साहित्य में जो महत्वपूर्ण होता है वह ज़रूरी नहीं कि लोकप्रिय भी हो. इसका उलट भी सही है कि अक्सर जो लोकप्रिय होता है उसका महत्व नहीं होता है. कविता के क्षेत्र में यह विशेष रूप से देखा जा सकता है. हिंदी समाज साहित्य और कविताप्रेमी समाज नहीं है जैसे कि बांग्ला और उर्दू समाज हैं. हमारे यहां महत्व और लोकप्रियता के बीच दूरी हमारी आधुनिकता के दौर में बहुत स्पष्ट रही है. बांग्ला या उर्दू में ऐसी दूरी अनिवार्य नहीं है जबकि हिंदी में है. प्रसाद, निराला और प्रेमचंद समान रूप से महत्वपूर्ण थे, लेकिन पहले दो प्रेमचंद के मुक़ाबले बहुत कम लोकप्रिय रहे हैं. महत्वपूर्ण कवियों की एक लम्बी क़तार है जिन्हें लोकप्रियता का सौभाग्य नहीं मिला: शमशेर, मुक्तिबोध, रघुवीर सहाय, साही, श्रीकांत वर्मा, कुंवर नारायण आदि इसमें शामिल हैं.

इधर कवि केदारनाथ सिंह के निधन के बाद यह बात व्यापक रूप से कही गई और उभरी है कि वे बिरले थे जो महत्वपूर्ण और लोकप्रिय दोनों थे. यह उन्हें दूसरों से बेहतर कवि तो नहीं बना देता लेकिन उनकी कविता की व्यापक सम्प्रेषणीयता को ज़रूर रेखांकित करता है. उनकी अन्त्येष्टि के समय जितनी बड़ी संख्या में दिल्ली के लोदी रोड श्मशान में लोग आए वह भी इसका एक प्रमाण था. उनके प्रशंसकों, रसिकों, छात्रों आदि की संख्या बहुत बड़ी है इसमें सन्देह नहीं. उनके प्रति व्यापक सद्भाव से यह भी स्पष्ट हुआ. उनका बड़ा गुण यह भी था कि वे दूसरों से बड़ा सौम्य व्यवहार करते थे और किसी के बारे में कड़ी बात उन्होंने शायद ही कभी कही हो.

केदार जी के यहां विपुलता के बजाय सुगठन अधिक है: उन्होंने जो भी लिखा और प्रकाशित किया वह सख़्ती से जांचा हुआ था. किसी तरह का अगढ़ कच्चापन उनके यहां शुरू से नहीं रहा. वे दृष्टिसंपन्न और शिल्पसजग कवि थे. अपने विचारों को उन्होंने कविता पर बोझ की तरह नहीं डाला, उसे अन्तःसलिल रहने दिया. इस हद तक कि उनके लिए हुई एक शोकसभा में इसका ज़िक्र हुआ कि वे विचारधारियों और रूपधर्मियों में समान रूप से स्वीकार्य थे.

प्रसंगवश इसी शोकसभा में मंगलेश डबराल और अनामिका ने अपने-अपने ढंग से यह विश्लेषण किया कि तथाकथित प्रगतिशीलता और कलावाद के बीच जो द्वैत और परस्पर विरोध माना, प्रचारित किया जाता रहा है वह पूरी तरह से अवास्तविक है. दृष्टि और रूप दोनों ही कविता के लिए ज़रूरी होते हैं और उनका परस्पर विलय ही कविता का असली रसायन होता है. जब रूप का लोक दृष्टि के लोक से मिलता है तब कविता का लोक रचा जाता है. यह उदाहरण भी दिया गया कि नेरूदा, ब्रेख़्त, नाज़िम हिक मत जैसे प्रगतिशील कवि बहुत ही सजग शिल्पी भी थे: वे प्रगतिशील और रूपवादी एक साथ थे. कई बार लगता है कि द्वैत और परस्पर विरोध सर्जनात्मकता में नहीं हैं, वे आलोचना की राजनीति से उपजे और फैलाए गए हैं. पता नहीं आलोचना इस दुराग्रह से कब और कैसे मुक्त हो पाएगी.

