मध्य प्रदेश के देवास शहर में उस रोज जो ‘कुमार गलित हुए’ और उसके बाद जिन ‘गंधर्व का उद्भव’ हुआ उनके अंतर की व्यथा शांत हो चुकी थी. तमाम दबाव और असमंजस जाते रहे थे. अब यह कोई अलग ही शख़्स थे जो सोच से भी आगे का संगीत देख सकते थे. उसे सुन सकते थे, महसूस कर सकते थे और उस अदृश्य को अद्भुत अंदाज़ में सामने ला सकते थे.

विविध भारती के ‘विविधा’ कार्यक्रम में अपने साक्षात्कार के दौरान ऐसा ही वाक़या कुमार जी बेटी कलापिनी कोमकाली कुछ इस तरह याद करती हैं, ‘उन दिनों मैं छोटी ही थी लेकिन घर में चूंकि संगीत का ही माहौल था इसलिए इस विधा को ठीक-ठाक तरीके से समझने लगी थी. उसी समय की बात है. एक दिन मैंने कुमार जी के मुंह से कामोद (राग) की एक बंदिश सुनी. वह बंदिश पंडित विष्णुनारायण भातखंडे की पुस्तक में भी लिखी हुई है. वे उस बंदिश को बिल्कुल अलग और बड़े ख़ूबसूरत अंदाज़ में गा रहे थे. जब उनका गाना हो गया तो मैं उनके पास गई और पूछा- बाबा ये बंदिश जो आपने गाई यह तो लिखी वाली से बिल्कुल अलग है. तो उन्होंने कहा- नहीं. मैंने वही बंदिश गाई है जो भातखंडे की पुस्तक में लिखी हुई है. पर मैं क्या करूं मुझे बिटवीन द लाइंस (यानी लिखी हुई लानों के बीच का अलिखित भाव) भी दिखता है.’

एक ऐसा ही प्रसंग कुमार जी के बेटे मुकुल शिवपुत्र भी याद करते हैं. जाने-माने ध्रुपद गायक उमाकांत-रमाकांत गुंदेचा (गुंदेचा बंधु) की किताब ‘सुनता है गुरु ज्ञानी’ में प्रकाशित साक्षात्कार में मुकुल बताते हैं, ‘संगीत सिखाते या गढ़ते (कंपोज करना) वक़्त कुमार जी बिल्कुल अलग ही दुनिया में होते थे. इस दुनिया में नहीं रहते थे. कई बार तो ऐसा होता था कि जैसे उन्होंने गुर्जरी तोड़ी (राग) हमें पलटा (अलंकार) दे दिया- सा रे ग रे सा, सा रे ग म ध, रे ग रे सा- और कहा रियाज़ करो. इसके बाद हम इस कमरे में रियाज़ कर रहे हैं उधर वे दूसरे कमरे में जाकर तोड़ी (राग) या शंकरा (राग) में कुछ कंपोज़ कर रहे हैं. इस दौरान उन्हें हमारी आवाज़ बराबर आती रहती लेकिन, वे अपना कंपोज़ीशन भी किसी दूसरे राग में लगातार बनाते रहते. यह एक अद्दभुत बात थी उनमें.’

कुमार जी की शिष्या रहीं मीरा राव सत्याग्रह से बातचीत में बताती हैं, ‘कुमार जी ने संगीत को और संगीत ने कुमार जी को पूरी तरह आत्मसात कर रखा था. जैसे भोजन-पानी शरीर में पहुंंचकर अपना अस्तित्व पूरी तरह उसी में समाहित कर देता है न? बिल्कुल वैसे ही. वे हम लोगों को ऐसे ही दृष्टांत देकर समझाया करते थे. कहते थे- ‘जैसे खाने में चखना, वैसे सुनना. संगीत तो चखने की चीज़ है. जीभ हो तो आप चखो, कान हों तो सुनो. अच्छा लगे तो और सुनो. अच्छा न लगे तो बाहर आ जाओ.’ ख़ुद कुमार जी के लिए भी संगीत ऐसा ही था. खाने-पीने जैसा जीवन का अभिन्न और अनिवार्य हिस्सा. वे संगीत के स्वादी थे. आला दर्ज़े के स्वादी. वे संगीत का ऐसा सर्वोच्च स्वाद (एक्सट्रेक्ट) हासिल करते थे जो और कोई शायद सोच भी न पाए.’

वर्तमान दौर में कुमार जी के समर्पित अनुयायियों में ख़ुद को शुमार कर चुके देश के जाने-माने बांसुरी वादकों में से एक अभय फगरे ने पढ़-सुनकर उन्हें समझने की कोशिश की है. और उनके इस पढ़े-सुने का निष्कर्ष काफ़ी-कुछ वैसा है जैसा मुकुल शिवपुत्र का. ‘सुनता है गुरु ज्ञानी’ में मुकुल शिवपुत्र कहते हैं, ‘दूसरा कुमार पैदा हो नहीं सकता. कोई भी व्यक्ति उनसे कमतर ही होगा. बेहतर हो ही नहीं सकता. मैंने कुमार जी का ऐसा गाना सुना है कि उनसे अच्छा कोई गा नहीं सकता. मैंने उनसे बागेश्री (राग) ऐसा सुना है- पूरा निचोड़ के कि मैं अब किसका बागेश्री सुनूं. मुझे किसी और का बागेश्री सुनने की ज़रूरत ही नहीं महसूस नहीं होती.’

