27 अप्रैल को रिलीज होने जा रही ‘दास देव’ के निर्देशक सुधीर मिश्रा पलायनवादी और समझौतावादी सिनेमा कभी नहीं बनाते. उनकी फिल्मों का यथार्थ जीवन के सूक्ष्म निरीक्षण से जन्म लेता है और इसीलिए दर्शकों से सीधे संवाद करता है. उनकी फिल्मों को रिलीज हुए पच्चीस साल गुजर चुके हों (‘धारावी’) या तेरह (‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी’), वे आपके साथ हमेशा बनी रहती हैं. सत्याग्रह से बातचीत में सुधीर कहते भी हैं कि मेरी कुछ कहानियों में ‘मैं’ रहता हूं. फिर ट्विटर पर कभी आलोचनात्मक लहजे में लिखते हैं कि ‘जो (लोग) कुछ महसूस ही नहीं करते, वो दूसरों के तजुर्बे चुराने के अलावा क्या कर सकते हैं.’

इंडिपेंडेंट हिंदी सिनेमा की इस सबसे ऊंची शख्सियत के कुछ तजुर्बे इस साक्षात्कार में दर्ज हैं. कुछ ऐसे जीवन-दर्शन अपने मर्म के साथ मौजूद हैं जिन्होंने उनकी फिल्मों को गढ़ा है. साहिर लुधियानवी की एक नज्म पर अलहदा नजरिया इसमें मिलता है तो एक खुश कर देने वाला जवाब भी कि उनकी सबसे ज्यादा सेलिब्रेटिड फिल्म का सीक्वल वे जरूर बनाएंगे.

उसी लंबी बातचीत के संपादित अंश, जिन्हें पढ़ने में सबसे ज्यादा लुत्फ आएगा अगर आप सुधीर मिश्रा के सिनेमा को पहले से जानते और समझते रहे होंगे :

आपने ‘दास देव’ में सचमुच, सब कुछ उलट दिया है. सिर्फ नायक ही नहीं, जिसे आपने नशे और इश्क के दास से देव बनते दिखाया है, बल्कि वो अभिनेत्री जो सूरत से नाजुक पारो सी लगती है - ईश! बोलने वाली - उन अदिति राव हैदरी को बिंदास चंद्रमुखी का किरदार दिया है. जिन ऋचा चड्ढा को देखकर लगता है कि वे चंद्रमुखी के आत्मविश्वासी किरदार में एकदम फिट बैठेंगी, उन्हें प्यार में डूबी पारो बनाया है. ये तो आपने देवदास की सौ साल पुरानी कहानी में अनुराग कश्यप की ‘देव-डी’ की टक्कर का नयापन भर दिया है.

अनुराग की फिल्म मुझे बहुत अच्छी लगी थी, लेकिन ‘दास देव’ एक तरह से रीइमेजिनेशन है. देवदास के कैरेक्टर्स को लेकर नए संदर्भ में डालने पर कहानी भी बदल जाती है. किरदारों की दिशा बदल जाती है. वो कुछ और करने लग जाते हैं. अंत दूसरा हो जाता है, पात्र कुछ और जुड़ जाते हैं. फिर इसमें शेक्सपियर साहब ने बहुत दखल दी है. सौरभ शुक्ला का जो कैरेक्टर है, वो तो देवदास में है ही नहीं.

पारो और देव का इश्क तो कभी नहीं बदलता, लेकिन क्या आड़े आता है उनके इश्क के, वो सब यहां अलग है. और फिर देव करता क्या है, सिर्फ पारो की कोठी के बाहर मर जाता है, या कुछ और करता है, इन सब को ‘दास देव’ टटोलती है.

आप कई मंचों पर बता चुके हैं कि शरत बाबू की देवदास के अलावा ‘दास देव’ में शेक्सपियर का त्रासद हेमलेट भी मौजूद है. लेकिन क्या ‘दास देव’ में कहीं ‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी’ भी मौजूद है?

‘हजारों...’ से बहुत अलग है. ये पावर के बारे में है, और पावर की जो जकड़ है, उसका नशा है उसके बारे में. दास से देव बनने की जर्नी के दौरान क्या वो इस नशे से मुक्त हो पाता है, इस बारे में है. क्योंकि इश्क और पावर साथ नहीं रह सकते, विपरीत हैं एक-दूसरे के. कोई एक, दूसरे को खत्म करेगा ही. तो यहां कहानी है कि क्या सत्ता और उसके नशे के इस दलदल में इश्क मुमकिन है... फिल्म यही जर्नी दिखाने वाली है.

आपने एक बार कहा था कि आप उन विषयों पर फिल्म नहीं बनाते जिनके बारे में आप जानते नहीं. ज्यादा रिसर्च करके फिल्में बनाने में आपका यकीन नहीं है. ‘धारावी’ (1993) भी आपके आंखों देखे सच पर आधारित थी और ‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी’ (2005) भी. तो फिर ‘दास देव’ का वो आंखों देखा सच क्या है?

