भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के नेतृत्व में मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की द्वैमासिक बैठक पांच मार्च को संपन्न हुई. इस बैठक की सबसे खास बात महंगाई दर पर केंद्रीय बैंक का रुख आश्चर्यजनक ढंग से नरम हो जाना रही. इसके तहत उसने मौजूदा वित्त वर्ष में खुदरा महंगाई दर का अनुमान औसतन 0.30 फीसदी कम कर दिया. इससे पहले फरवरी में उसने वित्त वर्ष 2018-19 के खुदरा महंगाई के अपने अनुमान को बढ़ा दिया था. इस तरह केवल दो महीने के भीतर महंगाई पर आरबीआई का रुख लगभग उलटा हो गया है.

इसलिए इस बैठक के बाद अब कहा जाने लगा है कि अगले एक साल तक ब्याज दरों में वृद्धि की कोई संभावना नहीं है. इससे पहले फरवरी की बैठक के बाद अर्थशास्त्री अटकलें लगाने लगे थे कि 2018 में ब्याज दरों में दो बार बढ़ोतरी हो सकती है. माहौल में आए इस अचानक बदलाव से कई जानकार अचंभित हैं. वहीं इससे आलोचकों को आरबीआई की महंगाई का अनुमान लगाने की पद्धति पर सवाल उठाने का फिर से मौका मिल गया है.

बिजनेस अखबार मिंट में शुक्रवार को लिखे एक आलेख में अजीत रानडे जैसे अर्थशास्त्री ने तीन बड़े सवाल उठाए हैं. पहला सवाल कि आखिर क्यों आरबीआई के महंगाई अनुमान हमेशा वास्तविक से ज्यादा दिखते हैं. उनका दूसरा सवाल है कि क्या आरबीआई के ये अनुमान हमेशा अनुदार होते हैं? उन्होंने तीसरा और अंतिम सवाल किया है कि क्या आरबीआई का अनुमान लगाने वाला मॉडल दोषपूर्ण है? उन्होंने सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम के पिछले साल के उस बयान की भी याद दिलाई है जिसमें उन्होंने कहा था कि पिछली 14 तिमाहियों (अप्रैल 2014 से) के महंगाई के आरबीआई के महंगाई अनुमान वास्तविक आंकड़ों से 1.8 फीसदी ज्यादा रहे हैं.

आरबीआई पर ऐसा ही आरोप पिछले साल दिसंबर में प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद की सदस्य आशिमा गोयल ने भी लगाया था. उन्होंने तब कहा था कि पिछले चार साल में उसके महंगाई अनुमान हमेशा वास्तविक खुदरा महंगाई से ज्यादा होते हैं. आंकड़ों की छानबीन के बाद उनके इस आरोप में दम दिखता है. आरबीआई ने अप्रैल 2014 से नई मौद्रिक नीति लागू की थी. इसके तहत थोक के बजाय खुदरा महंगाई को नियंत्रित करने की घो​षणा की गई थी. उस समय खुदरा महंगाई दर करीब नौ फीसदी थी. तब आरबीआई ने कहा था कि उसके प्रयासों से मार्च 2015 तक खुदरा महंगाई दर आठ फीसदी तक सिमट सकती है. हालांकि साल भर बाद जब आंकड़े सामने आए तो महंगाई का वास्तविक आंकड़ा इससे 2.8 फीसदी कम यानी 5.2 फीसदी ही रह गया था.

इसके बाद के तीन साल यही हाल हुआ. आरबीआई ने अप्रैल 2015 में बताया था कि मार्च 2016 तक खुदरा महंगाई के 5.8 फीसदी रहने का अनुमान है. लेकिन वास्तव में यह आंकड़ा इससे एक फीसदी कम यानी केवल 4.8 फीसदी ही रहा. फिर अप्रैल 2016 में आरबीआई ने कहा कि साल भर बाद महंगाई दर पांच फीसदी रहेगी. लेकिन सच यह था कि अप्रैल 2017 में खुदरा महंगाई की दर घटकर 3.8 फीसदी हो गई. पिछले साल अप्रैल में भी उसने कहा कि 2018 की दूसरी छमाही में यह आंकड़ा फिर से पांच फीसदी तक रह सकता है. लेकिन इस हफ्ते घोषित होने वाले मार्च 2018 की खुदरा महंगाई के आंकड़े के बारे में यह माना जा रहा है कि यह चार फीसदी के आसपास रह सकता है. इस तरह आरबीआई के पिछले चार सालों के वार्षिक महंगाई अनुमानों और वास्तविक आंकड़ों के बीच का औसत अंतर करीब 1.5 फीसदी आता है.

घरेलू महंगाई अनुमान भी बढ़े होते हैं!

