सुप्रीम कोर्ट ने बीते शुक्रवार को कहा कि वह नौ अप्रैल को पश्चिम बंगाल पंचायत चुनाव को लेकर आदेश देगा. इससे पहले चार अप्रैल को भाजपा की प्रदेश इकाई ने शीर्ष अदालत में एक याचिका दायर की थी. इसमें कहा गया था कि राज्य में भाजपा के उम्मीदवारों को पर्चा भरने नहीं दिया जा रहा. इसके चलते पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट से नामांकन की आखिरी तारीख (नौ अप्रैल) को बढ़ाने और इसके लिए ऑनलाइन सुविधा देने की अपील की है.

पश्चिम बंगाल में स्थानीय चुनावों को लेकर इस तरह की घटना पहली बार सामने नहीं आई है. साल 2013 के पंचायत चुनाव में 14 फीसदी सीटों पर सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस के अलावा किसी अन्य पार्टी के उम्मीदवार पर्चा नहीं भर पाए थे. इससे पहले वाम सरकार के दौरान साल 2003 में भी कुछ ऐसा ही हुआ था. तब कुल 7000 सीटों पर एक से अधिक उम्मीदवार नहीं होने के चलते इन सीटों पर जनप्रतिनिधि निर्विरोध चुने गए थे. इसके अलावा राज्य के कई इलाकों में मतदाताओं को वोट देने से रोकने की घटनाएं भी सामने आती रही हैं.

राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा जारी अधिसूचना के मुताबिक पश्चिम बंगाल में पंचायत चुनाव के लिए मतदान की तारीख एक, तीन और पांच मई है. आठ मई को इसके नतीजे घोषित किए जाएंगे. सूबे के पांच करोड़ से अधिक मतदाता ग्राम पंचायत की 48650, पंचायत समिति की 9217 और जिला परिषद की 825 सीटों पर जनप्रतिनिधियों का चुनाव करेंगे. साल 2016 के विधान सभा चुनाव के दौरान मतदाताओं की कुल संख्या इससे जरा ही ज्यादा - 6.6 करोड़ - थी. इस लिहाज से देखें तो राज्य में 2019 के चुनाव से पहले इस चुनाव को राजनीतिक दलों के लिए सबसे बड़ी परीक्षा माना जा रहा है.

बीते कुछ वर्षों के दौरान भारतीय राजनीति में एक बड़ा बदलाव स्थानीय चुनावों को लेकर देखने को मिल रहा है. अब इन चुनावों के नतीजे को किसी संबंधित राज्य में राजनीतिक दलों की जमीनी स्थिति और किसी बड़े चुनावी संकेत के तौर पर भी देखा जा रहा है. माना जा रहा है कि अगले महीने पश्चिम बंगाल में होने वाले पंचायती चुनाव के नतीजे भी राज्य की राजनीति पर गहरे असर डाल सकते हैं. साल 2013 के पंचायती चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने करीब दो-तिहाई सीटों पर कब्जा किया था. इसके अगले साल लोक सभा चुनाव में पार्टी ने राज्य की 42 में से 34 सीटों पर कब्जा जमाया.

सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती

इस बार ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस को राज्य में सीपीएम और कांग्रेस के हाशिए पर जाने के बाद भाजपा की ओर से कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है. 2014 के चुनाव के बाद भाजपा लगातार सूबे के मतदाताओं के बीच अपनी पहुंच बढ़ाने में कामयाब साबित हो रही है. इसे देखते हुए खुद ममता बनर्जी कह चुकी हैं कि उनकी मुख्य प्रतिद्वंदी अब भाजपा है. बीते साल नगर निकाय चुनाव के नतीजे भी इसकी पुष्टि करते दिखाई देते हैं. भाजपा ने इस चुनाव में कुल 70 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे. इनमें से केवल तीन पर जीत हासिल करने के बाद पार्टी 14 सीटों पर दूसरे पायदान पर रही थी.

