जम्मू-कश्मीर के कठुआ में आठ साल की बच्ची के साथ सामूहिक बलात्कार और फिर उसकी हत्या ने पूरे देश को हिला दिया है. खबरों के मुताबिक इस वारदात का मुख्य आरोपित एक रिटायर्ड राजस्व अधिकारी है जो उस खानाबदोश मुस्लिम समुदाय को इलाके से भगाना चाहता था जिससे यह बच्ची ताल्लुक रखती थी. बीते दिनों इस घटना के आरोपितों के पक्ष में कठुआ में प्रदर्शन भी हुए. इनमें जय श्रीराम के नारे भी लगाए गए. यानी कुल मिलाकर मामले को धार्मिक रंग देने की कोशिश हुई.

धर्म के नाम पर कुछ न कुछ बवाल हर वक्त हर जगह चलता ही रहता है. पश्चिम एशिया और अफ़्रीका के बड़े हिस्से में धर्म के नाम पर आतंकवाद का तांडव चल रहा है, जिसकी आंच सारी दुनिया में महसूस की जा रही है. इसके अलावा भी भारत समेत सारी दुनिया में धर्म के नाम पर उन्माद, हिंसा और अत्याचार की कहानियां रोजबरोज आ रही हैं. इतिहास तो ऐसी कहानियों से भरा पड़ा है जहां एक धर्म के अनुयायियों ने दूसरे धर्म के मानने वालों या अपने ही धर्म के कथित पथभ्रष्ट लोगों पर भयानक अत्याचार और नरसंहार किए. कई प्रगतिशील लोग यह मानते हैं कि धर्म ही जहालत, पिछड़ेपन और अत्याचार की जड़ है और धार्मिकता के ख़त्म होने से समाज को इन अत्याचारों से निजात मिल जाएगी.

क्या सचमुच ऐसा है ?

अगर हम बीती हुई शताब्दी यानी बीसवीं शताब्दी पर नजर डालें जिसमें दो दो महायुद्ध हुए और करोड़ों लोग अनेक युद्धों, गृहयुद्धों और भारत के विभाजन जैसी त्रासदियों में मारे गए तो हम पाएंगे कि इस शताब्दी के सबसे बड़े हत्यारे और तानाशाह, चाहे वह हिटलर हो या स्टैलिन या पोलपोट या फिर चाउशेस्कू, कोई धार्मिक लोग नहीं थे. लातिनी (लैटिन) अमेरिका और अफ़्रीका के कई तानाशाहों ने धर्म का सहारा लिया, लेकिन वे मूलत: तानाशाह थे. बल्कि लातिनी अमेरिका में तानाशाहों के ख़िलाफ़ प्रतिरोध में धर्म और धार्मिक नेताओं ने बड़ी भूमिका निभाई. ईसाइयत और मार्क्सवाद के मेल से जो ‘लिबरेशन थियॉलॉजी’ खड़ी हुई वह बीसवीं शताब्दी के राजनैतिक और वैचारिक इतिहास के सबसे ज्यादा रचनात्मक आंदोलनों में से एक है. हमारे दौर में लोकतंत्र, समाजवाद, राष्ट्रवाद जैसी आधुनिक अवधारणाओं के नाम पर जितने नरसंहार हुए और जितने लोग मारे गए उतने इतिहास के किसी कालखंड में कभी नहीं मारे गए होंगे.

जिसे हम धर्म कहते हैं उसके दो छोर होते हैं. एक छोर आसमान में होता है दूसरा ज़मीन में धंसा होता है. या यूं कहें कि एक छोर लोकोत्तर होता है दूसरा दुनियावी होता है. बारहवीं सदी के महान इस्लामी आध्यात्मिक चिंतक इब्न अरबी के चिंतन के मुख्य आधारों में ‘बरज़क’ की अवधारणा है. इस अरबी शब्द का अर्थ होता है कोई ऐसी चीज़ जो दो दो अलग अलग स्तरों के बीच हो. इब्न अरबी कहते हैं कि इन्सान भी ऐसा ही होता है, उसमें दैवी और पाशविक दोनों तत्व होते हैं. इन्सान का उद्देश्य अपने दैवी स्वरूप को इतना मज़बूत करना है कि वह ‘इन्सानुल कामिल’ या संपूर्ण इन्सान बन जाए. अगर वह अपने पाशविक रूप को मज़बूत करता है तो स्वार्थी, हिंसक और लालची बनता है.

हिंदू धर्म में भी दैवी संपदा और राक्षसी संपदा की बात की गई है, यह भी वही है. इसी तरह धर्म में भी एक तत्व आध्यात्मिक होता है, दूसरा दुनियादारी से जुड़ा और भौतिक होता है. आध्यात्मिक तत्व आत्मा है तो भौतिक तत्व शरीर.दोनों ही तत्व एक दूसरे से ऐसे घुले मिले होते हैं कि अक्सर उन्हें अलग करना संभव नहीं होता. जो लोग धर्म के आध्यात्मिक रूप पर ज़ोर देते हैं उनके लिए धर्म की परिभाषा तुलसीदास के ‘परहित सरिस धरम नहीं भाई, परपीड़ा सम नहीं अधमाई’ या नरसी मेहता के ‘पीर पराई जाने रे’ होती है. जो राक्षसी संपदा से प्रभावित होते हैं उनके लिए धर्म के बाह्याचार और उसका संगठित रूप ज्यादा आकर्षक होता है.