कला और जीवन

एक लम्बी, विचारोत्तेजक और सार्वजनिक बातचीत में अभी कुछ दिनों पहले रज़ा फ़ाउण्डेशन के एक आयोजन में चित्रकार और गुजराती कवि ग़ुलाम मोहम्मद शेख़ ने यह कहा कि वे सुरेन्द्रनगर के एक मुस्लिम परिवार से उठकर बड़ोदरा के विश्वविद्यालय के कला-संकाय में कला पढ़ने गए थे. यह स्थानांतरण उनके लिए उनके धर्म की संकीर्णता से मुक्त होकर कला को ही धर्म बनाने की शुरुआत साबित हुआ. उनके सामने कला ने एक बहुत व्यापक, जटिल और विविध जीवन, अपने समूचे वितान (फैलाव) में, खोल दिया जिसमें वे सहज भाव से अपनी रचना और कल्पना से शिरकत कर सकते थे. उनकी पहले छोटी सी दुनिया फैलकर बड़ी हो गई. उन्हें जीवन में अपना लक्ष्य समझ में आने लगा. यह समय था जब नेहरू युग अपने उरूज पर था: नयाभारत बनाने की स्वप्नशीलता अपनी सारी बहुलता में आकार ले रही थी. धर्म-जाति-वर्ण के भेदभावों से परे एक उदार खुला संवेदनशील समाज गढ़ने का यह एक शायद अभिशप्त प्रयत्न था जिसके शेख़ साक्षी भी थे और उत्साहपूर्वक उसमें हिस्सेदार भी.

कला में नए-नए प्रयोग, निर्भीक नवाचार हो रहे थे और कई सरहदें लांघी जा रही थीं. इस सबके दौरान यह भी स्पष्ट था कि सच्चाई, रूप, अनुभव, मानवीय स्थिति को देखने-समझने, रूपायित करने की कई दृष्टियां और शैलियां हैं जो एक उदार परिवेश में सक्रिय थे. उनमें नोक-झोंक भी होती थी, संवाद और सहकार भी. तरह-तरह की प्रश्नाकुलता थी और असंदिग्ध प्रश्नवाचकता भी. कला उत्सव भी मनाती थी, प्रश्न पूछती थी, बेचैनी की अभिव्यक्ति थी: उसमें नए का मोह था और जैसी परिस्थिति थी उससे मोहभंग भी.

शेख़ ने यह भी कहा कि उन्हें बाद में यह समझ में आया कि कोई कलाकृति कलाकार के लिए पूर्ण या अन्तिम नहीं होती: हर कृति में एक दूसरी कृति की सुगबुगाहट देखी-सुनी जा सकती है. सतर्क कलाकार उसे सुन-देख लेता है. बाद में यह भी हुआ कि शेख़ धर्म की ओर फिर मुख़ातिब हुए, किसी धार्मिकता के अर्थ में नहीं बल्कि इस साक्ष्य के एहतराम से कि धर्मों ने संसार भर में महान् साहित्य और कलाकृतियां भी उत्प्रेरित की हैं.

शेख़ ने अपने चित्र बनाने को एक तरह का चलना बताया जिसकी कोई स्पष्ट मंज़िल नहीं होती: आप कहीं पहुंचने के लिए नहीं, चलने के अपने सुख और उत्साह के लिए चलते हैं. ऐसे चलने में, ज़ाहिर है, आप बहुत चाहे-अनचाहे बटोरते चलते हैं. कला इस सबका सम्पुंजन होती है. वह सीधे-सीधे जीवन नहीं होती पर उसमें कलाकार की जीवनयात्रा दिखाई देती है. शेख़ ने कलाविदुषी गीता कपूर के एक प्रश्न के उत्तर में यह स्पष्ट किया कि उनका किसी अतिक्रान्ति में भरोसा नहीं है लेकिन उनकी कला तात्कालिकता और निकटता की कोशिश ज़रूर करती है. यह पार जाने का उपक्रम नहीं है: यह यहीं बने रहने की जुगत है.

