दलित कानूनों में हुए बदलाव देश भर में चर्चा का विषय बने हुए हैं. इसकी शुरुआत सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले से हुई थी. बीती 20 मार्च को सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ ने एससी-एसटी एक्ट यानी ‘अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989’ में कुछ बदलाव किये. इन बदलावों का देश भर में विरोध हुआ. दलित समुदाय ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ ‘भारत बंद’ भी किया जिस दौरान कई हिंसक घटनाएं हुई और करीब दस लोगों की जान चली गई. इस प्रदर्शन में जो हिंसा हुई उसे किसी भी तरह से जायज ठहराना इस लेख का उद्देश्य नहीं है. इसका उद्देश्य एससी-एसटी कानून और सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को समग्रता में देखना भर है.

आज की स्थिति यह है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर केंद्र सरकार की पुनर्विचार याचिका सुप्रीम कोर्ट में लंबित है और उसने फिलहाल अपने फैसले में बदलाव करने से इनकार कर दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट में ऐसे क्या बदलाव किये हैं जिससे दलित समुदाय में इतना रोष है? इस पर चर्चा करने से पहले एक नज़र इस कानून के इतिहास पर डालते हैं.

कानून का इतिहास

देश की आज़ादी के बाद जब संविधान लागू हुआ तो उसमें छुआछूत जैसी कुप्रथाओं पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की बात कही गई थी. यह बात संविधान में तो लिख दी गई लेकिन इसे धरातल पर लागू करने के लिए किसी कानून की भी जरूरत थी. लिहाजा सबसे पहले साल 1955 में ‘अनटचेबिलिटी ऑफेंसस एक्ट’ यानी ‘अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम’ लागू किया गया. इसी अधिनियम ने दलित समुदाय के लिए सार्वजनिक स्थानों के दरवाज़े खोले. अधिनियम में प्रावधान था कि सार्वजनिक सड़क, कुआं, मंदिर, स्कूल आदि जैसी किसी भी जगह पर जाने का दलितों को पूरा अधिकार होगा और अगर किसी ने भी उन्हें रोकने की कोशिश की तो उसके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी.

इस कानून ने दलितों को अधिकार तो दे दिए लेकिन जब दलितों ने ऐसी सार्वजनिक जगहों पर जाना और बराबरी के अधिकार मांगने शुरू किये तो सवर्णों द्वारा ज़बरदस्त विरोध किया गया. जगह-जगह दलितों के साथ हिंसा होने लगी. ऐसी हिंसा से निपटने के लिए इस कानून के प्रावधान पर्याप्त नहीं थे. लिहाज़ा इस कानून को और मजबूत करने की मांग हुई. लंबे संघर्ष के बाद साल 1976 में इस कानून में कुछ बदलाव हुए और इसका नाम भी बदलकर ‘सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम’ कर दिया गया.

इसके बाद भी दलितों के साथ होने वाले अत्याचारों में कमी नहीं आई. बल्कि दलितों का शोषण पहले से भी ज्यादा बढ़ गया. इसका कारण यह भी माना जाता है कि यही वो दौर था जब दलित युवा भी शिक्षित होने लगे थे. लिहाजा उन्होंने अपने पूर्वजों की तुलना में अपने अधिकारों की मांग ज्यादा प्रभावी तरीके से उठाई. इसके चलते दलितों और सवर्णों के बीच संघर्ष और भी बढ़ गया. अंततः साल 1989 में ‘एससी-एसटी एक्ट’ यानी ‘अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम’ लागू किया गया.

इस अधिनियम में पहली बार ‘उत्पीडन’ शब्द की विस्तार से व्याख्या की गई. इसके कुछ साल बाद ही केंद्र सरकार ने एक नियमावली भी बनाई जिससे इस अधिनियम को और मजबूती मिली. साल 2015 में इस अधिनियम में कुछ और संशोधन हुए जिससे इसके प्रावधानों को पहले से ज्यादा सख्त किया गया और ‘उत्पीडन’ शब्द की व्याख्या में कई ऐसे कृत्य शामिल किये गए जो पहले नहीं थे. जैसे, बाल-मूंछ मूंड देना, जूतों की माला पहनना आदि.

सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून में क्या बदलाव किये हैं

सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून में मुख्यतः तीन बदलाव किये हैं:

1. इस कानून में अग्रिम जमानत का प्रावधान नहीं था. लेकिन अब कोर्ट ने कहा है कि इस कानून के तहत भी आरोपित को अग्रिम जमानत मिल सकती है.

2. किसी भी गंभीर अपराध की सूचना जब पुलिस को मिलती है तो उसे तुरंत ही इसकी एफआईआर यानी प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करनी होती है. एससी-एसटी एक्ट के तहत भी ऐसा ही होता था. लेकिन अब कोर्ट ने कहा है कि इस अधिनियम के तहत आने वाले मामलों में एफआईआर दर्ज करने से पहले उस क्षेत्र के पुलिस उप-अधीक्षक शिकायत की प्राथमिक जांच करेंगे. यदि वे संतुष्ट होते हैं कि आरोप झूठे नहीं हैं, तभी एफआईआर दर्ज होगी.

3. किसी भी संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध की तरह ही इस कानून में भी शिकायत दर्ज होने पर आरोपित को गिरफ्तार किये जाने का प्रावधान था. अब कोर्ट ने कहा है कि इस कानून के तहत किसी भी लोक सेवक की गिरफ्तारी सिर्फ तभी हो सकेगी जब उस लोकसेवक का नियुक्ति प्राधिकारी इसकी लिखित अनुमति दे. इसके अलावा अन्य आरोपितों (जो लोकसेवक नहीं हैं) की गिरफ्तारी सिर्फ वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक की लिखित अनुमति के बाद ही होगी.

एससी-एसटी एक्ट में ये बदलाव करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा है अगर इनका पालन नहीं किया गया तो सम्बंधित अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई भी होगी और इसे न्यायालय की अवमानना भी माना जाएगा.

इन बदलावों का इतना विरोध क्यों हो रहा है

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इस कानून में पहला बदलाव अग्रिम जमानत की छूट देने का किया है. एससी-एसटी एक्ट की धारा 18 अग्रिम जमानत पर रोक की बात करती है. अब कोर्ट ने माना है कि यह धारा आरोपितों के अधिकारों का हनन कर रही है लिहाजा इस पर रोक लगा दी गई है.

अव्वल तो ऐसा करना ही सुप्रीम कोर्ट की पुरानी नजीरों के अनुरूप नहीं है. साल 1995 में सुप्रीम कोर्ट इस एक्ट की धारा 18 की संवैधानिकता को जायज़ ठहरा चुका है. तब राम कृष्ण बलोथिया मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि इस तरह के मामलों में आरोपितों को अग्रिम जमानत नहीं दी जा सकती. क्योंकि यदि ऐसा हुआ तो वे लोग पीड़ितों को धमकाने का काम करेंगे. अगर सुप्रीम कोर्ट को इस पुराने फैसले पर पुनर्विचार की जरूरत लग रही थी तो इस मामले को किसी बड़ी पीठ के पास भेजा जाना चाहिए था. लेकिन ऐसा नहीं हुआ और दो जजों की पीठ ने ही मौजूदा फैसला दे दिया.

दूसरा, कई राज्यों में अग्रिम जमानत का प्रावधान ही नहीं है. उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड समेत कई अन्य राज्यों में किसी भी मामले में अग्रिम जमानत नहीं दी जाती. अब सुप्रीम कोर्ट के इस हालिया फैसले के बाद इन राज्यों में असमंजस की स्थिति पैदा होगी. क्योंकि अब एससी-एसटी एक्ट के मामलों में आरोपित इन राज्यों में अग्रिम जमानत के लिए कोर्ट जाएंगे और सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देंगे. लिहाजा जिस एक्ट के तहत अग्रिम जमानत पूरे देश में प्रतिबंधित थी अब उसी एक्ट के तहत उन राज्यों में भी दिया जाएगा जहां अन्य मामलों में भी अग्रिम जमानत का प्रावधान नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट ने इस एक्ट के तहत आने वाली शिकायतों पर एफआईआर दर्ज करने से पहले एक प्राथमिक जांच करने के भी निर्देश दिए हैं. इससे एफआईआर दर्ज होने में पहले से ज्यादा दिन लग जाएंगे. कानून के तमाम जानकार ये स्वीकारते हैं कि हमारी व्यवस्था में अपराधियों के बच निकलने की एक बड़ी वजह एफआईआर में देरी ही होती है. अपराध के बाद जब काफी समय तक मुकदमा ही दर्ज नहीं होता तो इतने समय में गवाहों से लेकर सबूत तक, सब ठिकाने लगा दिए जाते हैं. ये एक बड़ी वजह है कि हमारे देश में ‘कन्विक्शन रेट’ यानी आरोपितों को सजा होने की दर बेहद कम है.