(सुधीर मिश्रा ने 80 के दशक में धारावी बस्ती को करीब से देखा-जाना था और मुंबई के अपने अनुभवों को मिलाकर ‘धारावी’ फिल्म बनाई थी. इमरजेंसी के वक्त वे 16-17 साल के थे और उन सभी किरदारों की जिंदगी उन्होंने देखी हुई थी जो ‘हजारों...’ में नजर आते हैं.)

‘इस रात की सुबह नहीं’ (1996) और ‘ये वो मंजिल तो नहीं’ (1987) भी कुछ-कुछ आंखों देखा सच ही है. मेरी कुछ कहानियों का मुझ से ताल्लुक रहता है.

(बहुत थोड़ा-सा रुक कर) द्वारका प्रसाद मिश्र मेरे नाना थे. चीफ मिनिस्टर हुआ करते थे मध्य प्रदेश के (1963-67). कहा जाता है कि इंदिरा जी जब पावर में आईं तो वे उनके बहुत करीब थे. जब वे सियासत छोड़ रहे थे तो किसी ने उनसे पूछा कि अपने बेटों को राजनीति में लेकर क्यों नहीं आते. इस पर उनका कहना था कि अगर तुम किसी नेता के बेटे हो तो इससे सत्ता तुम्हारी नहीं हो जाती!

जब मैं बड़ा हो रहा था तब भी मुझसे कई लोग कहते थे कि नाना से बोलो न, आपको पॉलिटिक्स में डाल दें. वो हंसते थे इस बात पर...उन्होंने कभी किसी की कोई मदद ही नहीं की. अलग ही सपने को जी रहे थे (आजादी के बाद वाले दौर के आदर्शवाद को). ये तक नहीं किया कि अपने किसी पॉलिटिकल आदमी को बोल देते कि मेरा नाती बॉम्बे आ रहा है, थोड़ा खयाल रख लेना.

हम लोग ऐसे ही बेहद साधारण, आम माहौल में रहे, और ये बहुत अच्छी बात थी. लेकिन मैं कभी-कभी इमेजिन करता था कि अगर जिंदगी वैसी नहीं होती और मुझे भी अपने नाना की राजनीति की लत लग जाती, तो जिंदगी कैसी होती. क्योंकि पावर में डूबे, उसकी लत में फंसे बहुत लोगों को एक जमाने में आसपास देखा था. उसकी जो वायलेंस है, उसको देखा था. उसी सोच से ‘दास देव’ के नायक का किरदार निकल कर आया.

देवदास नामक जिस किरदार को केएल सहगल से लेकर दिलीप कुमार और शाहरुख खान ने अमरता दी, उसे अभिनीत करने के लिए आपने एक कम प्रसिद्ध और अपरंपरागत अभिनेता को चुना है. राहुल भट्ट प्रतिभाशाली हैं, और ‘अग्ली’ इसकी गवाही भी देती है. लेकिन क्या इस तरह की कास्टिंग करना, कमर्शियल सिनेमा के रिजिड सिस्टम का प्रतिकार करने का आपका तरीका भी है? कि तुमने जिस नायक की लीजेंडरी छवि बनाई है मैं उसे नए सिरे से गढ़कर दिखाउंगा.

हां, लेकिन ये जबर्दस्ती या सोच-समझकर नहीं किया. ये फितरत में ही होगा (‘होगा’ पर जोर देते हुए, जैसे कि सुधीर जी के बात करने की मुख्तलिफ स्टाइल है!), कि मैं अपनी तरह से ही करूंगा. ‘हजारों...’ का नायक भी एकदम नया था (शाइनी आहूजा), राहुल भट्ट तो फिर भी दो-तीन फिल्में कर चुका है. केके मेनन भी उस समय नया था, और उस फिल्म का गाना तक मैंने अपने असिस्टेंट से गवा दिया था (बावरा मन, स्वानंद किरकिरे). क्योंकि आप खुद ढूंढ़ते हैं ऐसे कलाकारों को जो आपके साथ मिलकर फिल्म बनाएं, आपके तय नजरिए पर यकीन रखते हों.

