिए उन्हें आरोप पत्र सौंपा गया. निलंबित किया गया और उनसे ज़वाब मांगा गया. इस पर ‘बेहद दुखी’ होकर उन्होंने मुख्य अभियंता धसान-केन कछार, जल संसाधन विभाग, सागर को जवाब भेजा. (इस ज़वाब की प्रति भी सत्याग्रह के पास सुरक्षित है) इसमें उन्होंने साफ़ लिखा...

‘जिन अधिकारियों द्वारा करियापाठा जलाशय के सर्वेक्षण कार्य में भ्रष्टाचार किया गया है उन्हीं अधिकारियाें की अनुशंसा पर मुझे निलंबित किया. इसके कारण मैं बहुत दुखी हूं.’

आरोप पत्र के ज़वाब में वीसी कोरी ने विभाग को जो स्पष्टीकरण दिया उसकी प्रति.
आरोप पत्र के ज़वाब में वीसी कोरी ने विभाग को जो स्पष्टीकरण दिया उसकी प्रति.

बताया जाता है कि इस ज़वाब के कुछ समय बाद न सिर्फ़ उन्हें बहाल कर दिया गया बल्कि अपेक्षाकृत ज़्यादा बड़ी और दमोह जिले की पंचमनगर बांध परियोजना के क्रियान्वयन की ज़िम्मेदारी भी दे दी गई. इस बाबत सत्याग्रह ने कोरी से संपर्क करने की कोशिश की. लेकिन यह कोशिश सफल नहीं हो पाई.

कुल मिलाकर बुंदेलखंड और उसे मिले पैकेज़ के हाल को अगर चंद शब्दों में समेटें तो कहा जा सकता है कि यहां ‘पानी को ज़मीन निगल जाती है और पैसों को आसमान.’ क्योंकि सूखे की कुदरती मार तो साल-दर-साल इस इलाके पर पड़ ही रही है, बीते आठ-नौ साल से सरकारी पैसों की बदइंतज़ामी का इंसानी क़हर भी बरपा हुआ है. लेकिन इसके लिए ज़िम्मेदार कौन है यह किसी को पता नहीं.