सबसे विवादस्पद बदलाव जो कोर्ट ने किया है वह गिरफ्तारी से पहले अधिकारियों की लिखित अनुमति लिए जाने का है. अब अगर प्राथमिक जांच के बाद पुलिस उप-अधीक्षक पाता है कि आरोप सच है और एफआईआर भी दर्ज कर ली जाती है, तब भी पुलिस आरोपित को गिरफ्तार करने से पहले सम्बंधित अधिकारियों की लिखित अनुमति लेने जाएगी. जिन दलितों को सिर्फ मूंछ रख लेने या घोड़े पर बैठ जाने के चलते ही जमकर पीट दिया जाता है, वे पहले ही मुश्किल से शिकायत दर्ज करवाने पहुंच पाते है. अब जब उन्हें यह भी मालूम होगा कि उनके शिकायत दर्ज करने के कई दिनों बाद तक भी आरोपित गिरफ्तार नहीं किये जाएंगे, तो समझा जा सकता है कि कितने पीड़ित शिकायत दर्ज करने की हिम्मत करेंगे. जो पीड़ित हिम्मत करेंगे भी, उन पर भी आरोपितों द्वारा दबाव बनाने के सारे रास्ते अब कोर्ट ने खोल दिए हैं.

कानून के दुरूपयोग की बहस:

हालिया बदलाव करते हुए कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट के व्यापक दुरूपयोग होने का हवाला दिया है. कानूनों के दुरूपयोग की ये पूरी बहस बेहद दिलचस्प है. हमारे देश में हजारों कानून हैं लेकिन दुरूपयोग की बात मुख्यतः दो ही कानूनों को लेकर की जाती है. एक हैं महिलाओं से जुड़े कानून और दूसरे हैं दलितों से जुड़े कानून. इनके अलावा टाडा, पोटा, मकोका और अफस्पा जैसे कानूनों के दुरूपयोग की भी बात होती है लेकिन ये सारे विशेष कानून हैं जो पूरे देश में लागू नहीं होते. साथ ही ऐसे कानूनों के दुरूपयोग के आरोप भी नागरिकों पर नहीं बल्कि पुलिस या राज्य पर लगते हैं.

आम नागरिकों द्वारा कानून के दुरूपयोग की बहस सिर्फ महिलाओं और दलितों के लिए बने कानूनों तक ही सीमित है. ये अपने-आप में बेहद हास्यास्पद है. क्योंकि इस बहस के अनुसार देश में कानूनों का दुरूपयोग यही दो वर्ग कर रहे हैं जो आज भी हाशिये पर हैं और जिनके सशक्तिकरण के लिए आज भी सरकारें दर्जनों योजनाएं बना रही हैं. लैंगिक आधार पर कमज़ोर महिला वर्ग और जातीय आधार पर सबसे कमज़ोर दलित वर्ग पर ही कानूनों का दुरूपयोग करने के आरोप हैं.

कानून के दुरूपयोग की इस बहस में आगे बढ़ने से पहले एक नज़र इन कानूनों के इतिहास पर डालते हैं. दलित कानूनों के इतिहास का जिक्र इस लेख की शुरुआत में किया भी जा चुका है. ये कानून आज जिस रूप में हैं, इन्हें वैसा बनाने का संघर्ष बेहद लंबा और कठिन रहा है. बथानी टोला और लक्ष्मनपुर बाथे में हुए नरसंहार, हरियाणा के गोहाना और मिर्चपुर में जलाए गए सैकड़ों दलितों के घर और ऐसी ही न जाने कितनी घटनाओं के बाद संसद को मजबूरन वो कानून बनाने पड़े जिनसे दलितों के अधिकारों को सुरक्षित किया जा सके.

