बीते साल अर्थव्यवस्था में संकट की स्थिति को लेकर भाजपानीत केंद्र सरकार विपक्ष के साथ-साथ यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी जैसे अपने ही नेताओं के निशाने पर भी थी. उसी दौरान सरकार ने 25 सितंबर को बिबेक देबरॉय की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय आर्थिक सलाहकार परिषद (ईएसी) के गठन का ऐलान किया. इससे पहले यूपीए-2 सरकार में सी रंगराजन की अध्यक्षता में गठित ईएसी (2009-14) काफी सक्रिय रही थी. इसके उलट अब तक बिबेक देवरॉय की अध्यक्षता वाली ईएसी का हाल ठंडा ही दिखता है. संस्था के कामकाज का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि इसकी वेबसाइट को छह महीने बाद भी अपडेट नहीं किया जा सका है.

आर्थिक सलाहकार परिषद की वेबसाइट का स्क्रीनशॉट, तारीख- 11 अप्रैल, 2018
आर्थिक सलाहकार परिषद की वेबसाइट का स्क्रीनशॉट, तारीख- 11 अप्रैल, 2018

बीते साल 11 अक्टूबर को हुई अपनी पहली बैठक में परिषद ने 10 अहम क्षेत्रों पर काम कर इसकी रिपोर्ट छह महीने के अंदर प्रधानमंत्री को सौंपने का ऐलान किया था. इनमें रोजगार, कृषि और राजस्व ढांचा भी शामिल हैं. ये सारे अहम मुद्दे फिलहाल अगले साल होने वाले चुनाव से पहले मोदी सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती बने हुए हैं. इनके अलावा परिषद ने आर्थिक विकास, सार्वजनिक खर्च, इंस्टीट्यूशन ऑफ इकनॉमिक गवर्नेंस, उत्पादन उपभोग प्रणाली, सामाजिक क्षेत्र और मौद्रिक नीति को भी अपनी सूची में शामिल किया है.

ईएसी ने दूसरी बैठक बीते साल 10 नवंबर को बुलाई. यानी पहली के करीब एक महीने बाद. इस दूसरी बैठक में परिषद ने रोजगार और बुनियादी ढांचे के साथ-साथ स्वास्थ्य और शिक्षा पर चर्चा की. साथ ही, इसमें इन क्षेत्रों के लिए उन सिफारिशों की एक सूची भी तैयार की गई जिन्हें 15वें वित्त आयोग को सौंपा जाना है. इसके अलावा परिषद ने बताया कि वह अर्थव्यवस्था की गति को मापने के लिए ऐसी नई प्रणाली विकसित करने में लगी है, जो सामाजिक विकास के मानकों से भी जुड़ी हुई हो. ईएसी के अध्यक्ष बिबेक देवरॉय ने बुनियादी क्षेत्र में प्राथमिकता के आधार पर काम करने की भी बात कही.

परिषद की तीसरी बैठक 20 दिसंबर, 2017 को बुलाई गई थी. इसमें भी पहले की तरह रोजगार और विकास के मुद्दों पर चर्चा की गई. इस बैठक में शामिल नीति आयोग के आमंत्रित सदस्य डॉ. रमेश चंद्र ने कृषि उत्पादकता और इस क्षेत्र में रोजगार बढ़ाने पर जोर दिया. इसके अलावा ग्रामीण विकास मंत्रालय के सचिव अमरजीत सिन्हा ने गरीबी मुक्त पंचायत बनाने के लिए अंत्योदय मिशन पर चर्चा की. इसके बाद केंद्रीय बजट (2018-19) को पेश किए जाने के बाद बुलाई गई चौथी बैठक में केंद्र सरकार की प्रस्तावित महत्वाकांक्षी योजना राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा योजना (मोदीकेयर) के क्रियान्वयन के संभावित तौर-तरीकों पर चर्चा हुई. इसके अलावा परिषद की सदस्य डॉ. आशिमा गोयल ने राजकोषीय और मौद्रिक प्रबंधन पर अपनी बातें सामने रखीं.

आर्थिक सलाहकार परिषद के अब तक के कामकाज को देखा जाए तो इन चार बैठकों के अलावा और कुछ खास होता हुआ नजर नहीं आया है. हालांकि, इसके अध्यक्ष सहित अन्य सदस्य परिषद की बैठकों के अलावा कारोबारी संगठनों जैसे- फिक्की और सीआईआई के कार्यक्रमों में अलग-अलग मुद्दों पर अपनी बात रखते हुए नजर आए. बीती 19 मार्च को फिक्की के एक कार्यक्रम में बिबेक देवरॉय ने वैश्विक अर्थव्यवस्था में सुधार के बाद भी भारत में निर्यात में गिरावट पर चिंता जाहिर की. इसके अलावा उन्होंने कहा कि वस्तु और सेवा कर (जीएसटी) लागू होने के बाद पूरी प्रक्रिया सामान्य होने में 10 साल का वक्त लगेगा.

बीते साल सितंबर में जब आर्थिक सलाहकार परिषद के गठन का ऐलान किया गया था, तो उस वक्त आर्थिक मामलों के कई जानकार ने इसकी टाइमिंग पर सवाल उठाया था. उस वक्त मोदी सरकार का कार्यकाल पूरा होने में डेढ़ साल बचा था और अब केवल एक साल बचा है. ऐसी स्थिति में आने वाले दिनों में परिषद अगर कोई रिपोर्ट सौंपती भी है तो इसे लागू करने और इसके नतीजे हासिल करने के लिए सरकार के पास कितना वक्त होगा, इस पर सवालिया निशान है.

इसके अलावा यह आशंका भी सही साबित होती दिखती है कि ईएसी द्वारा सख्त कदम की पैरवी पर सरकार शायद ही ऐसा करने का जोखिम उठाए क्योंकि आम चुनाव में साल भर ही बचा है.. इसकी पुष्टि इस बात से भी होती है कि एक फरवरी को बजट पेश होने से पहले दिसंबर में परिषद के सदस्य रथिन रॉय ने लोक लुभावन न होकर वित्तीय लिहाज से गुणवत्तापूर्ण बजट पेश किए जाने की उम्मीद जाहिर की थी. हालांकि, 2019 के आम चुनाव से पहले सरकार द्वारा राजनीतिक फायदे-नुकसान के गणित को देखते हुए इस उम्मीद पर खरा उतरने की संभावना न के बराबर ही थी. ऐसा ही हुआ भी.

उधर, आर्थिक सलाहकार परिषद से पहले अर्थव्यवस्था को लेकर सरकार को सलाह देने वालों में मुख्य आर्थिक सलाहकार के साथ सरकारी थिंक टैंक नीति आयोग भी शामिल रहा है. साथ ही, ईएसी के अध्यक्ष बिबेक देबरॉय आयोग में पूर्णकालिक सदस्य और इसके सदस्य रतन वटाल भी सदस्य के पद पर हैं. ऐसी स्थिति में परिषद अपनी तय भूमिका के साथ अब तक कितना न्याय कर पाई है, यह सवालों के कटघरे में है. इसके अलावा परिषद द्वारा ही तय छह महीने के बाद भी 10 अहम क्षेत्रों पर रिपोर्ट सौंपने के मामले में उसकी विफलता भी सामने आ चुकी है. दूसरी ओर, अर्थव्यवस्था के अहम मुद्दों पर वह सरकार की किसी तरह मदद करती हुई भी नहीं दिखती.