कुछ वक्त पहले जब आपसे बात हुई थी तब डिस्ट्रीब्यूटर्स ने ‘दास देव’ की रिलीज एक बार फिर आगे बढ़ाकर 23 मार्च से 20 अप्रैल कर दी थी (पहले 16 फरवरी से दो मार्च हुई थी). इस तरह 23 मार्च को सिर्फ यशराज फिल्म्स की ‘हिचकी’ रिलीज हुई. अब 20 अप्रैल (*) को ‘दास देव’ के साथ हंसल मेहता की ‘ओमेर्टा’ और माजिद मजीदी की ‘बियोंड द क्लाउड्स’ जैसी प्रतीक्षित फिल्में भी रिलीज हो रही हैं. क्या कभी-कभी आपको गुस्सा नहीं आता, कोफ्त नहीं होती कि इंडिपेंडेंट सिनेमा को अपना पूरा जीवन देने के बाद भी बड़ी फिल्मों की वजह से आपको अपनी फिल्म आगे खिसकानी पड़ती है? (*दास देव अब 27 अप्रैल को रिलीज होगी)

हां, ये अच्छी बात नहीं है. इंडस्ट्री जो है वो थोड़ा इधर-उधर ज्यादा कर रही है. एक तो इंडस्ट्री में रूल्स नहीं हैं, कोई तरीके नहीं हैं कि एक फिल्म आ गई है तो उसे रिलीज करने दें. कोई दूसरा आ गया बीच में तो उसे पहले करने देते हैं. कोई मैथड होना चाहिए न, कोई एसोसिएशन होनी चाहिए. लेकिन इंडस्ट्री में जो बड़ा है, जो दबोच ले, वो सिकंदर.

हिंदी सिनेमा के पास कम ही निर्देशक बचे हैं जो दिल से इंडिपेंडेंट बने रहना चाहते हैं. आप हैं, नई पीढ़ी में नागेश कुकुनूर एक नाम याद आता है. बाकी कईयों ने इस तरह के सिनेमा में अपनी धार तेज करने के बाद घोर कमर्शियल सिनेमा और उसके फ्रेमवर्क को अपना लिया है. क्रिकेट का मेटाफर इस्तेमाल करने की इजाजत हो तो टी-20 के इस युग में आप टेस्ट मैच खेलना ही पसंद करते हैं. यानी विशुद्ध सिनेमा बनाने में पुख्ता यकीन रखते हैं. आपके विचार?

एक नई ऑडियन्स है जो आपको होप दे रही है कि अलग तरह का सिनेमा चलेगा. मास लेवल पर टी-20 भी है, लेकिन एक अलग लेवल की ऑडियन्स है जो फिर से बारीक चीजों को खोज रही है. फिर से नयी कहानियों को तलाश रही है, हिंदी सिनेमा में अपने आप को देखना चाह रही है. तो वे एक होप हैं, जिनसे आप रिलेट करते हैं, मैं करता हूं. चाहे वो अनुराग कश्यप की ऑडियन्स हो या किसी और की. ये ही मुझे इंटरेस्टिंग लगता है कि वो हमारी तरफ देखती हैं, हमारी फिल्में देखना चाहती हैं.

कभी ये नहीं लगा कि बाकियों की तरह थोड़े ज्यादा कमर्शियल हो जाते तो हर साल एक फिल्म रिलीज करने की सहूलियत मिल जाती? आपकी पिछली फिल्म ‘इंकार’ जनवरी 2013 में आई थी और अब पांच साल बाद ‘दास देव’ आ रही है.

(सवाल पूछने वाले को निरुत्तर करते हुए!) नहीं, ऐसा कुछ नहीं है. मुझे तो लगता है कि अगर थोड़ा और आजाद होते, दूसरों को थोड़ा कम सुना होता, जितना सुना उतना भी नहीं तो जो फिल्में बनाईं उससे और बेहतर बनाते. (अपनी फिल्मों में) गलतियां जब दिखती हैं तो वो दिखती हैं जो दूसरों की सुनने की वजह से हो गई थीं. इसलिए कभी ये कतई नहीं लगा कि ज्यादा कमर्शियल हो जाता.

फिर मैं अपनी आजाद-ख्याली में इसलिए भी उड़ता हूं कि मेरे बच्चे नहीं हैं. मेरा बच्चा बोल नहीं रहा कि अमेरिका में पढ़ाओ, बहुत बड़ा घर हो...कुछ लोगों को बड़ा घर और बैंक में बहुत पैसे होना जीवन का मकसद देता है. मुझे मेरा मकसद कोई और चीजें दे देती हैं! एक्चुअली तो सारा खेल जीने का मकसद ढूंढ़ने का ही है न.

ऐसा भी नहीं है कि मैं कोई बड़ी गरीबी में जी रहा हूं. या बहुत परेशानी में हूं. ऐसा है नहीं (जोर देकर)! और दोस्त इतने हैं कि खयाल भी रख लेंगे, कोई प्रॉब्लम नहीं. (‘दास देव’ के ट्रेलर लॉन्च पर सईद मिर्जा, केतन मेहता से लेकर इम्तियाज अली, प्रकाश झा, विशाल भारद्वाज जैसे तकरीबन बीस-बाइस नए-पुराने निर्देशक सुधीर मिश्रा की हौसला अफजाई करने के लिए साथ आए थे)

सभी जानते हैं कि आप पलायनवादी और समझौतावादी सिनेमा नहीं बनाते. फिर भी कभी-कभी आपकी फिल्मों में कमर्शियल सिनेमा की ट्रैपिंग्स (प्रलोभन) नजर आती हैं. अनिल कपूर के साथ वाली ‘कलकत्ता मेल’ में, ‘चमेली’ में – खासकर उसके गानों में, ‘ये साली जिंदगी’ के स्टाइलिश नायक में और उसकी एंडिंग में भी – जब पिस्तौल से निकली गोली रेलिंग से टकराकर दिशा बदलते हुए नायक को लग जाती है!

