2018 के चौथे महीने की पहली तारीख से कश्मीर घाटी में शुरू हुए हिंसा के ताज़ा सिलसिले के साथ जैसे-जैसे प्रतिरोध के स्वर तेज़ हो रहे हैं ठीक उसी रफ्तार से मसले का राजनीतिक हल निकाले जाने की मांग भी फिर से उठ रही है. इस दौरान संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने कश्मीर में हो रही नागरिक हत्याओं पर चिंता जताई है तो नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारुख अब्दुल्ला ने गृहमंत्री राजनाथ सिंह से मिलकर कश्मीर समस्या को लेकर एक गंभीर राजनीतिक पहल की मांग की है.

बीती 15 तारीख को भारतीय सेना प्रमुख जनरल विपिन रावत ने भी कहा कि कश्मीर में सेना हो या मिलिटेंट, दोनों में से कोई भी अपना लक्ष्य बंदूक के दम पर हासिल नहीं कर सकता. उन्होंने कहा कि इन दोनों को ही शांति के रास्ते पर बढ़ने के लिए एक साथ आना पड़ेगा. ठीक इसी दिन पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल क़मर जावेद बाजवा का भी बयान आया कि कश्मीर मुद्दे का हल सार्थक बातचीत से ही संभव है. दोनों देशों के सेना प्रमुखों के बयानों का स्वागत करते हुए कश्मीर में भारत सरकार के विशेष प्रतिनिधि दिनेश्वर शर्मा ने इसे एक सकारात्मक संकेत बताया. लेकिन इसकी जिम्मेदारी तो उन पर ही है. तो उन्होंने और उनसे पहले उऩकी जगह रहे लोगों ने इस मामले में अब तक क्या किया है?

राजनीतिक पहल के नाम पर पिछले साल अक्टूबर में केंद्र सरकार ने इंटेलिजेंस ब्यूरो के पूर्व निदेशक रहे दिनेश्वर शर्मा को कश्मीर में इंटरलॉक्यूटर बनाने का फैसला किया था. जम्मू-कश्मीर के लोगों की न्यायसंगत आकांक्षाओं को समझने के लिए नियुक्त किये गये शर्मा का तब कहना था कि उनकी सबसे बड़ी प्राथमिकता और चुनौती यहां के युवाओं को डीरेडिकलाइज़ कर, घाटी को भारत का सीरिया बनने से रोकना है. लेकिन बमुश्किल छह महीने ही बीते, घाटी के शोपियां ज़िले से एक दिन में 19 लोगों के मारे जाने की खबर आ गई. जबकि इससे केवल एक महीने पहले 23 फरवरी को शोपियां की ही यात्रा के बाद शर्मा का बयान आया था कि, ‘इस बार माहौल थोड़ा ठीक लगा.’ इससे पहले नवंबर में भी वे शोपियां गए थे.

नए इंटरलॉक्यूटर से कश्मीर को क्या उम्मीदें हैं? इस सवाल पर ज़्यादातर कश्मीरियों के चेहरे पर खीज भरी हंसी उतर आती है. दिल्ली में सिविल सर्विसेज़ की तैयारी कर रहे अनंतनाग के उमर मलिक इस सवाल के जवाब में हाथोर्न एक्सपेरिमेंट की याद दिलाते हैं. वे कहते हैं, ‘ये इंटरलॉक्यूटर्स भेज के दिल्ली भी कश्मीर के साथ वही करती है जो हाथोर्न एक्सपेरिमेंट में वेस्टर्न इलेक्ट्रिक के एम्पलाईज़ के साथ किया गया था. जब खराब लाइट में काम कर रहे लोगों की प्रोडक्टिविटी कम हुई तो लाइटिंग ठीक करने के बजाय कुछ लोगों को उनकी परेशानियां जानने के लिए भेज दिया गया. और जब एम्प्लॉईज़ ने देखा कि कोई उनकी फिक्र कर रहा है, तो उनकी प्रोडक्टिविटी बेहतर हो गई. दिनेश्वर शर्मा या बाकी इंटरलॉक्यूटर्स को भेज कर इंडिया भी कश्मीरियों के साथ यही कर रहा है.’

‘बात करते हैं ये डाइलॉग्स की, लेकिन न तो ये स्टेकहोल्डर्स को ऑनबोर्ड लेते हैं और न ही पाकिस्तान के साथ कोई पैरलल डाइलॉग शुरू होता है. ऊपर से ये जो रिपोर्ट सेंटर को देते हैं, उसे कूड़ेदान में फेंक दिया जाता है, तो फिर क्या फायदा इस सारे नाटक का. पूरा कश्मीर इनकी असलियत जानता है’ उमर शिकायत करते हैं.

साल 2000 के बाद से केंद्र कई बार कश्मीर में अपने नुमाइंदे भेज चुका है. पहली बार वाजपेयी सरकार ने 2001 में योजना आयोग के पूर्व अध्यक्ष केसी पंत को कश्मीर भेजा था. इन्होंने नेशनल कॉन्फ्रेंस की मांग की तर्ज पर कश्मीर को और अधिक स्वायत्तता देने की सिफारिश की थी. साथ ही ये भी कहा था कि सेना को नागरिकों को अपने विश्वास में लेने की कोशिश करनी चाहिए और नागरिक इलाकों में ऑपरेशन करते वक्त बेहद संयम और एहतियात से काम लेना चाहिए.