ठीक ऐसा ही इतिहास महिलाओं के लिए बने कानूनों का भी है. भंवरी देवी से लेकर निर्भया तक न जाने कितने मामलों ने जब देश को झकझोर दिया, हजारों बहुएं जब दहेज़ के चलते जला दी गईं, तब जाकर ऐसे कानून हासिल हुए जिनसे महिलाओं को सुरक्षा दी जा सके. इन कानूनों को हासिल करने में कई दशक लग गए. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने एक ही झटके में इन्हें कुंद कर दिया. ये भी एक दिलचस्प इत्तेफाक ही है कि जस्टिस एके गोयल और जस्टिस यूयू ललित की जिस पीठ ने इस बार दलित कानूनों को कुंद किया है, बिलकुल इसी पीठ ने पिछले साल महिलाओं के लिए बने दहेज़ संबंधी कानूनों को भी कमज़ोर किया था.

हमारी न्याय व्यवस्था में ‘कन्विक्शन रेट’ बेहद कम है. यानी जितने भी मामले दाखिल होते हैं, उनमें से बेहद कम मामलों में ही आरोपितों को सजा हो पाती है. ऐसा सभी तरह के अपराधों में होता है. लेकिन सिर्फ दलितों और महिलाओं के लिए बने कानूनों के बारे में ही यह कहा जाता है कि ‘कन्विक्शन रेट’ इसलिए कम है क्योंकि अधिकतर मामले तो फर्जी दर्ज होते हैं. ऐसा क्यों है, इसे संविधान निर्माता भीमराव आंबेडकर के एक कथन से समझा जा सकता है.

1930 के दशक में डॉक्टर भीमराव आंबेडकर ने अपने एक भाषण में कहा था कि ‘किसी के व्यक्तिगत व्यवहार को तो कानून के जरिये सुधारा या नियंत्रित किया जा सकता है, लेकिन कोई समाज अगर सामूहिक रूप से किसी अपराध में शामिल हो या किसी के अधिकारों का हनन कर रहा हो तो उसे न कोई न्यायपालिका, न कोई सरकार और न ही कोई अदालत रोक सकती है.’ जिस तरह के अपराधों का जिक्र डॉक्टर भीमराव आंबेडकर ने इस कथन में किया है, ये वही अपराध हैं जो हमारे समाज में दलितों और महिलाओं के साथ होते है. इन अपराधों में हमारा लगभग पूरा समाज शामिल है.

इस सच्चाई को कोई नहीं नकार सकता कि हमारा समाज पितृसत्तात्मक भी है और जातिवादी भी. लिहाजा महिलाओं और दलितों के साथ हमारा समाज सामूहिक रूप से अपराध करता है या कम-से-कम ऐसे अपराध होते हुए रोज़ देखता है और उन्हें चुपचाप स्वीकार भी करता है. उदाहरण के लिए, दहेज़ प्रथा. आज भी न सिर्फ गांव और दुर्गम इलाकों में बल्कि शहरों और महानगरों में भी दहेज़ खुलेआम लिया-दिया जाता है. ऐसी कई शादियों में हम शामिल होते हैं जहां दहेज़ में मिली गाड़ी सजा-धजाकर विवाह स्थल पर ही खड़ी मिलती है. हम लोग बड़े इत्मीनान से दूल्हे और उसके संबंधियों को शादी के साथ-साथ गाड़ी की भी बधाई देते हैं और लौट आते हैं. हमें यह एहसास तक नहीं होता कि हम एक अपराध में भागीदारी निभा कर लौट रहे हैं.

जब ऐसी ही कोई शादी जब टूटती है और लड़के वालों पर दहेज़ लेने या दहेज़ के चलते प्रताड़ित करने के आरोप लगते हैं तो बहस चल पड़ती है कि दहेज़ कानूनों का महिलाएं फायदा उठा रही हैं. क्या यह माना जा सकता है कि जिस समाज में हर दूसरी शादी में दहेज़ लिया-दिया जा रहा है, उस समाज में दहेज़ के चलते महिलाओं पर ताने नहीं मारे जाते होंगे, उनसे दहेज़ की मांग नहीं होती होगी या उन्हें इसके चलते प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रताड़ित नहीं जाता होगा?

