बजट सत्र में संसदीय कामकाज पूरी तरह से ठप होने को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आरोपों-प्रत्यारोपों का दौर चालू है. बीती छह अप्रैल को सत्र खत्म होने के बाद अब दोनों पक्ष इस लड़ाई को संसद से सड़क पर पहुंचाने की तैयारी में हैं. बीते शुक्रवार को ही भाजपा संसदीय बोर्ड की बैठक में 12 अप्रैल को ‘लोकतंत्र विरोधी दिवस’ के रुप में मनाने का फैसला किया गया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस पर लोकतंत्र को निचले स्तर पर ले जाने का आरोप लगाया है.

दूसरी ओर, कांग्रेस भी नौ अप्रैल को एक दिन की भूख हड़ताल की तैयारी में है. लोक सभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने सरकार के आरोप पर कहा, ‘सरकार ने हंगामा करने वालों पर कोई कार्रवाई नहीं की. एक प्रस्ताव के जरिए इन्हें निलंबित कर चर्चा (विधेयकों पर) की जा सकती थी.’ उन्होंने संसद में कामकाज को लेकर सरकार की जिम्मेदारी तय करते हुए कहा, ‘13वीं लोक सभा में राष्ट्रमंडल खेल घोटाले और 2जी घोटाले पर लगातार संसद ठप करने को लेकर सुषमा स्वराज और अरुण जेटली कहते थे कि संसद चलाने की जिम्मेदारी सरकार की होती है.’

संसद में हंगामा और कामकाज न होने के साथ सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जुबानी जंग को लेकर जानकारों का कहना है कि संसदीय कार्यप्रणाली को सही ढंग से चलाने की जिम्मेदारी दोनों पक्षों की है. उनके मुताबिक सरकार की जिम्मेदारी है कि वह विपक्ष से मतभेद होने पर बातचीत के जरिए इन्हें सुलझाकर सुचारू रुप से संसद को संचालित करे. उनका आगे कहना है कि संसद को राजनीतिक नुराकुश्ती का मैदान बनाना लोकतंत्र के मंदिर को ढहाने के बराबर है. जानकारों के मुताबिक इसके अलावा इस अपूर्णीय नुकसान की भरपाई के लिए सत्ताधारी राष्ट्रीय प्रजातांत्रिक गठबंधन (एनडीए) द्वारा 23 दिन के वेतन-भत्ते छोड़ना भी नाकाफी है. हालांकि, भाजपा की सहयोगी पार्टी शिवसेना ने इस फैसले से खुद को अलग कर लिया है.

संसदीय मामलों के जानकारों की मानें तो बीते एक महीने के दौरान लोक सभा और राज्य सभा में जो कुछ भी हुआ वह संसदीय लोकतंत्र के मुख्य मकसद को ही धूमिल करता हुआ दिखता है. संवैधानिक प्रावधानों की बात करें तो संसद का मुख्य काम कानून बनाना, राष्ट्र और जनहित के मुद्दे पर बहस करना, सांसदों द्वारा अपनी क्षेत्र की समस्याओं को सरकार के सामने रखना और इसके समाधान तलाशना शामिल हैं. लेकिन बीते दो सत्रों के दौरान इसका ज्यादातर वक्त हंगामे की भेंट चढ़ गया.

हालांकि, संसद के राजनीति का अखाड़ा बनने की वजह से इसका ठप होना कोई नई बात नहीं है. एक तबके का मानना है कि मोदी सरकार के दौरान संसदीय संस्थाएं लगातार कमजोर की जा रही हैं. साथ ही, सरकार द्वारा विपक्ष को साथ लेकर चलने की कोई कोशिश होती दिखाई भी नहीं दे रही. अलग-अलग राज्यों में विधानसभा चुनावों की वजह से संसदीय सत्र को न केवल छोटा किया जा रहा है बल्कि, इसे देरी से भी बुलाया जा रहा है. हालांकि, इससे पहले की सरकारों में स्थिति इससे बेहतर थी, यह साफ तौर पर नहीं कहा जा सकता.

बीते साल गुजरात चुनाव की वजह से संसद का शीतकालीन सत्र 15 दिसंबर से बुलाया गया था और इसमें भी 13 बैठकें हुईं. आम तौर पर इस सत्र को नवंबर के तीसरे हफ्ते में बुलाया जाता है. उस वक्त कांग्रेस का आरोप था कि जबसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार का गठन हुआ है, तब से ही अन्य संवैधानिक संस्थाओं के साथ संसद की गरिमा को भी धूमिल करने की कोशिश की जा रही है.

