मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ और छतरपुर शहर के बीच रास्ते में एक गांव पड़ता है भगवां-फुटवारी. यहां एक बड़ा तालाब है जहां अभी पानी कम और ज़मीन ज़्यादा दिखती है. यहां लोग फिलहाल जानवर चराते हैं. तालाब के पास सड़क किनारे एक ढाबा है. इसके मालिक संजय राय सत्याग्रह को बताते हैं, ‘यहां की आबादी 5,000 के आसपास है. सरकारी नल-जल योजना के ज़रिए हमें 15 दिन में एक बार पानी मिलता है. बाकी दिनों में यह पूरी आबादी दो-तीन हांफते हैंडपंपों पर निर्भर है. और इन हैंडपंपों पर पानी के लिए मशक्कत रात दो-तीन बजे से शुरू होती है.’

छतरपुर जिले की हरपालपुर तहसील का एक गांव है लहदरा. यही कोई चार-पांच साै की आबादी होगी यहां. धसान नदी के किनारे बसा है. गर्मी का मौसम शुरू हो चुका है. लिहाज़ा धसान नदी यहां के सहित अपने पूरे बहाव क्षेत्र में अधिकांश जगहों पर नालीनुमा पतली जलधारा के तौर पर ही दिखाई देती है. लेकिन लहदरा के लोगों के लिए बीते सात साल से यही पतली जलधारा जीवनरेखा बनी हुई है. यहां के लोग इसी में नहाते हैं. कपड़े धोते हैं. जानवरों को नहलाते हैं और पीने का पानी भी यहीं से ले जाते हैं क्योंकि गांव में पीने के साफ़ पानी का अब तक कोई ज़रिया नहीं है.

यह सिर्फ भगवां-फुटवारी और लहदरा की कहानी नहीं है. बुंदेलखंड के अंदरूनी गांवों-कस्बाें में हर रोज़ बूंद-बूंद का संघर्ष देखकर पता चलता है कि कैसे इस इलाके के लोग पानी के संकट को अपनी नियति मान बैठे हैं

पन्ना जिले की गहरा ग्राम पंचायत का पनारी गांव. जिला मुख्यालय से पहाड़ीखेड़ा रोड पर 40-45 किलोमीटर दूर. आबादी यही कोई 200-300 के आसपास होगी. सुबह 10 बजे के आसपास ही यहां तपती चट्‌टानें झुलसा देने को तैयार हो जाती हैं. इस वक़्त तक गांव के अधिकांश पुरुष खेतों में काम के लिए निकल जाते हैं. जबकि महिलाएं-बच्चियां पानी के लिए गांव से क़रीब दो किलोमीटर जंगल में नीचे उतरकर (ये गांव पहाड़ी में ऊंचाई पर बसा है) एक कुंडनुमा जलस्रोत से पानी लेने जाती हैं. उसे स्थानीय लोग झिरिया कहते हैं. उनके नहाने और कपड़े धोने का इंतज़ाम भी इसी झिरिया में है.

बुंदेलखंड के तमाम अंदरूनी इलाकों में लोग इन दिनों पानी के लिए जंगलों में मौज़ूद प्राकृतिक जलस्रोतों पर निर्भर हैं.
बुंदेलखंड के तमाम अंदरूनी इलाकों में लोग इन दिनों पानी के लिए जंगलों में मौज़ूद प्राकृतिक जलस्रोतों पर निर्भर हैं.

दमोह जिले के बटियागढ़ विकासखंड की ग्राम पंचायत शहजादपुरा का गांव गीदन. महज़ 400 लोगों की आबादी है. गांव में लगे पांच से ज्यादा हैंड पंप सूख चुके हैं और ग्रामीण 500 फीट नीचे उतरकर और क़रीब तीन किलोमीटर दूर जाकर जंगल के नाले से पानी लाते हैं. यही हाल यहां के नज़दीकी जलना गांव का है. यहां से दो किलोमीटर दूर जंगल में पत्थरों के बीच बना एक कुंड है, वही फिलहाल ग्रामीणों की प्यास बुझा रहा है.

अब हाल देखिए सागर का. दतिया को छोड़कर इस इलाके के सभी पांच जिले- सागर, दमोह, पन्ना, छतरपुर और टीकमगढ़ इसी संभाग में आते हैं. संभागीय मुख्यालय है. ऐसे में अपेक्षा की जा सकती है कि यहां हालात बेहतर होंगे. लेकिन नहीं. यहां के स्थानीय पत्रकार मधुर तिवारी सत्याग्रह को बताते हैं, ‘सागर शहर सहित पूरे संभाग में गर्मियां शुरू होते ही पीने के पानी के लिए त्राहिमाम जैसी स्थिति हो जाती है. अभी सागर शहर में ही दो दिन में एक बार पानी की आपूर्ति हो रही है. दमोह, पन्ना, छतरपुर, टीकमगढ़ जिला मुख्यालयों में भी यही हाल हैँ.’

