अपने-अपने व्यापारिक हितों को लेकर अमेरिका और चीन अब आमने-सामने आ गए हैं. पिछले दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीन से आयात पर 60 अरब डॉलर का शुल्क लगाने की घोषणा की थी. इसके बाद पिछले हफ्ते चीन ने भी अमेरिकी आयात पर तीन अरब डॉलर का शुल्क लगाने का ऐलान कर दिया. चीन ने यह भी कहा है कि अगर डोनाल्ड ट्रंप जल्द ही अपना फैसला वापस नहीं लेते तो अमेरिका से आयात होने वाले करीब 130 बेहद जरूरी उत्पादों पर 15 से 25 फीसदी तक का शुल्क लगा देगा.

अमेरिका में चीन से होने वाले आयात का एक बड़ा व्यापारिक तबका लंबे समय से विरोध करता आ रहा है. इस विरोध के दो प्रमुख कारण हैं - बड़ा व्यापार घाटा यानी निर्यात से बहुत ज्यादा चीन से आयात होना और चीन द्वारा अमेरिकी बौद्धिक संपदा की चोरी. नवंबर 2016 में हुए अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने वादा किया था कि वे चीन जैसे देशों से व्यापार घाटे को खत्म करेंगे और ‘बौद्धिक संपदा चोरी’ के मामले में चीन पर सख्त कार्रवाई करेंगे.

अमेरिकी जांच में चीन पर लगे आरोप सही निकले

अपने चुनावी वादे पर गौर करते हुए बीते साल अगस्त में ट्रंप ने अमेरिकी बौद्धिक संपदा में सेंधमारी को लेकर चीन के खिलाफ जांच के आदेश दिए थे. सात महीने चली इस जांच में अमेरिकी कंपनियों द्वारा चीन पर लगाए गए अधिकांश आरोप सही निकले. जांच अधिकारियों के मुताबिक चीन में अमेरिकी कंपनियों की जासूसी कराई जाती है. अमेरिकी कंपनियों के आगे ऐसी शर्तें रखी जाती हैं कि चीनी कंपनियां किसी न किसी तरह अमेरिकी बौद्धिक संपदा की चोरी करने में कामयाब हो जाती हैं.

इस जांच से अलग हटकर भी देखें तो चीन ने बाहरी कंपनियों के निवेश को लेकर अपने नियम काफी कड़े कर रखे हैं. इन नियमों के मुताबिक विदेशी कंपनियों के लिए किसी चीनी कंपनी से साझेदारी करनी जरूरी है. इस साझेदारी के सात साल बाद दोनों कंपनियों को मिलकर एक साझा प्रोडक्ट तैयार करना पड़ता है. यूरोप की कंपनियां भी समय-समय पर इस नियम का विरोध करती रही हैं. इनका कहना है कि साझा प्रोडक्ट के जरिए चीन उनका तकनीकी ज्ञान हासिल करने की कोशिश करता है.

अमेरिका में निवेश कर रही चीनी कंपनियों के खिलाफ भी बौद्धिक संपदा चोरी करने के आरोप लगते रहे हैं. अमेरिका में इसे लेकर कई चीनी कंपनियों पर भारी जुर्माना भी लगाया जा चुका है. इन मामलों पर अमेरिकी जांच रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐसा लगता है कि चीन किसी ख़ास रणनीति के तहत अमेरिका के कुछ सेक्टर्स में निवेश कर रहा है. रिपोर्ट के मुताबिक चीन ऐसा करके कुछ गोपनीय जानकारी हासिल करना चाहता है.

जांच रिपोर्ट आने के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का कहना था कि चीन अमेरिकी बौद्धिक संपदा की चोरी कर अमेरिका को हर साल 225 से 600 अरब डॉलर तक का नुकसान पहुंचाता है. साथ ही उसकी वजह से अमेरिका को हर साल 300-400 अरब डॉलर का व्यापार घाटा भी होता है. ट्रंप के मुताबिक ऐसे हालात में चीन पर कार्रवाई करना जरूरी है.

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इसके बाद ट्रंप ने पहले चीन से आने वाले स्टील और एल्युमीनियम पर 25 फीसदी तक का शुल्क लगा दिया और फिर चीन पर 50 अरब डॉलर का अर्थदंड लगाने का फैसला किया. ट्रंप ने अमेरिकी राजस्व विभाग को यह आदेश भी दिया है कि वे ऐसे नियम बनाएं जिससे अमेरिका में चीनी निवेश को सीमित किया जा सके और चीनी कंपनियों को अमेरिकी बौद्धिक संपदा की चोरी करने से रोका जा सके. अमेरिकी राष्ट्रपति से कहा गया कि उनके कदमों से ट्रेड वार यानी व्यापारिक युद्ध भी छिड़ सकता है. इस पर उनका कहना था कि अगर उनके फैसले से ऐसा होता है तो भी उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि इसमें अमेरिका की जीत निश्चित है.

व्यापार युद्ध से किसे कितना घाटा होगा?