वो तो मजाक था पॉपुलर सिनेमा पे. व्यंग्य था! (‘ये साली जिंदगी’ का एंड)

लेकिन ‘चमेली’ तो एक फेयरीटेल थी न – अगर ऐसा होता तो क्या होता. फिर कहानी की फितरत जो होती है, फिल्म की फितरत, वो फैसला लेती है कि क्या होगा. इसलिए ‘चमेली’ में गाने जरूरी थे. और मुझे पॉपुलर सिनेमा, या हिंदुस्तानीपना जो है सिनेमा का, पचास के दशक का जो सिनेमा है, गुरुदत्त वगैरह का, वो पसंद भी है... मुझ पर सिर्फ (मार्टिन) स्कॉरसेजी का प्रभाव नहीं है, म्यूजिक का भी प्रभाव है. चाहे घटक (ऋत्विक) हों, रे (सत्यजीत) हों या गुरुदत्त हों. हम हिंदुस्तानी तो वैसे भी इमोशन को ज्यादा महत्व देते हैं, और इमोशन को अंडरलाइन करने का ही एक तरीका है गाना उपयोग करना. ये फितरत, ये हिंदुस्तानीपना हमारे अंदर होना भी चाहिए.

और ‘कलकत्ता मेल’ एक पॉपुलर फिल्म थी जो आधी मेरी नहीं थी. एक बार कोशिश की थी, आगे नहीं करुंगा! आप जो भी गलतियां मानें वो सारी गलतियां उसमें हैं. मुझे फिल्म भी अच्छी नहीं लगती. (एक बार फिर सोचकर) न, न वो मुझे नहीं अच्छी लगती. उसे मैं अपनी फिल्म भी नहीं मानता, वो तीन-चार लोगों की फिल्म है.

आपकी फिल्मों में बगावत एक सतत थीम है. ‘धारावी’ का नायक अपनी चॉल वाली परिस्थितियों से बगावत करता है और कहता भी है कि मुझे बस इस जगह से निकलना है. ‘खोया खोया चांद’ का नायक अपने बाप से बगावत करता है और उसके निशान उसके जेहन पर हमेशा रहते हैं. ‘हजारों...’ के तो दोनों नायक और नायिका अपनी-अपनी दुनिया से बगावत करने वाले लोग हैं. ‘दास देव’ का नायक भी बगावती है. इसकी कोई खास वजह?

मुझे वो कैरेक्टर्स जो अपनी जिंदगी, अपनी परिस्थितियों से संतुष्ट नहीं होते पसंद आते हैं. जो अपना स्क्रीनप्ले बदलना चाहते हैं, जिनके अंदर बेचैनी होती है. कुछ आदतन अलग होते हैं, कुछ मार्जिन्स पर होते हैं. वे अपने ख्यालों की वजह से भी मार्जिन पर हो सकते हैं, और अपनी परिस्थिति या जन्म की वजह से भी. तो ऐसे लोग मुझे ज्यादा फैसिनेट करते हैं. संतुष्ट लोग वैसे भी मुझे असल जिंदगी तक में पसंद नहीं!

यह सवाल एक बड़े तबके की पसंदीदा फिल्म ‘हजारों...’ को लेकर है. मैंने नोटिस किया है कि वामपंथियों का ‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी’ को लेकर मिला-जुला रिएक्शन रहता है. हिंदी फिल्मों में वे ‘हजार चौरासी की मां’ को तो बहुत सराहते हैं, क्योंकि वह फिल्म एक कॉमरेड के बलिदान और उसकी मां द्वारा उसकी विचारधारा को समझने-स्वीकारने को बेहद खूबसूरत अंदाज में दिखाती है, लेकिन आपकी इस फिल्म की बात आने पर टालमटोल करते ज्यादा नजर आते हैं. जैसे कि आपने कोई ऐसा सच दिखा दिया हो, जिसे वे स्वीकार नहीं करना चाहते. ऐसे लोगों से आपकी मुलाकात हुई है?

कम हुई है, लेकिन हुई है! और इसी वजह से तो ‘हजारों...’ हमेशा जिंदा रहेगी. क्योंकि वो किसी एक का प्रोपेगेंडा नहीं है. आपने जो दूसरी फिल्म का नाम लिया, भूल गए उसे लोग! बड़े दिनों बाद मैंने उसका नाम सुना है.