मधुर के मुताबिक, ‘गांवों में जाने की ज़रूरत भी नहीं है. सागर नगर निगम के ही कुछ वार्डों में जाकर देख लीजिए. जैसे मकरोनिया इलाके से लगे कोरेगांव, बड़सूमा, गंभीरिया आदि. मैंने ख़ुद अपनी आंखों से इन जगहों पर जाकर हालात देखे हैं. कोरेगांव की आबादी तीन-साढ़े तीन हजार के आसपास है. यहां 2012 में नल-जल योजना के तहत पाइप लाइनें बिछाई गई थीं. ये जल्दी ही ख़राब हो गईं. अब यहां के लोग तीन किलोमीटर दूर से पानी लाते हैं.’

वे बताते हेँ, ‘बड़सूमा गांव की आबादी भी तीन-चार हजार के आसपास है. इनमें से आधी से ज़्यादा आबादी पानी भरने के लिए रात-रात भर जागती है क्योंकि ये लोग एमईएस (मिलिट्री इंजीनियरिंग सर्विसेज़) की टंकी से होने वाले ओवरफ्लो के पानी पर निर्भर हैं. वह ओवारफ्लो कब होगा, कुछ पता नहीं होता. और दिलचस्प बात ये है कि प्रदेश के गृह मंत्री भूपेंद्र सिंह (ये सागर के ही हैं) जैसे हर ज़िम्मेदार को ये हालात पता हैं. लेकिन करता कोई कुछ नहीं.’

बस यही वह भाव है जिसने पूरे इलाके में नैराश्य भर दिया है

मधुर की बात जहां ख़त्म होती है, दरअसल, वहीं से एक नैराश्य भी पैदा होता है. इस इलाके में आप की जहां से मर्ज़ी हो उस दिशा से मैदानी पड़ताल के लिए निकल जाएं. जिस गांव में चाहें वहां ठहर जाएं. जिससे चाहें उससे पूछ लें. ज़वाब कमोबेश एक से ही मिलेंगे. दलगत राजनीति से हटकर सभी दिलों में एक सी टीस मिलेगी. मिसाल के तौर पर टीकमगढ़ जिले का डूंड़ा गांव. केंद्रीय पेयजल एवं स्वच्छता मंत्री उमा भारती मूल रूप से इसी गांव से हैं. उनके परिवार के कई सदस्य अब भी यहां रह रहे हैँ.

इस गांव के सरपंच भी उमा भारती के भाई ही हैं. लेकिन अपनी इस हैसियत का उन्हें गांव की भलाई के लिहाज़ से कोई बड़ा लाभ हुआ हो ऐसा लगता नहीं है. अलबत्ता गांव में पीने के पानी की किल्लत नहीं है. सीमेंट कंक्रीट की सड़कें बनी हुई हैं. लेकिन खेती के लिए पानी नहीं है. गांव के ही एक मंदिर के पास की दुकान पर बैठे सरपंच अमृत लाल लोधी सत्याग्रह को बताते हैं, ‘सरकार ने कछू स्टॉप डैम बनवाए ते. सब टूट-फूट गए. कछू दिनां पैले पंचायत ने अपने पैसा लगा कें उनें सुधरवाओ.’ सरकार से मदद नहीं मिलती? इस सवाल पर उनके बज़ाय पास ही बैठे उस दुकान के मालिक ज़वाब देते हैं, ‘सरकार का मदद दै है. इताएं तौ शौचालय बनाबे के लाने जौन 12,000 रुपइया मिलत ऊ में सें भी 2,000 सीईओ (जिला पंचायत के) खां चानें. बा सें का उम्मीद करें.’

कल्पना कीजिए. जहां केंद्रीय मंत्री के गांव की ये हालत हो तो दूर-दराज़ के जंगलों में बसे ठेठ आदिवासी इलाकों की क्या स्थिति होगी. इन इलाकों के हालात नज़दीक से देखना हो तो कभी छतरपुर से बिजावर के रास्ते या सटई-किशनगढ़ होते हुए हटा-दमोह के रास्ते पर निकल जाइए. किशनगढ़ से अमानगंज (पन्ना जिला) होकर भी हटा-दमाेह जाया जा सकता है (हमने यही रास्ता पकड़ा था). पूरे रास्ते में पानी के लिए पल-पल संघर्ष नज़र आता है.