खुदरा महंगाई के अलावा आरबीआई देश के 18 शहरों के पांच हजार से अधिक घरों में महंगाई की संभावनाओं का सर्वेक्षण भी प्रस्तुत करता है. इसमें अगले तीन महीने और एक साल बाद की संभावित घरेलू महंगाई का अनुमान पेश किया जाता है. इन आंकड़ों में भी वास्तविक हालात की तुलना में काफी अंतर नजर आता है. अभी हाल के ऐसे पांच तिमाही अनुमानों को देखें तो मालूम पड़ता है कि आरबीआई के घरेलू महंगाई के अनुमानों और वास्तविक आंकड़ों में औसतन 1.3 फीसदी का अंतर रहा. इसके अलावा एक साल के अनुमानों का जायजा लेने पर यह अंतर तीन फीसदी का बनता है. जाहिर सी बात है कि ऐसे हालात में महंगाई के अनुमानों को लेकर आरबीआई पर संदेह की उं​गलियां उठना स्वाभाविक है.

क्या ऐसा आरबीआई की अनुदार नीतियों के चलते हो रहा है?

जानकारों के अनुसार हमारे देश में महंगाई खासकर खुदरा महंगाई का अनुमान लगाना हमेशा काफी कठिन रहा है. असल में इसके आंकड़ों में फल और सब्जी जैसे खाद्य पदार्थों का काफी योगदान रहता है. लेकिन इन सामानों के दामों में कई वजहों से उठापटक होती रहती है. आरबीआई की अनुदार महंगार्इ् अनुमानों की नीति के समर्थक दामों में होने वाली इस उठापठक के आधार पर ही इसे जायज ठहराते हैं. इनका मानना है कि जब तक देश में सामानों की आपूर्ति व्यवस्था आमूल-चूल बदल नहीं जाती तब तक आरबीआई का महंगाई अनुमान ऊंचा ही रहना चाहिए. ऐसा न होने पर आरबीआई की मौद्रिक दरें हर कुछ महीनों में बढ़ती-घटती रहेगी जैसा कि 2013 तक होता रहता था और इस वजह से अर्थव्यवस्था एक बार फिर अस्थिर होने लगेगी.

आखिर उपाय क्या हो सकता है?

सुब्रमण्यम स्वामी जैसे आलोचकों को हालांकि ये तर्क गले नहीं उतरते. इनके मुताबिक हमारी अर्थव्यवस्था अभी मुश्किल दौर से गुजर रही है लिहाजा केंद्रीय बैंक को महंगाई की थोड़ी उपेक्षा करते हुए विकास को गति देना चाहिए. वहीं अन्य आलोचकों का सवाल रहता है कि आखिर पिछले चार साल में आरबीआई की अनुमानित महंगाई हमेशा वास्तविक महंगाई से क्यों अधिक रहती है, वह भी इतने ज्यादा अंतर से. इनके मुताबिक इतना बड़ा अंतर यह बताने के लिए काफी है कि उसकी मौजूदा मौद्रिक नीति और उस तक तक पहुंचने की प्रक्रिया दोषपूर्ण हैं.

इसलिए आशिमा गोयल जैसे आलोचक आरबीआई को मौद्रिक नीति और महंगाई अनुमान की गणना करने का मॉडल बदलने की सलाह देते हैं. इनका मानना है कि ऊंची ब्याज दर के जरिए ‘कुल मांग’ को घटाकर महंगाई थामने की आरबीआई की मौजूदा नीति हमारे देश में अभी कामयाब हो ही नहीं सकती. ऐसा इसलिए कि हमारे देश का बुनियादी ढांचा कमजोर होने से यहां पर कुल मांग पहले से ही कम है. इसके चलते कई बार आरबीआई की सख्त मौद्रिक नीति यानी ब्याज दरें बढ़ाने से मांग में तो उतनी कमी नहीं होती जितनी कि आपूर्ति (कंपनियों का उत्पादन) में हो जाती है. इनके मुताबिक हमारे यहां महंगाई को बढ़ाने-घटाने के सबसे बढ़े कारक खाद्य पदार्थ और तेल के दाम हैं. लेकिन ब्याज दरें बढ़ाने हर चीज का उपभोग और उत्पादन कम हो जाता है और फिर यह देश की विकास दर को नकारात्मक तरीके से प्रभावित करता है.

आशिमा गोयल जैसे अर्थशास्त्री आरबीआई से एक और महत्वपूर्ण मांग करती हैं - रेपो दर (आरबीआई से बैंकों को मिलने वाले लघु अवधि के कर्ज की ब्याज दर) हमेशा खुदरा महंगाई दर के एक फीसदी से ज्यादा नहीं होनी चाहिए. इसका मतलब यह हुआ कि आज के हालात में आरबीआई की मौजूदा रेपो दर छह के बजाय 5.5 फीसदी होनी चाहिए. हालांकि कई जानकार एक फीसदी के अंतर को कम मानते हुए इसे 1.5 फीसदी रखने की मौजूदा नीति को जायज मानते हैं. इनके अनुसार एक फीसदी का अंतर होने पर मौद्रिक नीति के हमेशा अस्थिर होने का खतरा बना रहेगा. इसका मतलब यह हुआ कि मौजूदा नीति का अनुसरण करने पर भी अगले साल अप्रैल तक रेपो दर आधा फीसदी घटकर 5.5 फीसदी तक आ सकती है. क्योंकि आरबीआई के मुताबिक उस समय तक महंगाई के चार फीसदी तक सिमटने का अंदाजा है.