जब भी मामला प्रोपेगेंडिस्ट होता है, जिसमें जिस चीज की आप सराहना कर रहे हैं, उसका विपरीत भी न दिखे आपको, तो वो कलात्मक नहीं कहलाता. द्वंद अगर न दिखे किसी काम का, महज एक ही विचारधारा दिखे तो बात नहीं बनती.

और फिर आपकी फिल्म का नायक सिद्धार्थ (केके मेनन) अंत में उस विचारधारा से ही किनारा कर लेता है जिसकी वजह से वो नायक कहलाया. और जो बाहर से एक लड़की आती है वो अंत तक मूवमेंट के साथ रहती है...

मैंने तो सिद्धार्थ जैसों को फिर भी थोड़ा छोड़ दिया है. जबकि कई लेफ्टिस्ट तो वर्ल्ड बैंक में चले गए थे, मैंने तो फिर भी यह दिखाया है कि वो डॉक्टरी पढ़ने इंग्लैंड चला गया! नहीं तो बाकियों को आप देख लो कहां हैं. मैं कोई लेफ्टिस्ट फैंटसी फिल्ममेकर थोड़े न हूं, कि जो जिंदगी में उनसे मुमकिन नहीं हुआ उसे फिल्मों में दिखाऊं. लेफ्ट की फैंटसी बनाना फिल्ममेकर का काम नहीं है.

‘हजारों...’ की भाषा आपने मुख्यत: इंग्लिश क्यों रखी? इसलिए कि फिल्म ज्यादा अंतरराष्ट्रीय ऑडियन्स तक पहुंचे या फिर इससे 70 के दशक के छात्रों का एलीटिज्म नजर आए? क्योंकि इसके अलावा आपने शायद ही कोई फिल्म इंग्लिश में बनाई है...

नहीं...नहीं. किरदार जैसे थे, वो जैसे बात करते थे वैसे ही दिखाया है. एक आंध्रा की लड़की थी (चित्रांगदा), एक आधा बंगाली आधा मुसलमान लड़का था (केके), और एक पंजाबी लड़का था जो मेरठ के आसपास के रेफ्यूजी खानदान का था (शाइनी). ये तीनों दिल्ली के सेंट स्टीफन्स नुमा कॉलेज में थे. तो आपस में कैसे बात करते? जाहिर तौर पर इंग्लिश में.

और उस भाषा से अलग थी गांव की भाषा, जहां सिद्धार्थ (केके) गया था. जो वामपंथी थे, वो लोग गांव में अंग्रेजी में बात नहीं कर रहे थे. सिद्धार्थ का बाप नहीं बात करता था अंग्रेजी में. ये जबान का टकराव भी उस फिल्म का एक अहम हिस्सा था. ये किसी क्रिटिक ने नहीं देखा तो वो मेरी प्रॉब्लम नहीं है! ये जो भाषा एक क्लास है, हमारे यहां रही है, वो ‘हजारों...’ का हिस्सा थी.

(थोड़ा सोचकर) सही मायनों में उस फिल्म में भाषा पर बहुत काम भी हुआ था. जब सिद्धार्थ बात करता है, उसकी ग्रैंडमदर उसकी गोदी में लेटी होती है और बाप उससे कुछ पूछता है. तब वो हिंदी में बात करता है. जब दोनों खड़े होते हैं और पॉलिटिक्स पर बातें करते हैं तो अंग्रेजी में करते हैं, क्योंकि वो शब्द उनके पास अंग्रेजी के हैं. जब वामपंथी गांव वालों से बात करता है तो हिंदी में करता है. गांव वाले जो हैं, उनकी भाषा बिलकुल अलग है. पुलिस वालों की बिलकुल अलग. दलित जो अटैक करते हैं उनकी भाषा अलग है. विक्रम (शाइनी) और उसका बाप जब बात करते हैं तो पूरी तरह हिंदुस्तानी में बात करते हैं. गीता (चित्रांगदा) की फैमिली बात करती है आपस में तो तेलुगू में बात करती है. मैंने ऐसा नहीं किया कि उनसे टूटी-फूटी हिंदी बुलवाऊं ताकि दर्शक समझ पाएं!

‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी’ आपकी इतनी ज्यादा सेलिब्रेटिड फिल्म है, फिर भी आपके लिए आपकी सर्वश्रेष्ठ फिल्म ‘खोया खोया चांद’ है. ऐसा क्यों? (यह जानकारी जयदीप वर्मा द्वारा सुधीर मिश्रा पर बनाई गई लाजवाब डाक्यूमेंट्री ‘बावरा मन’ में मिलती है)

जो सिनेमेटिक पकड़ उस फिल्म की है वो सबसे अलग है. उसमें बहुत सारी चीजें हैं जो अनकही सी हैं. उसने तय स्ट्रक्चर को तोड़ा है. विलेन जो है (रजत कपूर) वो पूरी तरह विलेन नहीं है, जो वैम्प है उसकी और अच्छी ख्वाहिशें भी हैं. हीरोइन जो है वो प्योर नहीं है. हीरो के दोस्त (विनय पाठक) को भी हीरोइन चाहिए, वो सिर्फ दोस्त रहने को तैयार नहीं है. गानों का इस्तेमाल यूनिक है. हिंदी फिल्मों का जो स्ट्रक्चर होता है, उसको तोड़ा है ‘खोया खोया चांद’ ने और बहुत प्यार से तोड़ा है.