मसलन किशनगढ़ से अमानगंज के रास्ते में एक गांव पड़ता है उड़ला. केन नदी के किनारे बसा है. केन का उद्गम भी इसी इलाके में नज़दीक ही है. लेकिन इलाके की तमाम नदियों की तरह केन की कोख भी अभी सूखी है. नाम मात्र का पानी है. लिहाज़ा सूरज ढलने के बाद शाम सात बजे के क़रीब भी उड़ला में पानी के लिए मशक्क़त साफ दिखती है.

ऐसी ही मशक्क़त में लगी एक 10-12 साल की बच्ची से सत्याग्रह ने सवाल पूछ लिया, ‘पानी कहां से लेकर आती हो?’ बदले में उल्टा सवाल, ‘काए आ पूंछ रहे? सरकारी अफ़सर आव का. कै कछू भलो कर दै हौ. दो किलोमीटर दूर से ल्याउत हैं हम औंरें पानी.’ (जबकि केन यहां से बमुश्किल एक किलोमीटर दूर भी नहीं होगी) बस इतना कहकर वह आगे बढ़ जाती है. पूछने पर नाम बताना भी ज़रूरी नहीं समझती.’

वैसे नाम तो दमोह के गैसाबाद कस्बे के नज़दीकी गांव की वह बच्ची भी नहीं बताती जो मां के साथ भरी दोपहर में अपने घर से करीब दो किलोमीटर दूर सुनसान से जंगली इलाके में पानी लेने जा रही है. अलबत्ता उसकी मां को इस पर अचरज़ ज़रूर होता है कि कोई अजनबी इस तपती दोपहर में उनसे पानी की समस्या को लेकर सवाल कर रहा है. लेकिन उनके लहजे में भी वही नैराश्य, ‘बता दैबी तौ का हो जै है. टाइम ख़राब न करौ हमाओ.’

पानी के लिए अक़्सर महिलाओं को ही ऐसे सुनसान जंगलों में भटकना पड़ता है.
पानी के लिए अक़्सर महिलाओं को ही ऐसे सुनसान जंगलों में भटकना पड़ता है.

और किसी बुज़ुर्ग या अधेड़ से पानी की समस्या पर सवाल कर लीजिए. आप पाएंगे कि वे इसके साथ जीना सीख गए हैं. ऐसे ही अधेड़ सी उम्र के एक शख्स किशनगढ़ के नज़दीकी कदवारा गांव के तुलसी अहिरवार. सत्याग्रह के सवाल पर बेपरवाही से कहते हैं, ‘अब गर्मियन कौ मौसम है. नदियां, ताल, तलैंयां सूख गईं. पानी की दिक्कत तौ होतइ है. जा तौ हर सालइ की बात कहाइ. इ मैं कोऊ का कर सकत.’

बुंदेलखंड की किस्मत कैसे और कब बदलेगी, यह किसी को पता नहीं

जो नैराश्य ग्रामीणों में वही शहरों के शिक्षित वर्गों में भी साफ़ दिखता है. मसलन- छतरपुर के घनश्याम पटेल. स्थानीय पत्रकार हैं. वे कहते हैं, ‘पानी, पलायन, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार जैसे मसले अब बुंदेलखंड के लोगों के लिए बेमानी हो चुके हैं. आप जैसे बाहर बैठे लोगों के लिए ये बड़े मसले होंगे. मगर इस इलाके में रहने वालों ने इनके साथ जीना-मरना सीख लिया है. नहीं तो आप ही बताइए- लोगों की आंखों के सामने भ्रष्टाचार हो रहा है. नेता-अधिकारी लगातार झांसे पर झांसा दे रहे हैं. शहरी इलाकों में तक तीन-चार दिन में एक बार पीने का पानी मिल रहा है, बकस्वाहा (छतरपुर जिले का हिस्सा) जैसे कस्बों मे कुछ बस्तियां तो ऐसी हैं जहां 200 रुपए रोज कमाने वाले लोग हर दिन 50 रुपए में पानी ख़रीद रहे हैं. क्या इतना सब होने के बाद कहीं से कोई आवाज़ न उठती? कोई आंदोलन न होता? लेकिन नहीं. यहां ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा है. इसीलिए इन हालात को देखने बाद अब लगने लगा है कि बुंदेलखंड की किस्मत कैसे और कब बदलेगी, ये शायद भगवान ही बता पाएं.’ पटेल की बातें सोचने पर मज़बूर करती हैं.