हालांकि, दुनिया भर के जानकारों की राय डोनाल्ड ट्रंप से एकदम जुदा है. इन लोगों के मुताबिक अगर व्यापार युद्ध छिड़ा तो इसमें दोनों को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा और जीत किसी की भी नहीं होने वाली. अमरीका में इसके परिणामस्वरूप जो भी उद्योग चीनी आयात पर निर्भर हैं, वे अपने उत्पादों की कीमत बढ़ा देंगे और अपने कर्मचारियों की छंटनी भी करने लगेंगे.

उदाहारण के तौर पर अमेरिका ने चीन के स्टील और एल्युमिनियम पर शुल्क बढ़ाया है. इसके बाद अमेरिका की जो भी इंडस्ट्रीज इन पर निर्भर हैं उन्हें सस्ता स्टील और एल्युमिनियम मिलना बंद हो जाएगा. ऐसे में वे अपने नुकसान की भरपाई कर्मचारियों की संख्या में कटौती कर या फिर अपने उत्पादों के दाम बढ़ाकर करेंगी. इसी तरह चीन से आने वाली हर चीज अमेरिका में महंगी होगी. एक सर्वे के मुताबिक अमेरिका में सबसे निम्न वर्ग का व्यक्ति भी चीन के सस्ते समान की वजह से 250 से 300 डॉलर तक की वार्षिक बचत कर लेता है. ऐसे में अगर चीनी सामान बंद हुआ तो उसकी बचत पर चपत लगना लाजमी है.

अमेरिका के आगे इससे भी बड़ी दिक्कत तब आएगी जब चीन बदले की कार्रवाई के तहत अमेरिकी कृषि और तकनीक से जुड़े उत्पादों पर अतिरिक्त शुल्क लगाने की घोषणा करेगा. अमेरिकी सोयाबीन की ही बात करें तो अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा सोयाबीन उत्पादक देश है, साथ ही सोयाबीन की खेती उसकी कृषि की रीढ़ की तरह मानी जाती है. आंकड़े बताते हैं कि चीन हर साल अमेरिका का करीब 60 फीसदी तक सोयाबीन खरीदता है. ऐसे चीन के शुल्क लगाने से इसकी सीधी मार अमेरिकी किसानों को झेलनी पड़ेगी.

अर्थजगत के कई जानकार बताते हैं कि चीन द्वारा आयात शुल्क बढ़ाना अमेरिकी तकनीक कंपनियों के लिए तबाही जैसा होने वाला है. ख़ासकर अमेरिका की सेमीकंडक्टर निर्माता कंपनी क्वालकॉम और इंटेल को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा क्योंकि इनके लिये अब चीन अमेरिका से भी बड़ा बाजार बन चुका है. ऐसा ही कुछ आईफ़ोन निर्माता कंपनी एपल के साथ भी हो सकता है. एपल के लिए चीन का क्या महत्व है इसका पता इस आंकड़े से लगता है. साल 2015-16 में चीनी उपभोक्ताओं ने 13 करोड़ से ज्यादा आईफ़ोन खरीदे थे जबकि इसी अवधि में अमेरिकी ग्राहकों के मामले में यह संख्या केवल 11 करोड़ ही थी.

व्यापार युद्ध में बड़ा झटका अमेरिकी यात्री विमानन कंपनी बोइंग को भी लगना निश्चित है जिसने चीन से कई बड़े आर्डर ले रखे हैं. एक रिपोर्ट के अनुसार बोइंग को आने वाले 15-20 सालों में चीन से करीब 1.1 खरब डॉलर के सात हजार से ज्यादा विमानों का आर्डर मिलने की भी उम्मीद है. दिसंबर 2016 में खुद बोइंग के उपाध्यक्ष रे कॉनर ने माना था कि चीन की वजह से उनकी कंपनी ने डेढ़ लाख लोगों को अमेरिका में नौकरी दे रखी है.

इन कुछ बड़ी कंपनियों के अलावा भी सैकड़ों अमेरिकी कंपनियों के उत्पादों की अमेरिका से ज्यादा खपत चीन में है. ऐसे में जानकारों का मानना है कि चीन के सख्त रुख के बाद अमेरिका के लिए इन्हें संभालना मुश्किल पड़ जाएगा. उसे सबसे ज्यादा परेशानी रोजगार के मामले में होगी क्योंकि तब ये कंपनियां अपने कर्मचारियों की छंटनी करने को मजबूर हो जाएंगी.

चीनी पुलिस अधिकारी चीन के पूर्वी शेडोंग प्रांत में स्थित एक बंदरगाह पर एक मालवाहक जहाज की निगरानी करते हुए | फोटो : एएफपी
चीनी पुलिस अधिकारी चीन के पूर्वी शेडोंग प्रांत में स्थित एक बंदरगाह पर एक मालवाहक जहाज की निगरानी करते हुए | फोटो : एएफपी

अगर इस व्यापार युद्ध को चीन के नजिरये से देखें तो ऐसा ही कुछ चीन में भी देखने को मिलेगा क्योंकि चीन के कुल निर्यात में अमेरिका की 18 फीसदी हिस्सेदारी है. इसके अलावा चीन की जीडीपी में उसके कुल निर्यात की 20 फीसदी की भागेदारी है. ऐसे में चीन पर भी फर्क पड़ना लाजमी है. ज्यादातर विश्लेषकों का यह भी कहना है कि चीन के अमेरिकी निर्यात को देखते हुए इस व्यापार युद्ध की शुरुआत में सबसे ज्यादा नुकसान चीन को ही होगा.