कठिन होता जाता है

कठिन होता जाता है ऐसे लोगों से मिल पाना जो पढ़े-लिखे हों और, विनयशील और सहज भाव से संवाद में रुचि रखनेवाले. ऐसे लोग जो सार्वजनिक मंच पर अपनी बात संक्षेप में सटीक ढंग से रख सकें. ऐसे लेखकों से जो अपने को छोड़कर बाक़ी सबको षड्यन्त्र में लिप्त मानने के पूर्वग्रह से मुक्त हों. ऐसे पत्रकारों से जो अपनी सीमित जानकारी को पूरा ज्ञान मानने की आदत से लाचार न हों. ऐसे संगीतकारों से जिन्हें अपनी संगीत की दुनिया से बाहर की दुनिया की कुछ ख़बर और चिन्ता हो. ऐसे नृत्यकारों से जिनके पास अपनी कला.के अलावा किसी और कला में रुचि या उसके लिए थोड़ा सा समय हो. ऐसे कलाकारों से जो अपनी कला के आत्यन्तिक मूल्य के बजाय उसकी बाज़ार में क़ीमत को लेकर परेशान न हों. ऐसे बाबा या आध्यात्मिक गुरु से जो अपने हाथों में हीरे-जवाहरात से दमकती अंगूठियां न पहने हों और जिसके गले में रत्नहार न हों. ऐसे राजनेता से जो बिना पांच झूठ बोले और उस पर स्वयं विश्वास किए बिना अपना रात्रि-भोजन खाता हो.

कठिन होता जाता है ऐसे अंग्रेज़ी में लिखनेवाले से मिलना जिसे हिन्दी या किसी भारतीय भाषा में लिखनेवाले लेखक या कृति का पता हो. ऐसे किसी हिन्दी कार्यक्रम में जाना जो समय पर शुरू हो जाए और जिसमें औपचारिकताओं जैसे स्वागत, दीप प्रज्वलन, माल्यार्पण आदि में बहुत समय व्यर्थ न होता हो. ऐसे हिन्दी वक्ताओं को सुनना जो साफ़-सुथरी भाषा में अपनी बात कह सकें बिना अंग्रेज़ी के शब्दों का बेवजह इस्तेमाल किए. ऐसे वक्ताओं से मिलने का अवसर जिसमें व्यर्थ बार-बार आयोजकों का आभार न माना जा रहा हो. ऐसे अतिथि का जो समय से कुछ पहले पहुंच जाए. ऐसे दीप प्रज्वलन का जो जल्दी ही बुझ न जाए. ऐसे माइक का जो खांसे-खखारे न।

कठिन होता जाता है ऐसे भजन-कीर्तन सुन पाना जो बेसुरे-बेताल न हों, भले प्रसिद्ध मंदिरों में क्यों न हों. ऐसे-ऐसी एंकर या उद्घोषक या उद्घोषिका से जो ज़रूरत से ज़्यादा न बोले और जो घटिया शेर या कविता पंक्तियां उत्साह से उद्धृत न करे. अपने मोबाइल पर ज़ोर-ज़ोर से न बोलनेवाले व्यक्ति से मिल पाना. ऐसे लोगों से जो सभा, संगीत, नृत्य आदि के कार्यक्रमों में अपने मोबाइल को शान्त या बन्द रख सकें. ऐसे वक्ता से जिसके भाषण के बीच उसका मोबाइल चिहुंक न पड़े और वह उस पर ध्यान न देने लगे.

कठिन होता जाता है दिल्ली में पैदल सड़क पार करने का जोखिम उठाना और दुर्घटना से बच पाना. अख़बारों के पहले कुछ पृष्ठों पर बड़े विज्ञापन देखने के बजाय ख़बरों को पढ़ पाना. हिन्दी अख़बारों में साफ़-सुथरी भाषा की छटा देख पाना. हिन्दी अख़बारों को पढ़कर यह जाना पाता कि साहित्य, संस्कृति, कलाओं और विचारों की दुनिया में क्या हो रहा है. कठिन होता जाता है इस समय सजग, सतर्क, ज़िम्मेदार नागरिक हो पाना.