फिर वो थोड़ी ऑटोबायोग्राफिकल भी है. उसका नायक, जो कि फिल्म डायरेक्टर है (शाइनी), उसका पास्ट थोड़ा-थोड़ा मेरे फादर का पास्ट है. फिल्म डायरेक्टर का जो किरदार है, इट्स नॉट सो मच ऐज मी, ऐज आई इमेजिन माय फादर ऐज मी! (वह किरदार मुझ पर उतना नहीं है, मेरे पिता पर है अगर वे मेरी जगह (फिल्म डाइरेक्टर) होते). लखनऊ की पृष्ठभूमि, नायक की अकड़ और उसका अपने बाप के साथ जो रिश्ता है, कि वो आखिर में अपने बेटे से कहते हैं कि अब तो माफ कर दे यार, ये सब थोड़ा मेरे फादर का बैकग्राउंड है. (सुधीर मिश्रा के पिता गणित के प्रोफेसर रहे हैं और लखनऊ से ताल्लुक रखते हैं.)

आज का युग फेमिनिस्ट नजरिए से फिल्मों को देखने लगा है. क्या आपके लिए किरदार और कहानी आज भी पहले आते हैं, या फिर समाज में होने वाले विमर्श आपको कहानी में बदलाव कर उसे ज्यादा पॉलिटिकली रेलेवेंट बनाने के लिए विवश करते हैं? यह सवाल इसलिए क्योंकि जब 2013 में ‘इंकार’ आई थी तो लोग उसे सिर्फ इसलिए सराह नहीं पाए थे क्योंकि वे सेक्सुअल हरासमेंट पर एक इश्यू-बेस्ड फिल्म ढूंढ़ रहे थे. जबकि ‘इंकार’ ने कहानी दूसरी कही थी...

सेक्सुअल हरासमेंट पर इश्यू-बेस्ड फिल्म बनाना मुझे बहुत आसान लगता है. इट्स टू इजी. कुछ फिल्मकारों को शायद ऐसी आसान फिल्म बनाना अच्छा लगता हो और शायद कुछ ऑडियन्स को भी ऐसी आसान फिल्म देखकर खुद को अक्लमंद महसूस करना अच्छा लगता होगा. (व्यंग्यात्मक लहजे में) ‘हटके’ के भ्रम में आपस में कुछ आदान-प्रदान होता रहे! लेकिन औरत-मर्द का रिश्ता तो कॉम्पलेक्स इश्यू है न. औरत की भी अपनी ख्वाहिशें उसे किसी तरफ ले जाती हैं, गलत होने पर भी मजबूर करती हैं, और फिर कौन गलत कौन सही ‘इंकार’ ज्यादा इसके बारे में थी.

लेकिन मुझे लगता है कि इस तरह की फिल्में ‘लास्ट’ ज्यादा करेंगी. अब मुझसे आकर लोग बोलते भी हैं कि आपने ‘इंकार’ में कॉम्पलेक्सिटी को बखूबी हैंडल किया था…

ऐसा भी होता है कि जब माहौल में कोई अलग तरह की पॉलिटिक्स घुली होती है, समाज में कुछ नए डिस्कोर्स चल रहे होते हैं, तो लोग उस समय रिलीज हुई फिल्मों को उसी नजर से देखने लगते हैं.

हां, निर्भया गैंगरेप के बाद पूरी दिल्ली बाहर आ गई थी (‘इंकार’ 16 दिसम्बर 2012 को घटित इस बर्बर घटना के एक महीने बाद रिलीज हुई थी). ऐसा लग रहा था कि क्रांति होने वाली है. अब सब भूल गए. क्या हुआ उस क्रांति का? क्या बलात्कार बंद हो गए? अचानक क्या हो गया उन सारे क्रांतिकारियों को जो खड़े हुए थे? (यह इंटरव्यू उन्नाव और कठुआ बलात्कार मामले चर्चा में आने से पहले लिया गया था)

इस तरह के भ्रम में लाने वाली फिल्में बनाना भी वैसा ही है जैसे कि पॉपुलर फिल्में बनाना. क्रांति होगी, कल सब सही हो जाएगा, या फिर कोई हीरो होगा जो आकर सब सही कर देगा. यही सारे फार्मूला पॉपुलर फिल्मों के होते हैं और यही सब सो-कॉल्ड अच्छी-अच्छी फिल्मों ने अपना लिए हैं. कवर बदल के, थोड़ा सी पृष्ठभूमि और थोड़ी सी कहानी बदल के ढकोसला भर दिया है. वो तो वही कहानियां हुईं न, बस सुनाने का अंदाज थोड़ा सा बेहतर है, डायलॉग राइटिंग थोड़ी बेहतर है...