मनुष्यजाति के विकास में उसकी संगठन क्षमता की बड़ी भूमिका है. संगठन का फ़ायदा यह होता है कि उससे समूह की शक्ति कई गुना बढ़ जाती है और कार्यविभाजन होने से बेहतर काम हो सकता है. धर्म के साथ भी यही होता है कि उसका संगठन बनता है और वह ज्यादा प्रभावशाली हो जाता है. संगठन बनने से शक्ति बढ़ती है और शक्ति से सत्ता का जन्म होता है. संगठन में जितने भी गुण हों उसमें यह समस्या तो होती ही है कि एक सत्ता समीकरण बनता है और उससे शक्तियों का असमान विभाजन होता है. कुछ लोग ज्यादा ताक़तवर बनते हैं, कुछ कम ताक़तवर हो जाते हैं. संगठन में सदस्यों की निजी स्वतंत्रता पर कुछ अनुशासन का नियंत्रण लाज़मी होता है. लेकिन यही नियंत्रण कहीं कहीं दमन के स्तर पर भी पहुंच जाता है.

संगठन के साथ एक और समस्या यह होती है कि उसके साथ सत्ता, पैसा वग़ैरह जुड़ा होने की वजह से वह उस कारण से भी बड़ा हो जाता है, जिसके लिए वह बना था. प्रसिद्ध रूसी कवि येव्गेनी येव्तुशेंको ने लिखा था कि स्टैलिन की दिक़्क़त यह थी कि वह भूल गया कि साम्यवाद मनुष्य के लिए है, न कि इन्सान साम्यवाद के लिए. यही समस्या धर्म के बारे में भी होती है कि उसके नेता और अनुयायी भूल जाते हैं कि धर्म का ढांचा धर्म के दिव्य आध्यात्मिक मर्म के लिए है, वे उस ढांचे को ही धर्म समझ बैठते हैं.

धर्म के नाम पर होने वाली हिंसा और अत्याचार की वजह उसके संगठन से पैदा होने वाली सत्ता है. इसी तरह देश के नाम पर, प्रांत के नाम पर, लोकतंत्र के नाम पर, साम्यवाद के नाम पर भी ऐसे ही अत्याचार होते हैं. सत्ता कैसी भी हो उसके दमनकारी होने में वक्त नहीं लगता. दूसरे, सत्ता अपने आप में साधन और साध्य दोनों बन जाती है, और उस मूल उद्देश्य से भटक जाती है जिसके लिए होने का वह दावा करती है.

समस्या यह भी है कि संगठन और सत्ता के बिना मनुष्य समाज चल नहीं सकता लेकिन उसकी बुराइयों से बचने का कोई रामबाण उपाय उसके पास नहीं है. ऐसे में यही एक तरीक़ा बचता है कि सत्ता और संगठनों दमनकारी और उद्देश्यविहीन होने से रोकने के लिए सतत सजग रहा जाए और संघर्ष करते रहा जाए.

इस मायने में यह भी ध्यान देने की बात है कि ज़्यादातर संत और धर्म या पंथ प्रवर्तक अपने वक्त में धार्मिक संगठन में आ गई जड़ता और दमनकारी प्रवृत्ति के विरूद्ध विद्रोह करने वाले और धर्म के मर्म को फिर से केंद्र में लाने वाले लोग थे. बल्कि ऐसे ज़्यादातर लोग अपने को सिर्फ़ सुधार के हिमायती की तरह देखते थे, किसी नए धर्म या पंथ के शुरु करने वाले के रूप में नहीं, धर्म और पंथ तो उनके अनुयायियों ने बहुत बाद में स्थापित किए, जिनमें फिर जड़ता आई,और फिर नए मर्म समझने वाले लोगों ने विद्रोह किया या सुधार का रास्ता दिखाया.

जब तक हम मनुष्य की सत्ताकांक्षा और संगठन के दमनकारी स्वभाव का कोई स्थायी इलाज नहीं ढूंढते, हिंसा और दमन का कोई स्थायी तोड़ नहीं निकलेगा, अगर वह धर्म के नाम पर नहीं होगा तो जाति के नाम पर, नस्ल के नाम पर, देश के नाम पर, विचारधारा के नाम पर, यहां तक कि स्वतंत्रता और बंधुत्व के नाम पर भी होता रहेगा. हम इतना कर सकते हैं कि ‘मानुष धर्म’ को सबसे ऊपर रखकर लगातार दमन और हिंसा के ख़िलाफ़ निजी जीवन में और सामाजिक जीवन में लड़ते रहें क्योंकि जितना सच दमन है उतना ही सच उसके ख़िलाफ़ संघर्ष भी है, और यही सच्चा धर्म है.