उसके बाद 2002 में अरुण जेटली और राम जेठमलानी की टीमों को भेजा गया. जेठमलानी की टीम को ज़िम्मा दिया गया कि वे अलगाववादियों को 2002 में होने वाले विधानसभा चुनावों में हिस्सा लेने के लिए मना लें. जेठमलानी ने सिफारिश की कि चुनावों को कुछ समय के लिए टाल दिया जाये ताकि अलगाववादियों को सोचने का वक्त मिल सके. लेकिन केंद्र ने उनके सुझावों को नहीं माना. तय समय पर चुनाव हुए. पीडीपी ने कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बना ली. और हुर्रियत को भारतीय तंत्र में शामिल करने की एक गुंजाइश हाथ से जाती रही.

2003 में एक बार फिर केंद्र ने बातचीत की शुरूआत की. जम्मू-कश्मीर के वर्तमान गवर्नर एनएन वोहरा को श्रीनगर भेजा गया. उनकी सिफारिश के आधार पर तत्कालीन गृहमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी ने जनवरी और मार्च 2004 में हुर्रियत के नरम धड़े के साथ वार्ताएं आयोजित कीं. हालांकि इनका कोई नतीजा नहीं निकला. और फिर 2004 में ही एनडीए की हार के बाद ये सिलसिला वहीं रुक गया.

यूपीए सरकार के आने के बाद सितंबर 2005 में मीरवाइज़ उमर फारूक की अगुवाई में हुर्रियत का एक डेलीगेशन तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिला. इसके बाद हुर्रियत ने घाटी में किसी भी तरह की हड़ताल, बंद और हिंसा से खुद को दूर रखने का भरोसा दिलाया ताकि हर तबके के नुमाइंदों को वार्ता में शामिल किया जा सके. 2006 में भी पीपल्स कॉन्फ्रेंस के सज्जाद लोन और फिर जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के यासीन मलिक के नेतृत्व में भी कश्मीरी डेलीगेशन प्रधानमंत्री से मिले. राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस भी हुई, लेकिन न तो इन्होंने अपनी मांगों को ठीक तरह सामने रखा, और न ही केंद्र ने इनके सुझावों को मानने की ज़हमत उठाई. सारी कवायद के नतीज़े लगभग सिफर रहे.

2010 की अशांति और विरोध प्रदर्शनों के दौरान जब 100 से ज़्यादा कश्मीरी नागरिक मारे गए, तब यूपीए-दो सरकार ने पत्रकार दिलीप पडगांवकर, पूर्व सूचना आयुक्त एमएम अंसारी और शिक्षाविद राधा कुमार की कमेटी को कश्मीर भेजा. लंबी बातचीत के बाद इस कमेटी ने 2011 में सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपी. 2012 में इस रिपोर्ट को तो सार्वजनिक कर दिया गया लेकिन केंद्र और राज्य दोनों ही सरकारें इसमें शामिल सिफारिशों को अमल में लाने से बचती रहीं.

यह एक बड़ी वजह है कि अब कश्मीर में इस तरह की कवायदों को एक निरर्थक प्रयास के तौर पर देखा जाने लगा है. याद रहे कि शर्मा नवंबर में यह कह चुकने के बाद कि वे हुर्रियत से मिलकर बात करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं, अपनी इन कोशिशों को अब तक अमली जामा नहीं पहना पाए हैं. उनसे मिलने के बाद जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने यहां तक कह दिया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिनेश्वर शर्मा का कद घटा दिया है. उन्होंने यह भी कहा कि शर्मा को गेस्ट हाउस में बैठकर लोगों का इंतज़ार करने के बजाय बाहर निकल कर लोगों से मिलना चाहिए.

राज्य में कांग्रेस की गतिविधियों से जुड़े हुए मीर आदिल इस बारे में एक अलग ही राय साझा करते हैं. वे कहते हैं, ‘एनडीए ने जैसे वोहरा को यहां इंटरलॉक्यूटर बना कर भेजा था. वैसे ही इस बार दिनेश्वर शर्मा को भेजा गया है ताकि उन्हें कश्मीर का अगला गवर्नर बना दिया जाये. वैसे भी कश्मीर शर्मा के लिए नया सब्जेक्ट नहीं है.’ दिनेश्वर शर्मा ने साल 1992-94 में इंटेलिजेंस ब्यूरो के सहायक निदेशक के तौर पर कश्मीर में काम किया है. इसके बाद वे दिल्ली में कश्मीर डेस्क के अध्यक्ष भी रहे हैं.

हुर्रियत से मिलने के सवाल पर कश्मीर यूनिवर्सिटी के शोध विद्यार्थी रूफ भट कहते हैं, ‘मीडिया दिखाने की कोशिश कर रहा है कि हुर्रियत डाइलॉग प्रोसेस से दूर रहना चाहती है, लेकिन असलियत ये है कि सेंटर चाहता ही नहीं कि उससे बात की जाये. जब हुर्रियत के पास कोई फॉर्मल इनवीटेशन जाएगा ही नहीं तो फिर बात कैसे शुरू हो सकती है?’