जल्द सहमति न बनी तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था को ज्यादा नुकसान

दुनियाभर के जानकारों का मानना है कि इस व्यापार युद्ध की शुरुआत में चीन अमेरिका से ज्यादा नुकसान उठाता नजर आएगा क्योंकि उसके यहां बने उत्पादों का एक बड़ा हिस्सा अमेरिका में खपता है. उसे तब तक यह नुकसान उठाना ही पड़ेगा जब तक वह कोई दूसरा वैकल्पिक बाज़ार नहीं खोज लेता. हालांकि, माना जा रहा है कि उसे यह विकल्प खोजने में ज्यादा समय नहीं लगेगा क्योंकि खुद उसके पास भी एक बड़ा बाजार है, दूसरा चीनी उत्पादों की कम कीमत की वजह से उन्हें किसी भी बाजार में जगह बनाने में ज्यादा समय नहीं लगता है.

अगर चीन में अमेरिका से होने वाले आयात की बात करें तो इस मामले में चीन को लगभग न के बराबर ही नुकसान उठाना पड़ेगा. इसके भी कई कारण हैं. एक तो चीन तमाम क्षेत्रों में जिस तेजी से प्रगति कर रहा है उसे देखते हुए वैसे भी उसे अमेरिकी कम्पनियों पर ज्यादा दिन निर्भर रहने की जरूरत नहीं पड़ने वाली. उदाहरण के लिए चीनी सरकार पिछले कुछ सालों से जिस तरह से अपने यहां की सेमीकंडक्टर निर्माता कंपनियों और एयरक्राफ्ट कंपनियों को प्रोत्साहन दे रही है, उससे इन क्षेत्रों में भी उसके जल्द आत्मनिर्भर बनने की इच्छा शक्ति का पता लगता है. इसके अलावा चीन के पास अमेरिका से हटकर अन्य देशों से आयात करने का विकल्प भी खुला हुआ है. यात्री एयरक्राफ्ट के मामले में ही देखें तो फ़्रांस की कंपनी ‘एयरबस’ चीन से अनुबंध करने को तैयार बैठी है.

उधर, अगर अमेरिका की बात करें तो व्यापार युद्ध लंबा खिंचने पर चीन से कहीं ज्यादा नुकसान उसे उठाना पड़ेगा. चीनी आयात में गिरावट से अमेरिकियों को लगातार महंगाई की मार झेलनी ही पड़ेगी क्योंकि चीन के सस्ते उत्पाद का कोई दूसरा विकल्प ही नहीं है. इसके अलावा निर्यात के मामले में अमेरिका को अपने कृषि और तकनीक उत्पादों के लिए चीनी बाजार का विकल्प ढूंढना पड़ेगा जोकि एक बेहद मुश्किल काम होगा. क्योंकि चीन के बराबर बड़ा दूसरा बाजार मिलना नामुमकिन ही है. ऐसे में अमेरिका के इन क्षेत्रों को जो नुकसान होगा उसकी उसे भरपाई करना मुश्किल हो जाएगा. ऐसे में अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर महंगाई और बेरोजगारी दोनों का ही संकट छा जाएगा.

थोड़ा और साफ़ शब्दों में कहा जाए तो चीन को केवल निर्यात के मामले में ही नुकसान उठाना पड़ेगा और वह भी शुरू के सालों में जबकि, इससे अलग अमेरिकी अर्थव्यवस्था को आयात और निर्यात दोनों मोर्चों पर मार झेलनी पड़ेगी.

चीन का जल्द झुकना संभव नहीं लगता

कुछ लोगों का यह भी मानना है कि चीन को होने वाले शुरूआती बड़े नुकसान को देखते हुए डोनाल्ड ट्रंप ने शुल्क बढ़ाने का दांव चला है क्योंकि उन्हें लगता है कि इस वजह से चीन उनके सामने झुक जाएगा. लेकिन, ये लोग कहते हैं कि ऐसा होना मुश्किल ही लगता है. दरअसल, डोनाल्ड ट्रंप चाहते हैं कि चीन उन शर्तों को खत्म करे जिनकी वजह से अमेरिकी बौद्धिक संपदा की चीन में चोरी होती है. अब अगर चीन अमेरिकी कंपनियों के लिए शर्तों में ढ़ील देता है तो फिर यूरोप की कंपनियां भी ऐसी ही मांग को लेकर अड़ जाएंगी. इसी कारण चीन के अमेरिका के सामने झुकने की संभावना बहुत कम ही नजर आती है.