मतलब फिर वही कमर्शियल सिनेमा की ट्रैपिंग्स वाली बात है...

मुझे कमर्शियल से कोई प्रॉब्लम नहीं है. सच में. मुझे *** बनाने से प्रॉब्लम है. कमर्शियल कोई बुरा शब्द नहीं है, कमर्शियल सिनेमा मतलब जो पैसे बनाए. वो अच्छा है. पैसे बनाओ, लेकिन *** बनाकर मत बनाओ.

आप अच्छी क्रीम बेचो ठीक है. लेकिन आप बोलो कि गोरे हो जाओगे, लड़की मिल जाएगी, ये हो जाएगा वो हो जाएगा. ये पागल बनाना हुआ. उस तरह से पैसे मत बनाओ. इश्क होगा और सब ठीक हो जाएगा और समस्या ही नहीं होगी कोई. ये पागल बनाना है. क्योंकि ऐसा होता नहीं है, लेकिन ऐसा कहने से नुकसान बहुत होता है. आप उम्मीदें लेकर जाते हैं एक रिश्ते में, एक शादी में. उसमें फिर गाने बजते हैं आपके दिमाग में, किसी हिंदी फिल्म के. लेकिन यथार्थ कुछ और मिलता है. पागल बनाने के इस खेल से मुझे एतराज है. कमर्शियल सिनेमा से बिलकुल एतराज नहीं है.

पलायनवादी सिनेमा से है...

सिर्फ पलायनवादी नहीं, खामखां के आशावादी सिनेमा से भी एतराज है. जिंदगी मुश्किल है ये बच्चों को दिखाओ. उसमें जीत फिर मुमकिन भी है और कभी-कभी होगी. हार जो है, वो भी होगी, और हार कोई इतनी बुरी बात भी नहीं है कि तुम खुदकुशी करने चले जाओ. ज्यादातर तो हार ही मिलेगी. जिंदगी में दो-चार बार जीत मिलेगी. मुश्किल जिंदगी को कैसे नेविगेट करना है, और उससे कभी-कभी खुशियां चोरी कैसे करनी है, वो दिखाना अच्छा सिनेमा है. खामखां का पलायनवादी और खामखां का आशावादी, दोनों घटिया सिनेमा हैं!

इस आशावाद को न, कई शक्तियां आपके खिलाफ इस्तेमाल भी करती हैं. कि मेरे को अगर वोट दोगो तो कल ये हो जाएगा, वो हो जाएगा. ‘वो सुबह कभी तो आएगी’ को अलग-अलग पार्टियां अलग-अलग भाषा में गाती हैं, और आपसे गाने को भी कहती हैं! सच ये है कि वो सुबह थोड़ी धुंधली सी ही आएगी, और उसके आने के बाद फिर रात हो जाएगी, दोपहर आएगी. सिर्फ सुबह ही सुबह आएगी ऐसा होगा ही नहीं! ये सब *** बनाऊ खेल हैं, चाहे कम्युनिस्टों के हों या दक्षिण पंथियों के.

आपने एक इंटरव्यू में कभी कहा था, ‘जिन महिला किरदारों को मैं लिखता हूं वो थोड़ी सी रहस्मयी होती हैं. पूरी तरह आपकी कभी नहीं होतीं, मगर फेमिनिन व आकर्षक होती हैं.’ जिंदगी में किन महिलाओं ने ऐसा प्रभाव डाला कि आप मजबूत महिला किरदार लिख पाए? चाहे वो ‘हजारों…’ की गीता हो (चित्रांगदा), ‘इंकार’ की माया (चित्रांगदा), या फिर ‘चमेली’ की करीना कपूर.

मैं अभी एक फिल्म बना रहा हूं अपनी पार्टनर, दोस्त, बीवी...जो भी आप कहें, रेणु सलुजा पर (अदिति राव हैदरी इसमें मुख्य भूमिका निभा रही हैं). उनके अलावा मेरी दादी थीं जिन्होंने पांच बच्चों को अकेले बड़ा किया.