माना जाता है कि तृणमूल कांग्रेस की शहरों के मुकाबले गांवों के मतदाताओं पर अधिक पकड़ है. ऐसे में इस चुनाव में खराब प्रदर्शन सत्ताधारी पार्टी के लिए परेशानी का सबब बन सकता है. इसके अलावा पार्टी के मुख्य संगठनकर्ता माने जाने वाले मुकुल रॉय के भाजपा में जाने के बाद पार्टी के सामने उनके मतदाताओं और समर्थकों को अपने साथ बनाए रखने की भी चुनौती है. जानकारों के मुताबिक इसे देखते हुए ही ममता बनर्जी ने राष्ट्रीय राजनीति में तीसरे मोर्चे के गठन को लेकर सक्रिय होने के बाद भी तमिलनाडु का प्रस्तावित दौरा रद्द कर दिया है. इससे पहले 2018-19 के बजट में उन्होंने गांवों के मतदाताओं को रिझाने के लिए कई लोक-लुभावन घोषणाएं भी की थीं.

भाजपा के पास 2019 से पहले खुद को बड़ा खिलाड़ी साबित करने का मौका

साल 2014 के लोक सभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में दो और 2016 के विधानसभा चुनाव में तीन सीटें हासिल करने वाली भाजपा को राज्य में अब दूसरी सबसे बड़ी पार्टी माना जा रहा है. पार्टी ने बीते कई उपचुनावों में हार के बाद भी अच्छा प्रदर्शन किया है. भाजपा अध्यक्ष अमित शाह खुद कई बार राज्य का दौरा कर चुके हैं. वे पार्टी कार्यकर्ताओं को लगातार कह रहे हैं कि वे मतदाताओं के बीच पहुंच बढ़ाने पर जोर दें. माना जा रहा है कि पंचायत चुनाव से पहले एक बार फिर वे राज्य का दौरा कर सकते हैं. राज्य की राजनीति में जमीनी पकड़ रखने वाले नेता मुकुल रॉय का साथ आना भाजपा के लिए संगठन विस्तार के मोर्चे पर बड़ी बात माना जा रहा है.

साल 2019 के चुनाव में सूबे की 42 में से करीब आधी सीटों पर जीत का लक्ष्य तय करने वाली भाजपा के लिए यह पंचायत चुनाव मतदाताओं को अपनी ओर खींचने का सबसे बड़ा मौका माना जा रहा है. इसके नतीजे पुष्टि कर सकते हैं कि भाजपा 2019 में सत्ताधारी पार्टी को किस हद तक चुनौती दे सकती है. इनसे उसे आगे की चुनावी रणनीति तैयार करने में मदद मिल सकती है.

वाम और कांग्रेस के लिए आम चुनाव से पहले मतदाताओं का विश्वास जीतने का आखिरी मौका

सूबे में लगातार 34 वर्षों तक शासन करने वाले सीपीएम सहित अन्य वाम दल अपनी खो चुकी राजनीतिक जमीन को फिर से हासिल करने की जद्दोजहद से जूझ रहे हैं. वाम दलों को कैडर आधारित पार्टी माना जाता है. इसका मतलब है कि उनके कार्यकर्ता गांवों-कस्बों में जमीनी स्तर पर काम करने वाले होते हैं. हालांकि, सिंगूर (2006) और नंदीग्राम (2007) की घटनाओं के बाद 2008 के पंचायत चुनाव में उन्हें केवल 52 फीसदी मत हासिल हुए थे. इससे पहले यह आंकड़ा 90 फीसदी के करीब था. इसके एक साल बाद हुए लोक सभा चुनाव में पूरे देश में वाम दलों की कुल सीटों की संख्या 59 से घटकर सिर्फ 24 रह गई.

मतदाताओं के बीच पकड़ कम होने के साथ-साथ कैडर और समर्थकों का सत्ताधारी तृणमूल के साथ जाना भी वाम दलों के लिए बहुत बड़ा झटका साबित हुआ है. चुनावों में लगातार खराब प्रदर्शन के बाद भी पार्टी का दावा है कि जन-सरोकार के मुद्दों पर उनकी मतदाताओं पर पकड़ बनी हुई है. हालांकि, यह वोट में तब्दील नहीं हो पा रही है. ऐसे में इस चुनाव के नतीजे लोक सभा चुनाव से पहले वाम दलों के लिए लिटमस टेस्ट साबित हो सकते हैं.

उधर, कांग्रेस के लिए परिस्थितियां वाम दलों से कुछ अलग नहीं है. पार्टी सूबे की राजनीति में लगातार अपनी जमीन गंवाती जा रही है. इसके अलावा स्थानीय चुनावों में पार्टी का प्रदर्शन भी अच्छा नहीं रहा है. बीते साल नगर निकाय चुनाव में करीब 65 सीटें ऐसी रहीं थीं जहां भाजपा को मिले वोट दोनों पार्टियों की हार की वजह बने थे.