खबर आई कि सत्ताधारी दल ने अपनी चिर-विरोधी राजनैतिक पार्टी का विरोध करने के लिए उसी के पदचिन्हों पर चलने का फैसला किया है. ऐसा कम होता है जब सत्ताधारी पार्टी भ्रष्टाचार से इतर किसी और मामले में अपनी पूर्ववर्ती या विरोधी पार्टी के रास्ते पर चलने लगे. बीते दिनों कांग्रेस पार्टी के राहुल गांधी और राहुल गांधी की कांग्रेस पार्टी सीबीएसई पेपर लीक, पीएनबी घोटाले और दलित प्रताड़ना जैसे मुद्दों पर राजघाट में सांकेतिक उपवास पर बैठे थे. यह उपवास कितना सांकेतिक रहा होगा कि ठीक इससे पहले सबसे पहले तो कांग्रेसी नेताओं ने जमकर छोले-भटूरे खाये, फिर उन्हें खाते हुए अपनी तस्वीरें खिंचवाईं और फिर उन्हें सोशल मीडिया पर डलवा दिया. खैर, इस उपवास कार्यक्रम का उपहास उड़ाने के दौरान भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को भी इस आइडिया ने जोर से पिंच किया. उसने भी पार्टी के सभी सांसदों के साथ उपवास पर बैठने की घोषणा कर दी.

भाजपा की तरफ से आयोजित इस उपवास का बताया गया उद्देश्य बजट सत्र में विपक्ष द्वारा संसद न चलने देने की शिकायत जनता से करना है. कुछ समय पहले यह भी कहा गया था कि इसके विरोध में भाजपा और उसके सहयोगी दलों के सांसद, संसद न चलने वाले 23 दिनों की पगार नहीं लेंगे. अंदरखाने ज्यादातर सांसदों का मानना था कि एक दिन के लिए ही सही अपनी मिट्टी, जड़ें और रोटी छोड़ना अच्छी बात नहीं है. लेकिन खुलकर कहे कौन! तो सभी 23 दिन की मारी गई रोजी के गम में कुछ घंटों की रोटी छोड़कर अपने-अपने हिस्से का विरोध दर्ज करवाने को तैयार हो गए.

चलिए, अब उन कुछ संभावित बिंदुओं पर चर्चा कर लेते हैं जिन्हें ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री ने आयोजन किया होगा. अव्वल तो गर्मी का मौसम आ चुका है और इस मौसम में ज्यादा खाने से पेट खराब हो जाता है. अब अगर सांसदों का पेट खराब रहेगा तो वे बजट सत्र की तरह और कई महत्वपूर्ण बैठकों-जगहों पर जाना गोल कर सकते हैं. इसलिए प्रधानमंत्री ने उन्हें उपवास का यह कारगर तरीका अपनाने को कहा. इसके साथ ही उपवास के जरिए उन आलोचकों का मुंह भी बंद किया जा सकता है जो कहते हैं कि नेता बहुत खाते हैं.

देश के वर्तमान मुखिया अपनी बातों के बिल्कुल पक्के हैं. उन्होंने कभी कहा था कि ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’. वे अब तक अपनी इस बात पर कायम हैं. लेकिन उनकी ज्यादातर बातों की तरह कुछ अल्पमतियों को यह बात भी समझ में नहीं आ रही. उन्होंने देश भर में उपवास का आयोजन इसीलिए किया है ताकि उनके कथन का मंतव्य बिलकुल स्पष्ट हो सके - ‘जिस दिन नहीं खाऊंगा, उस दिन नहीं खाने दूंगा.’ उड़ाने वाले तो ये भी उड़ा देते हैं कि संशय जनता के बजाय प्रधानसेवक के करीबियों को ज्यादा था. इस उपवास से उनके मन के संशय भी दूर होंगे इस विश्वास के साथ उपवास का देशव्यापी आयोजन किया जा रहा है.

पिछले दिनों सरकार की तरफ से पकौड़ा रोजगार योजना के समर्थन में लगातार वक्तव्य जारी किए गए थे. उस दौरान तमाम टीवी चैनलों और सोशल मीडिया पर लगातार कई दिन इस पर चिल्ल-चोट-चर्चा होती रही थी. तब किसी ने किसी से यह सवाल पूछा था कि जैसे सरकार बहुत कोशिश करके भी अच्छे दिन नहीं ला पा रही है वैसे ही अगर किसी को बहुत कोशिश करके भी पकौड़े बनाने न आ पाएं तो वह क्या करे? यह उपवास ऐसे सवाल पूछने वालों के लिए एक संदेश है – आप उपवास करें. अगर खिला नहीं सकते तो खाकर क्या करेंगे? और कमा नहीं सकते तो खाएंगे कहां से? लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आप बिलकुल नाकारा हैं. जिन्हें पकौड़े बनाना नहीं आता वे लोकतंत्र की रक्षा में अपना सहयोग दे सकते हैं. आपका न खाना संसद की गरिमा और देश बचाने के काम में आ सकता है. बस करना यह है कि घर में पेट पकड़कर लेटे रहने के बजाय उपवास पर्व के सार्वजनिक अनुष्ठान में हिस्सा लेना है. हो सकता है इससे आपके दिन फिर जाएं और आप पकौड़ा तलने को रोजगार बताने वालों में शामिल हो जाएं.

उपवास का यह आयोजन इसे करने वालों की दूरदर्शिता का परिचय देता है. अगर अच्छे दिन लाने की कोशिश में भविष्य में कुछ लोगों को किसी वजह से खाने के लाले पड़ गए तो आज उपवास करने वाले कितने हक के साथ तब यह कह सकेंगे कि ‘हमने देश के लिए सुनहरे वक्त में नहीं खाया था और तुम इस मुश्किल घड़ी में उपवास नहीं रख सकते.’ इस तरह लगातार उपवास करते रहने से देश को इसकी कुछ गरीबी से भी छुटकारा मिल सकता है और देश फिर सोने की चिड़िया बनकर चहचहाने की दिशा में आगे बढ़ सकता है.