जो भी औरतें आईं जिंदगी में वो ऐसी मिलीं जिनपर आप ओनरशिप क्लेम नहीं कर सकते. आजाद उन्होंने खुद को भी किया और मुझे भी किया. मुझ पर उनका बहुत ज्यादा असर है. क्योंकि उन्होंने जब मुझसे आजादी मांगी, तो मुझे भी तो आजाद किया न! ढकोसले और झूठ वाले प्यार से उन्होंने आजादी मांगी और मुझे भी उस प्यार से आजाद कर दिया. (गुजरे जमाने की जानी-मानी एडिटर रेणु सलुजा पर हाल ही में सुधीर मिश्रा ने एक स्मृति-शेष लिखा है. वक्त निकाल कर पढ़िए, ये आपकी आंखें नम कर देगा)

आपकी नजर में सिनेमा का असल मकसद क्या है? हंसने, रुलाने और मनोरंजन करने के अलावा हमारे यहां सोशल और पॉलिटिकल कमेंट्री करने वाली फिल्में बहुत कम बनती हैं. जैसे हाल ही में अमेरिका में एक फिल्म रिलीज हुई –‘ब्लैक पैंथर’. वो इसलिए नहीं सराही जा रही कि वो धमाल सुपरहीरो फिल्म है, बल्कि इसलिए कि वो अफ्रीकी मूल के लोगों को केंद्र में रखकर कई सारी सोशल और पॉलिटिकल कमेंट्री करती है. इसी तरह ‘गेट-आउट’ भी आई पिछले साल, मॉर्डन स्लेवरी पर. हमारे यहां इस तरह की फिल्में कब लगातार बनेंगी?

हमारे यहां तो ऐसा है न कि भ्रम में रखो (दर्शकों को). सिनेमा का मुख्य मकसद तो कहानी सुनाना है, आजाद कहानी सुनाना. लेकिन जब सोच ऐसी हो जाए कि ऐसी फिल्में न बनाओ कि लोग मॉल में आएं तो विचलित हो जाएं और फिर कपड़े न खरीदें, तो प्रॉब्लम होती है. अच्छी-अच्छी फिल्में ही बनाओ, दिमाग में खलबली मचाने वाली फिल्में न बनाओ जो खुश रखें. दर्शक खुशी-खुशी मॉल के अंदर आएं और खुशी-खुशी ही बाहर जाएं. इस तरह की विचारधारा रहेगी तो कभी लगातार ऐसी फिल्में नहीं बनेंगी जैसी आप सवाल में चाह रहे हैं.

इसीलिए शायद, अभी नेटफ्लिक्स एक अच्छा मॉडल है. उनका मुख्य मकसद कहानियां हैं. फिल्में हैं, वेब सीरीज हैं, लॉन्ग फॉर्म सिनेमा है. वो और कुछ नहीं बेचना चाहते सिवाय अच्छे कंटेंट के. इस तरह की सोच से जब कहानियां बनती हैं, तो अच्छा सिनेमा बनता है. हमारे यहां तो घबराए होते हैं लोग, पता नहीं कहां से पैसा आया होता है. फिर टेक्सेशन भी बहुत ज्यादा है. सरकार भी ऐसे देखती है जैसे लोग शराब की दुकान को देखते हैं, या किसी धंधे वाले एरिया को देखते हैं. हमारे यहां फिल्मों या आर्ट्स को लेकर जो नजरिया रहा है, कि ये तो गाने-बजाने वाले लोग हैं, भांड हैं, और इनको वैसे ही ट्रीट करना चाहिए, गंभीरता से लेना ही नहीं चाहिए, वो आज भी बदला नहीं है.

दर्शक भी स्तरहीन सिनेमा देखने का दिन-ब-दिन ज्यादा शौकीन होता जा रहा है. कोई हिदायत उनके लिए?

अलग-अलग वजह ढूंढ़ो फिल्में देखने की. एक ही तरह की फिल्में मत देखो. कभी लाइटर मूड हो तो हंसी-मजाक की भी फिल्म देखो, लेकिन कभी इसलिए भी देखो कि ये कैमरामैन बड़ा इंटरेंस्टिंग है, इसने ये फिल्म की है तो कोई वजह होगी. फिल्मों के साथ ‘एक्टिव पार्टिसिपेशन’ करोगे तो आपको उसमें लुत्फ ज्यादा आएगा. आपका एक्सपीरियेंस ज्यादा रिच होगा. हमेशा एक ही रिदम में मत फंसो. कभी थोड़ा बोर होने की कोशिश भी करो. बोर होकर देखो पंद्रह मिनट, हो सकता है वो फिल्म आपको किसी और रिदम में अंदर ले जाए. इतने इम्पेशेंट मत बनो. उस बूढ़े आदमी की तरह मत बनो जिसकी सेक्सुअल पॉवर खत्म हो चुकी हो और वो बोल रहा हो - नाच छमिया! फिल्में ऐसे मत देखो जैसे कि उसे बोल रहे हो नाच छमिया नाच. सामंतवादी कम बनो, थोड़ा डेमोक्रेटिकली देखो फिल्में.

आखिरी सवाल. क्या कभी ‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी’ का सीक्वल बनेगा? और बना तो गीता, सिद्धार्थ व विक्रम कहां पर मिलेंगे हमें?

अब आप देखिए कहां मिलेंगे. बनेगा जरूर!