बीती आठ अप्रैल की बात है. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में पत्रकारों से अनौपचारिक बातचीत कर रहे थे. बातों-बातों में उनके मुंह से अंदर की एक ऐसी बात बाहर आ गई जिसका रिश्ता उत्तर प्रदेश की सियासत से है. राहुल गांधी ने कहा कि 2019 में मोदी सरकार बनना तो दूर वाराणसी से नरेंद्र मोदी अपना चुनाव भी हार सकते हैं, शर्त यह है कि विपक्ष एकजुट हो जाए.

कर्नाटक से लेकर दिल्ली तक के पत्रकारों को लगा कि राहुल का यह बयान बस एक अच्छी हेडलाइन बनाने भर के लिए था, लेकिन कांग्रेस के कुछ नेताओं को राहुल की बात के पीछे की खबर का अंदाज़ा था. सुनी-सुनाई से कुछ ज्यादा है कि राहुल गांधी पिछले कुछ दिनों से उत्तर प्रदेश पर ध्यान दे रहे हैं. लेकिन इस बार वे यह काम प्रशांत किशोर के जरिए नहीं कर रहे. सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस अध्यक्ष खुद अखिलेश यादव और मायावती के संपर्क में हैं. यह राहुल गांधी का ही आइडिया है कि अखिलेश यादव को प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ वाराणसी से चुनाव लड़ाया जाए.

सुनी-सुनाई पर यकीन करें तो राहुल गांधी ने अखिलेश यादव से वादा किया है कि अगर वे चुनाव लड़ने के लिए तैयार हुए तो इस बार नरेंद्र मोदी और उनके बीच आमने-सामने की टक्कर होगी और अखिलेश संयुक्त विपक्ष की तरफ से इकलौते उम्मीदवार होंगे.

लेकिन क्या अखिलेश यादव इस पर राजी हैं? उनके एक बेहद करीबी नेता ने नाम न जाहिर होने की शर्त पर बताया कि अखिलेश अभी हां या ना कहने की स्थिति में नहीं हैं. वे वाराणसी की एक-एक विधानसभा इलाके के आंकड़े गिनवा रहे हैं. इसमें अखिलेश यादव की मदद एक ऐसे व्यक्ति कर रहे हैं जो पहले अमित शाह के बेहद करीब थे, लेकिन अब अखिलेश के चाचा राम गोपाल यादव के एकदम विश्वस्त सलाहकार बन गए हैं. इसी खास व्यक्ति ने सबसे पहले अमित शाह को वाराणसी आने का न्योता दिया था. जब अमित शाह गुजरात से बाहर दिल्ली में रहने पर मजबूर थे तो उस वक्त ही उनके दिमाग में नरेंद्र मोदी को वाराणसी से चुनाव लड़ाने का आइडिया आया था.

कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के जो नेता अखिलेश यादव को वाराणसी से चुनाव लड़ने के फायदे गिना रहे हैं वे बताते हैं कि इस रिस्क में तो लाभ ही लाभ है. उनके मुताबिक चुनाव के वक्त नरेंद्र मोदी को वाराणसी में घेरने का इससे अच्छा कोई और दांव हो ही नहीं सकता. अखिलेश यादव चुनाव हार भी गए तो सीधे सीधे मोदी के चैलेंजर के तौर पर गिने जाएंगे और चुनाव जीत गए तो सबसे बड़े उलटफेर के नायक बन जाएंगे.

लखनऊ में अखिलेश के करीबी एक पत्रकार की मानें तो यह करीब-करीब तय है कि अखिलेश यादव अगला लोकसभा चुनाव लड़ेंगे. अब तक माना जा रहा था कि वे अपनी पत्नी डिंपल यादव की सीट कन्नौज को चुनेंगे क्योंकि यह समाजवादी पार्टी की मजबूत सीट है और अखिलेश यहां से आसानी से चुनाव जीत सकते हैं. अखिलेश ने इसी बाबत एलान भी कर दिया था कि अगली बार लोकसभा चुनाव में डिंपल मैदान से बाहर रहेंगी. लेकिन सुनी-सुनाई है कि गोरखपुर और फूलपुर में भाजपा को हराने के बाद कांग्रेस, सपा और बसपा तीनों पार्टियों ने अपनी रणनीति दोबारा बदली है.