बजट सत्र में कामकाज

इस साल बजट सत्र को दो चरणों में 29 जनवरी से छह अप्रैल तक बुलाया गया था. इसमें दोनों सदनों की कुल 29 बैठकें हुईं. हालांकि, पंजाब नेशनल बैंक (पीएनबी) घोटाला, आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा और कावेरी प्रबंधन बोर्ड के गठन को लेकर हंगामे की वजह से संसदीय कामकाज पूरी तरह ठप रहा. संसदीय कामकाज पर नजर रखने वाली संस्था पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के मुताबिक इस सत्र में लोक सभा तय वक्त का केवल 21 फीसदी और राज्य सभा 27 फीसदी ही काम कर पाई. इस सत्र के दूसरे हिस्से में तो यह आंकड़ा घटकर चार और नौ फीसदी रह गया. इस संस्था की मानें तो इस सत्र में साल 2000 के बाद सबसे कम काम किया गया है. इसके अलावा स्थिति इतनी खराब रही कि पूरे सत्र के दौरान प्रश्नकाल को लोक सभा और राज्य सभा में केवल एक-एक दिन ही पूरा किया जा सका.

विधायी कामकाज

बजट सत्र में दो विधेयकों को बिना चर्चा के ही पारित कर दिया गया. इनमें वित्त विधेयक-2018 और पेमेंट ऑफ ग्रेच्युटी (संशोधन विधेयक)-2017 है. इनमें वित्त विधेयक को लोक सभा में केवल 18 मिनटों में पारित कर दिया गया, जबकि साल 2003 में इस पर करीब 13 घंटे खर्च किए गए थे. वित्त विधेयक में मुख्य रूप से कर प्रणाली से संबंधित प्रावधान शामिल होते हैं. हालांकि, इस बार इसमें 18 संशोधनों का इससे कोई संबंध नहीं था. इनमें विदेशी सहायता विनियमन कानून’ (एफसीआरए) में भी संशोधन शामिल है. इसके तहत अब विदेशों से हासिल राजनीतिक चंदे को जांच के दायरे से बाहर कर दिया गया है. इसके अलावा भगोड़ा आर्थिक अपराधी विधेयक-2018 और चिटफंड संशोधन विधेयक-2018 को संसद में पेश तो कर दिया गया, लेकिन इसे पारित नहीं किया जा सका.

इसके साथ ही करीब 24 लाख करोड़ रुपये के आम बजट पर बहस को भी काफी कम वक्त दिया गया. लोक सभा में इस पर केवल 15 घंटे और राज्य सभा में 11 घंटे खर्च किए गए. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक इससे पहले बीते 17 वर्षों में बजट पर लोक सभा में औसतन 53 घंटे और राज्य सभा में 23 घंटे खर्च किए गए थे.

संसद का यह बजट सत्र अविश्वास प्रस्ताव की वजह से भी सुर्खियों में रहा. सरकार के खिलाफ विपक्ष द्वारा लाए गए अविश्वास प्रस्तावों को भी लोक सभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने हंगामे का हवाला देकर स्वीकार करने से इनकार कर दिया. जानकार उनके इस रवैये पर भी सवाल उठाते हैं. इनका कहना है कि यदि इसे परंपरा मान लिया गया तो आने वाले दिनों में भी हंगामे का हवाला देकर अविश्वास प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया जा सकता है. जानकारों के मुताबिक इसके बाद कोई भी सरकार पांच साल तक के लिए तानाशाही रवैया अपनाती हुई दिख सकती है.

अपने लेख ‘भारतीय लोकतंत्र’ में महात्मा गांधी कहते हैं कि भारत जैसे विशाल देश में ईमानदारी से विचार करने वाले सभी पक्षों का स्थान होना चाहिए और यह सबका कर्तव्य है कि वह दूसरे पक्ष का दृष्टिकोण समझने की कोशिश और उसका आदर करे. इसके आगे वे चेतावनी देते हुए कहते हैं, ‘यदि हममें उदारता और सहनशीलता नहीं है तो हम अपने भेद कभी मित्रतापूर्वक नहीं सुलझा सकेंगे. इसका नतीजा होगा कि हमें तीसरे पक्ष को अपना पंच मानना पड़ेगा. यानी विदेशी अधीनता स्वीकार करना पड़ेगा.’

महात्मा गांधी ने ये बातें भले ही आजादी से पहले लिखीं थीं. लेकिन, भारतीय लोकतंत्र में मौजूदा संसदीय कामकाज को लेकर उनकी बातें पूरी तरह से लागू होती दिखती हैं. मौजूदा दौर में विदेशी अधीनता के आर्थिक सहित कई रुप हो सकते हैं. इसमें बेलगाम विदेशी चंदा भी शामिल हो सकता है, जिसके लिए वित्त विधेयक के जरिए रास्ता खोल दिया गया और इस पर कोई बहस नहीं हो सकी. माना जाता है कि कोई भी लोकतंत्र कितना मजबूत या कमजोर है, यह उसकी संवैधानिक संस्थाओं से तय होता है. इस लिहाज से देश में लोकतंत्र को मजबूत करने वाली संसद, चुनाव आयोग सहित अन्य संस्थाओं की भूमिका ही सवालों के कटघरे में है, जिसे देश के लिए कतई शुभ संकेत नहीं कहा जा सकता है.