उधर, सत्याग्रह से बातचीत में अभय फगरे बताते हैं, ‘कुमार जी के लिए संगीत और संगीत के लिए कुमार जी किसी दायरे में नहीं बंधे. संगीत ने उन्हें संपूर्णता में देखा और उन्होंने संगीत को उसकी संपूर्णता में आत्मसात किया. इसीलिए जब वे यह कहते हैं कि यमन एक विशाल राग है तो उसकी विशालता को उसके भिन्न-भिन्न रूपों के साथ अपने संगीत के ज़रिए दिखाते भी हैं. उनकी सिद्धहस्तता इस स्तर की है कि वे बंदिश के भाव के हिसाब से ख़ुद तय करते हैं कि कल्याण (राग) में शुद्ध मध्यम (म) या बागेश्री में पंचम (प) लगाना या है नहीं. लगाना है तो कब, कहां और कितना.’

और कुमार गंधर्व की यह जो विलक्षता थी उसने ‘शून्य से शत-सहस्र’ का सफ़र तय किया था. उनकी ही किताब ‘अनूपरागविलास’ के पहले खंड में लिखी अपनी प्रस्तावना में अपने जमाने के ख़्यात संगीत समालोचक (क्रिटिक), संगीतशास्त्री (म्यूजिकोलॉजिस्ट) और लेखक वामनराव देशपांडे इसका संकेत देते हैं. वे लिखते हैं, ‘महफिल अभी जम ही रही थी कि तानपूरे का तार अचानक टूट गया. कुमार जी पर तपेदिक (टीबी) ने आक्रमण कर दिया... डॉक्टर का आदेश था कि पांच साल तक तानपूरा हाथ में लेकर गाएं नहीं. कुमार जी ने इस आदेश का अक्षरश: पालन किया... (अब तक कुमार मध्य प्रदेश के देवास में स्थायी रूप से आकर बस चुके थे) लेकिन इस बीमारी का भी उन्होंने इस्तेमाल कर लिया. उनका मन अब अधिक चिंतनशील हो गया था. इसलिए वे इस दौर में संगीत में गहरे पैठ कर उसकी थाह ले सके...चौबीसों घंटे बिस्तर पर पड़े-पड़े शून्य में गुजरते थे. सो उनका ध्यान आसपास के उठने वाले स्वरों की ओर खिंचता गया. ग्रामवासियों के लोकगीतों की ओर. लोकधुनों की ओर. और वे इनकी तरफ़ अधिकाधिक आकर्षित होते गए. इसी में से एक नए विश्व का उन्हें दर्शन हुआ.’

कुमार जी का यह नया विश्व कैसा था, कितना वृहद् और गहरा था, किस हद तक अपने आसपास के वातावरण और उसमें तैरते संगीत के प्रति संवेदनशील था, इसे समझने के लिए कोई प्रसंग पढ़ना शायद उचित न हो. इसके बज़ाय यह सवा सात मिनट की रिकॉर्डिंग सुनें तो शायद बेहतर रहेगा. शायद आप भी इन चंद शब्दों और सुरों में छिपी पीड़ा को, उस आर्तनाद को महसूस कर पाएं. अलबत्ता यह बंदिश पूरी नहीं है पर जितनी भी है कुमार जी को महसूस करने के लिए संपूर्ण है...

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राग मधसुरजा. कंपोज़िशन ज़ाहिर तौर पर कुमार जी का और काव्य रचना भी उनकी. लेकिन मालवी भाषा में लिखे कुमार जी के इन शब्दों के पीछे छिपी पीड़ा एक बकरे की है जिसे बलि चढ़ाने के लिए देवी मंदिर ले जाया जा रहा है. (यहां बताते चलें कि देवास में कुमार जी का निवास देवी मंदिर के रास्ते में है) और वह आर्त स्वर में मां भगवती से प्रार्थना कर रहा है...

‘बचा ले मोरी मां माता री,
घर में ललुवा अकेलो बिन मो है ।।
अरज यही तोरे पास मेरो थो है,
घर में ललुवा अकेलो बिन मो है।।

ये हैं कुमार गंधर्व. जो बलि के बकरे की मिमियाहट में छिपे आर्त संगीत को भी सुन सकते हैं. उसे शब्द दे सकते हैं. उसे महसूस कर सकते हैं और करा भी सकते हैं. और यही वह विशिष्टता है कि जिसकी वज़ह से आज हम भी कुमार गंधर्व और उनके संगीत को अपने आसपास सजीव-सशरीर महसूस कर पा रहे हैं.