और इस बार शुरुआत सीधे राहुल गांधी के स्तर पर हुई है. 24 अकबर रोड के अंदर की खबर रखने वाले एक सूत्र की मानें तो राहुल गांधी ने करीब करीब मान लिया है कि उत्तर प्रदेश मे लोकसभा चुनाव कांग्रेस सपा और बसपा तीनों साथ लड़ेंगे. इसके लिए कांग्रेस को तीसरे पायदान पर बैठना होगा, पर राहुल इसके लिए तैयार दिखते हैं. बशर्ते अखिलेश और मायावती भी अगला लोकसभा चुनाव पूरी ताकत के साथ लड़ें. खबर तो यहां तक आ रही है कि उत्तर प्रदेश में राहुल ने अखिलेश के साथ साथ मायावती को भी लोकसभा चुनाव लड़ने का निमंत्रण दिया है.

कांग्रेस की रणनीति बनाने में शामिल एक अहम व्यक्ति बताते हैं, ‘अखिलेश अगर वाराणसी से चुनाव लड़ते हैं तो पूर्वी उत्तर प्रदेश से काशी तक माहौल बनेगा, इसी तरह अमेठी से राहुल गांधी खुद चुनाव लड़ेंगे तो सेंट्रल यूपी में हवा बनाने में मदद मिलेगी. मायावती को पश्चिमी उत्तर प्रदेश की एक सीट चुनने के लिए कहा गया है और वो सीट सहारनपुर हो सकती है. मायावती ने अभी तक लोकसभा चुनाव लड़ने पर हामी नहीं भरी है, लेकिन अखिलेश ने अपना मन बना लिया है.’

अखिलेश यादव के परिवार के समीकरण देखें तो उनके पास भी ज्यादा रास्ते नहीं हैं. पिता मुलायम सिंह ने पहले ही कह दिया है कि वे इस बार अपनी पुरानी परंपरागत सीट मैनपुरी से ही चुनाव लड़ेंगे. मुलायम अभी आज़मगढ़ से सांसद हैं. फिलहाल मैनपुरी से अखिलेश के परिवार के तेजप्रताप यादव सांसद हैं. अखिलेश को तेजप्रताप के लिए भी एक सुरक्षित सीट ढूंढनी होगी. सुनी-सुनाई है कि अखिलेश के सबसे खास सलाहकार और उनके चाचा रामगोपाल यादव भी इस बार लोकसभा चुनाव लड़ने के इच्छुक बताए जाते हैं. रामगोपाल ने अब तक राज्यसभा की ही राजनीति की है, लेकिन अब वे चुनावी मैदान में उतरना चाहते हैं. अखिलेश उन्हें भी निराश नहीं करना चाहते, इसलिए संभल और कन्नौज जैसी समाजवादी पार्टी की मजबूत सीटें इन दोनों को दी जा सकती हैं.

सूत्रों के मुताबिक अखिलेश यादव के एक करीबी ने दिल्ली के कुछ खास लोगों से वाराणसी की सीट का आकलन करने के लिए कहा था. इस आकलन में बताया गया कि पिछली बार अरविंद केजरीवाल ने यह जोखिम उठाया था, आम आदमी पार्टी का उत्तर प्रदेश में संगठन तक नहीं था फिर भी केजरीवाल नंबर दो पर रहे और उन्हें करीब 20 फीसदी वोट मिला. उस वक्त वाराणसी में कांग्रेस, सपा, बसपा सबने अपने उम्मीदवार उतारे थे. अखिलेश यादव को बताया गया है कि अगर वे चुनाव लड़ते हैं तो मोदी विरोधी वोटों का बंटवारा पूरी तरह रुकेगा. 2014 में मोदी लहर के बीच नरेंद्र मोदी को वाराणसी में करीब 56 फीसदी वोट मिले थे, अगर इस बार अखिलेश 10 फीसदी वोट का हेर-फेर कर पाए तो वे बड़ा उलटफेर कर सकते हैं.