ऐसा ही दलितों के मामले में भी है. गांव-देहात में ही नहीं बल्कि शहरों में रहने वाले पढ़े-लिखे लोग भी जमकर जातिगत भेदभाव और जातिसूचक टिप्पणियां करते हैं. हाल ही में हुए भारत बंद से ही इसके कई उदाहरण मिल सकते हैं. इस बंद को लेकर सोशल मीडिया से लेकर लोगों की आपसी बातचीत तक में ये टिप्पणियां शामिल थी कि, ‘जिनकी औकात हमारे बाप-दादाओं के सामने सर उठाने की नहीं थी, वही आज भारत बंद कर रहे हैं.’ इस प्रदर्शन में बाइक चलाती कुछ दलित लड़कियों की फोटो को भी लाखों लोग फेसबुक पर तरह-तरह के तंज कसते हुए शेयर कर रहे थे. ऐसी टिप्पणियां करना कानूनन अपराध है लेकिन हमारे समाज में यह इतना स्वीकार्य है कि हमें इसका एहसास तक नहीं होता. और जब ऐसे ही किसी भेदभाव के खिलाफ कोई दलित आवाज़ उठाता है और मुकदमा दायर करता है तो बहस चलती है कि दलित कानूनों का दुरूपयोग कर रहे हैं.

सिर्फ दलितों और महिलाओं पर ही कानूनों के दुरूपयोग का आरोप लगने की एक बड़ी वजह और भी है. यही दो कानून ऐसे हैं जिनके आरोपित सबसे ज्यादा संगठित हैं और समाज के सबसे वर्चस्वशाली वर्गों में शामिल हैं. देश भर में दहेज़ के आरोपितों के दर्जनों ‘अखिल भारतीय’ संगठन बने हुए हैं. ये संगठन ऐसे हर पुरुष का स्वागत करते हैं जिस पर दहेज़ लेने और दहेज़ के चलते अपनी पत्नी को प्रताड़ित करने के आरोप हों. इंटरनेट पर आसानी से ऐसे कई संगठनों की जानकारी मिल जाती है. जातीय भेदभाव और हिंसा के आरोपितों का समर्थन करने वाले संगठनों की संख्या तो और भी ज्यादा है. सवर्णों के कई-कई जाति आधारित संगठन देश के हर कोने में हैं जो दलितों के लिए बने कानूनों का खुलकर विरोध करते हैं.

इसी तरह के संगठन इस बहस को चलाते और हवा देते हैं कि दलित या महिला कानूनों का दुरूपयोग हो रहा है. चूंकि इस तरह के अपराध में समाज का बड़ा हिस्सा शामिल है इसलिए इस बहस को तेजी से हवा भी मिलती है और समर्थन भी मिलता है. इसमें कोई दोराय नहीं एसटी-एक्ट या दहेज़ संबंधी कानूनों के तहत कई बिलकुल झूठे मुकदमे भी दायर हुए हैं और यह बात खुलकर सामने भी आई है. लेकिन ऐसा तो लगभग हर अपराध के मामले में हुआ है. आतंकवाद के मामलों में तो कई लोग 14-15 साल जेल में बिताने के बाद निर्दोष साबित हुए हैं.

झूठे आरोपों से निपटने के प्रावधान पहले से ही हमारे कानून में मौजूद हैं. किसी भी व्यक्ति पर अगर कोई झूठा आरोप लगाया जाता है तो वह व्यक्ति निर्दोष साबित होने पर अपने लिए मुआवजे की मांग करने से लेकर झूठे आरोप लगाने वाले को जेल भिजवाने तक की कार्रवाई कर सकता है. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट को कमज़ोर करके और एफआईआर दर्ज करने से पहले एक और प्राथमिक जांच करने के निर्देश देकर एक बेहद नकारात्मक संदेश दिया है. ऐसा संदेश जो कहता है कि अब इस एक्ट के तहत आने वाली हर शिकायत को संदेह से देखा जाए. एफआईआर से पहले एक अन्य जांच करके ये सुनिश्चित करना कि कहीं शिकायतकर्ता झूठ तो नहीं बोल रहा, कानून और व्यवस्था का पीड़ित की बजाय आरोपित के साथ खड़े हो जाने जैसा है.

यदि ऐसे कानून का दुरूपयोग हो भी रहा है तो दुरूपयोग करने वालों के खिलाफ कोई व्यवस्था बनाने की जरूरत है. पूरे कानून को ही कमज़ोर कर देना और पीड़ितों को ही संदेह से देखना वापस उसी जातिवादी समाज की ओर लौटने जैसा है जिससे उबरने के लिए कई सालों के संघर्ष के बाद ये कानून बनाए गए थे.